Nous Podcast· 04 Aug 2026· 1:10:59

The Protest That Shook Modi Government—But Did It Change India?

Was the CJP (Cockroach Janta Party) protest merely a student uprising, or did it fundamentally reshape India's political conversation? In this thought-provoking podcast, senior journalist Bushra Khanum joins political analyst Raju Parulekar to revisit the movement that shook the Modi government a…

Full Transcript

विपक्ष के नेता जो थे राहुल गांधी वह सबसे बड़े मैगनेट थे। उन्होंने प्रधानमंत्री के निवास के बाहर जो आंदोलन किया वह देश का आंदोलन था। एक विपक्ष के अंब्रेला के नीचे इतने लाखों छात्र एक साथ इस तरह से जंतरमंतर या सीपी पर या लुटियंस दिल्ली में क्यों नहीं इकट्ठे इकट्ठे हो पाए? सीजेपी ऐसा कर पाई आप उससे क्रेडिट क्यों लेते हैं? 2011 से यह सवाल का जवाब एक ही है क्योंकि केजरीवाल की पर्सनल एंबिशन आप ये कह रहे हैं कि केजरीवाल इज सो पावरफुल [संगीत] कि उसने तमन्ना किया और अब उसने सीजेपी तो ना खाता ना वही जो अरविंद कहे वही सही ये तब से चल रहा है धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से [संगीत] इस देश में क्या बदला इन युवाओं को क्या मिला मेरा सवाल है आपसे सबसे पहली अह अच्छी चीज ये हुई कि भारत एक आर्गुमेंटेटिव देश था वो वापस आ गया। अब आप आर्गुमेंट करने लगे हो फिर से। अब आप किसी को भगवान नहीं मानते। मुसलमान को अगर लिंच किया जाता है। उसके घर को बुलडोज किया जाता है तो क्या आपको लग रहा है इनमें से कुछ युवा उठ खड़े होंगे? क्या वो इतनी हिम्मत दिखाएंगे? मुसलमान है लेकिन देशभक्त है। ऐसा जो कहते हैं वो संघी है। [संगीत] ये मुसलमान हैं। हम हिंदू हैं। हम सब देशभक्त हैं। मेरा सवाल आपसे यह है कि क्या इस मोमेंटम को इस गुस्से को क्या राहुल गांधी दूर तक ले जा सकते हैं? आने वाले 3 साल बाद [संगीत] आरएसएस के जो बड़े-बड़े ऑफिस बने वहां आइसक्रीम पार्लर खुलेंगे और उसके बाद आरएसएस के जो गणवेश है यानी जो यूनिफार्म्स हैं वो आप म्यूजियम [संगीत] में देखेंगे। नाउ में हम डाटा और ग्राउंड रियलिटीज के जरिए वो स्टोरीज आपके सामने लाते हैं जिन्हें अक्सर दबा दिया जाता है या गलत तरीके से पेश किया जाता है। हम एक इंडिपेंडेंट प्लेटफार्म है। यानी हमारे पीछे किसी तरह की कोई कॉर्पोरेट बैकिंग नहीं है। हमारी असली ताकत आप हैं। अगर आप चाहते हैं कि ऐसी सच्ची और जरूरी स्टोरीज लगातार आपके सामने आती रहे, तो हमारी वीडियोस को आप ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। चैनल को सब्सक्राइब करें और अगर आपके लिए मुमकिन हो तो स्क्रीन पर दिए गए क्यूआर [संगीत] कोड के जरिए आप हमें सपोर्ट करें ताकि हम यूं ही आपके सामने [संगीत] स्टोरीज लाते रहें और यूं ही काम करते रहें। 10 करोड़ इंसानों जिंदगी से बेगानों सिर्फ चंद लोगों ने हक तुम्हारा छीना है। खाक ऐसे जीने पर यह भी कोई जीना है। बेशूर भी तुमको बेशूर कहते हैं। सोचता हूं यह नादान किस हवा में रहते हैं। और यह कसीदा गो फ़िक्र है यही जिनको हाथ में अलम लेकर तुम ना चल सको लोगों कब तलक यह खामोशी चलते फिरते जिंदानों 10 करोड़ इंसानों आप 10 करोड़ की जगह यहां पर 140 करोड़ आप कर सकते हैं आदाब नाउ नेटवर्क देख रहे हैं आप मैं हूं आपके साथ बुशरा खान फहाद सीजेपी का प्रोटेस्ट खत्म हो गया है और इस सीजेपी के प्रोटेस्ट खत्म होने के बाद अब इसको लेकर बातचीत हो रही है कि इस प्रोटेस्ट से देश को क्या हासिल िल हुआ है। क्या वाकई में हम कह सकते हैं कि जो 12 साल में नहीं हुआ वह हमने सीजेपी के प्रोटेस्ट में देखा। जिस बड़ी तादाद में युवा सड़कों पर आए, डंडे खाए, लाठियां खाई, हाथ पैर तुड़वाए, पैेट गंस झेली, सर फुटवाए लेकिन उसके बाद भी वह झुके नहीं। उसके बाद भी वह डरे नहीं। क्या उन्हीं छात्रों को, उन्हीं युवाओं को अब डराने की, धमकाने की कोशिश की जा रही है। उनके ऊपर केसेस लाते जा रहे हैं। उनके अकाउंट सस्पेंड किए जा रहे हैं। उनके घरों तक पहुंचा जा रहा है और खासतौर पर महिलाओं को टारगेट किया जा रहा है। खासतौर पर यह कहा जा रहा है कि यह हमारे लिए प्रधानमंत्री ने कहा है कि एक कल्चरल शौक है कि कैसे बेटियां जो हैं वह गालियां दे रही हैं और वह यह भूल जाते हैं कि उन्हीं के पार्टी से जुड़े लोग हिंदुत्ववादी संगठन के लोग किस तरह से दिन रात मुसलमानों को महिलाओं को और मुसलमानों के आराध्यों को किस तरह से दिन रात जो हैं वह मां बहन की गालियां देते हुए नजर आते हैं। लेकिन प्रधानमंत्री को उसकी फ़िक्र नहीं है। प्रधानमंत्री को फिक्र सिर्फ तब होती है जब गालियां उनको दी जाएं या उनको टारगेट किया जाए। आज हम बात करेंगे कि सीजेपी के इस प्रोटेस्ट ने देश को कितना बदला है? क्या वाकई में इन युवाओं को डरा लिया जाएगा? क्या वाकई में अब हम कोई और इतना बड़ा प्रोटेस्ट क्या नहीं देखेंगे? क्या वाकई में अमित शाह का इस्तीफा होगा? क्या सरकार को अकाउंटेबल ठहराया जाएगा? और क्या धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद अकाउंटेबल ठहरा दिया गया है? है क्या इस सरकार को पहली बार जिस तरह से इस्तीफा हुआ है हम आज के पडकास्ट में दो हिस्सों में बात करने जा रहे हैं। एक वो लोग जिन्होंने इस प्रोटेस्ट को ऑर्गेनाइज किया उनको क्या हाथ लगा और वो लोग वो छात्र वो युवा जिन्होंने डंडे लाठियां सब कुछ खाई लेकिन टिके रहे उन्हें क्या मिला है इस पर आज हम बात करेंगे और मेरे साथ आज जो मेहमान हैं उनको सुनना आप बहुत पसंद करते हैं। वो उन चंद लोगों में शुमार हैं जो तमाम जब भीड़ एक तरह की बात कर रही थी। जब पॉपुलर सेंटीमेंट सर चढ़कर बोल रहा था तो उन्होंने उन हवाओं के खिलाफ खड़ा होना उन्होंने पसंद किया और शायद हमेशा से वो यही करते रहे हैं। उनको भी बहुत टारगेट किया गया। उनको भी गालियां मिली। उनको भी ट्रोल किया गया। लेकिन जो उन्होंने एक आईडियोलॉजिकल स्टैंड लिया था जो कि सही था। देश के लिए था। इस लोकतंत्र के लिए था। इस संविधान के लिए था। वो एक कदम भी पीछे नहीं हटे। आप सही समझे। मैं बात कर रही हूं राजू पारुलेकर जी की। राजू जी बहुत-बहुत स्वागत आपका। वेलकम टू नाउ नेटवर्क। राजू जी पहला सवाल मेरा आपसे यह कि जब हमने पिछला एपिसोड किया था तब तक तो ना प्रोटेस्ट शुरू हुआ था। ना ही एक तरह से यह समझ में आ रहा था कि आगे सीजीपी आखिर क्या करने जा रही है? क्या उनका इरादा है? तब से अब तक बहुत कुछ बदल गया है। बहुत पानी बह गया है और बहुत कुछ हमने बदलते हुए देखा है। सबसे पहले मेरा सवाल आपसे यह है कि यह जो हमने रेजिस्टेंस सड़कों पर देखा, ये युवाओं को हमने लड़ते हुए जो देखा, डंडे खाते हुए देखा और उसके बाद भी वो फिर से अगले दिन लौट कर आए। इसका क्रेडिट आप किसको देना चाहेंगे? देश के युवा देश की जनता जजी का अब जिक्र कर रहे हैं। लेकिन हर पीढ़ी ने अपनी उसमें कंट्रीब्यूशन दी है। देखिए जेंजी मेरे घर में भी है। मेरी बेटी भी है। तो अगर अपने बच्चों को आप प्रोटेस्ट में भेजते हो तो मां-बाप का भी क्रेडिट बनता है। हम यानी अपनों अपने ऊपर लाठी गिरे इससे डर इससे ज्यादा बड़ा डर अपनों पर लाठी गिरे इसका होता है। हां तो अपने पर गोली चले क्योंकि गृह मंत्री ऐसे हैं कि AK-47 ही चलवा देते हैं। अमित शाह पैेट गन ही चलवा देते हैं। तो अपने ऊपर ये चले उससे डर ज्यादा लगता है अपने बच्चों पर चले। तो वो जनरेशन जिन्होंने यह भी सैक्रिफाइस किया यह त्याग किया कि देश के लिए जरूरी है मेरा बच्चा मेरी बेटी मेरे बेटे इतने अच्छे घर के इतने पढ़े लिखे जा रहे थे तो वो अनजाने में तो नहीं जा रहे थे अपने मां-बाप को उनके फक्र था उन पर हम तो हर पीढ़ी ने इस देश के और हर तबके ने आपने इरफान भाई का देखा हम फिर उमेद भाई का देखा जुनेद जुनेद तो वह सारे लोग अपनी तरफ से अपने कटु अनुभवों को भूलकर ताकि कटु अनुभव का मतलब यह है कि उन्हें मालूम था दोनों को। इरफान भाई को भी मालूम था कि अब मैं मुसलमान हूं तो पहले मेरा घर बुलडोज करेंगे। हालांकि जो उच्च वर्ण के हिंदू है उनको छोड़ देंगे। ये उनको मालूम था। ऐसा नहीं कि वो अनजाने में कर रहे थे। फिर भी वह डट कर देश के लिए खड़े रहे। से बड़ा और सुंदर 2019 से असल में 2016 से मैं लगातार नरेंद्र मोदी और अमित शाह का जो दमन तंत्र है और आरएसएस नाम के एक गिरोह का भारत के संविधान और अमनपसंद लोगों के खिलाफ जो युद्ध चल रहा है इजराइल की मदद से उसके खिलाफ मैं आवाज उठा रहा हूं। मुझे वो अंजाम तक पहुंचते देखना कितना खूबसूरत था। हम लेकिन मैं ये भी उस वक्त मैं सजग था क्योंकि 2011, 2012 और 2013 में मैंने कुछ जंतरमंतर पे प्रोटेस्ट किया है। मुझे मालूम है कि वो उसमें कॉम्प्लेक्सिटीज क्या होती है? यानी राजनीति या आंदोलन दो प्लस 2 बस 2 = 4 ऐसा नहीं होता। 2 + 2 = 4 नहीं होता। [नाक से की जाने वाली आवाज़] इस आंदोलन को सक्सेसफुल बनाने से की बात करने से पहले यह आंदोलन सीजेपी का था ही नहीं। यह आंदोलन की शुरुआत कांग्रेस पार्टी ने किसी को अच्छा लगे, किसी को बुरा लगे। मैंने कांग्रेस पे जितनी आलोचना की किसी ने नहीं की होगी शायद। लेकिन कांग्रेस पार्टी ने छात्रों की गूंज के रूप में इंडिया यूथ कांग्रेस और एनएसयूआई ने यह आंदोलन सारे शहरों में शुरू किया था। हम और इसमें उसमें ऐसी भीड़ अह उमड़ पड़ी थी कि देख के पता चलता था कि देश अब सब्र का बान टूट चुका है। नीट पेपर का तो लास्ट रॉन कैमल्स बैक था। लेकिन इन लोगों ने मोदी सत्ता के नाक के नीचे सहमति से राम मंदिर पर डाका डालने की हिम्मत लोगों की हुई। जो राम मंदिर के रखवाले थे। जो चौकीदार थे वो राम मंदिर के चोर निकले। उसके बाद लोगों के सब्र का बाण टूट गया। उसके बाद उनके समझ में आया यह राम के लिए ना चल रहा है ना सीता के लिए ना रहीम के लिए ना अब्दुल को टाइट करने के लिए। यह बस अपनी जेबें भरने के लिए और अपनी सत्ता सत्ता को अक्षुण रखने के लिए चल रहा है। और यह देश का एक संविधान, देश का लोकतंत्र, देश के लोगों का प्यार, आपसी भाईचारा और देश का सृजन 12 साल से दमन से सफोकेट कर रहे हैं। तो यह आंदोलन सारे देश का था। देश के युवाओं का था। कांग्रेस पार्टी ने इसमें सबसे पहल की थी इसकी और सबसे आगे थी और राहुल जी मैं आपको आता हूं आता हूं आता हूं आता हूं आपका आपका सवाल जो है मुझे मालूम है अब उसमें दूसरा जो एक इसमें एक कॉम्प्लेक्स वो देखिए कोई भी आंदोलन इतने बड़े पैमाने पे सक्सेसफुल होने लगता है अ क्योंकि गोदी मीडिया है वो दिखाते नहीं है हिरन जोशी से जो आदेश आते हैं वही फॉलो होते हैं। तो कांग्रेस पार्टी के जो भीड़ थी लाखों की संख्या में विद्यार्थियों की उसका कोई वीडियो फुटेज कांग्रेस पार्टी के ऑफिस में है। उनका उनके पास कोई जरिया नहीं था कि लोगों तक भेजे हां और कांग्रेस पार्टी ऐसी केडर बेस पार्टी नहीं है कि वो WhatsApp ग्रुप फिर उसके नीचे का ग्रुप उसके नीचे इंस्टा पे ये सब ऐसा एक पूरी तरह से अनुशासित रूप से लोगों तक पहुंचा है। तो वो पहुंचा नहीं था लेकिन था। तब अ एक आपको मालूम होगा कि 2011 12 13 का जो सारा आंदोलन था अन्ना का उसमें अन्ना तो हैपन हैपनिंग था एक मेन आदमी उसके पीछे का ब्रेन जो था और जो निरंतर केजरीवाल फॉर सीएम एंड मोदी फॉर पीएम वाला लाइन लगा रहा वो थे केजरीवाल तो उनके द्वारा उनके द्वारा का आप बोलेंगे सबूत क्या तो राका उनका पार्टी का हुआ है राका जो है स्पोक्सपर्सन दूसरा अभिजीत दीप के वो उनकी पार्टी का है हम आठ साल से काम कर और वो बच्चे नकार नहीं रहे हैं वो नहीं ना नहीं कह रहे हैं वो कह रहे हैं वी आर देयर लेकिन लोग कह सकते हैं कि वो तो उनका पास्ट था नहीं नहीं उन्होंने पास्ट ना उन्होंने कहा कि हम हैं हम दीपके ने यह नहीं कहा कि मैं डिसोन अप करता हूं हम दीपके ने कहीं भी डिस से नहीं किया और हालांकि नेहा ने उनको सर्टिफाई दीपके को किया कि वो आपकी स्टाइल और टैक्टिक्स से अलग स्टाइल और टैक्टिक्स रखते हैं। नेहा ने भी यह नहीं कहा कि वो आप छोड़ चुके हैं ना। वो उनका पास्ट नहीं उनका पास्ट और प्रेजेंट है। और दूसरी बात केजरीवाल एक आंदोलन कर रहे हैं कुछ और विपक्षी दल द्वारा तो वो जस्टिफायबल है। यानी जस्टिफाई करता हूं उसको मैं क्योंकि वो विपक्ष भी है और वो चाहते इंडिया गठबंधन के साथ नहीं जाना नहीं जा सकते। लेकिन वो आंदोलन आंदोलन नहीं था। इसके लक्षण दिखते थे। एक दो तीन चार पांच कई लोगों ने अब लिखा है तब हमने बोला था दीपके उतरते हैं उनको जाके पुलिस परमिशन दे देती है ये बिना होम मिनिस्ट्री के यानी ऐसी परमिशन दीपके के सिवाय सिर्फ जय शाह को मिल सकती है और ये खुद बीजेपी बीजेपी आपको याद है सुषमा स्वराज की जो बेटी है उसने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके खुद कहा कि उनको तो हमने ऐसी परमिशन दी थी उनको तो हमने बाकायदा तौर पर उनके पास वो परमिशन शाम तक की थी जो एक महीने तक वो बैठे रहे लेकिन पुलिस ने उनको कुछ भी नहीं किया और यह सारा जो सीजेपी वाला जो आप बात बोल रहे हैं वो आप सीजेपी एक ऐसी सिटी बनाने की कोशिश थी जो विपक्ष का आंदोलन है जिसमें इंडिया गठबंधन की पार्टियां थी जब बाद में अखिलेश दिखे आपको कई लोग दिखे और राहुल तो उनके शीर्ष नेता थे और पावरफुल नेता थे और सबसे लोकप्रिय नेता थे तो उनकी पर्सनल जेलसी जो केजरीवाल की राहुल के अब पता नहीं है उनकी क्यों जलसी है। है ना? अह वो गांधी फैमिली ने जब केजरीवाल जेल में गए ऐसा पता चला तो उनकी वाइफ को मिलके फिर उनको बाकायदा तौर पर रामलीला मैदान में प्रियंका गांधी, राहुल गांधी और सोनिया ये गांधी जो हैं वो स्टेज पर मैंने खुद कवर किया है उसको। और लोगों ने कहा कि देखिए कितना बड़ा दिल है कांग्रेस का। नहीं नहीं कांग्रेस अरे वो अपने पिता का हत्यारों को माफ़ कर सकती हैं। वो अपने पति के हत्यारों को माफ़ कर सकती हैं। तो बड़ा दिल तो है ही। छोड़िए। लेकिन केजरीवाल की तरफ से जो हमेशा कांस्परेसी कांस्परेसी कांस्परेसी और मोदी इसलिए नहीं चाहिए क्योंकि मुझे मोदी बनना है। हम और राहुल का जो सपना है और बाकी विपक्ष का जो सपना है वो ये है कि भारत अब आजाद होगा तो एक वेलफेयर स्टेट बनेगा। यह क्रोनीस है। उनकी उन्होंने बोला है क्रोनीस है। उनकी मोनोपोली हम खत्म कर देंगे। जैसे 2013 से पहले आप मोबाइल लेने जाते हो तो 10 मोबाइल के कार्ड मिलते थे। दो ही लोगों का उसका मोनोपोली नहीं थी। एक के पास 27 टीवी चैनल और दूसरे के पास 18 ऐसा होगा नहीं। ये जो थॉट है वो फिलॉसोफी है। उसके लिए लाहौर लड़ रहे थे। हालांकि केजरीवाल सत्ता में मेरा कितना हिस्सा होगा उसके लिए लड़ रहे थे और उसके जैसा विचार रखने वाले लोग हैं वो दो-तीन लोग जिनको एक क्रोनी से मोहब्बत है क्योंकि उनके पैसे वहां लगे हुए हैं तो वो सारे इकट्ठा यहां हुए थे और इसलिए वो पवार साहब गए आप जो जो गए जंतरमंतर पे वो नेता आप याद रखिए याद करिए समझ जाएंगे आप फौरन सिर्फ अखिलेश नहीं गए डिंपल जी गए ताकि वो एक्ट बैलेंसिंग एक्ट था वो ताकि हम विपक्ष का एक हिस्सा उसको अकेले नहीं छोड़ रहे। इतना ही मैसेज दे दिया। मवा मोहत्रा भी गई थी। हां मवा वही मैं बोला हूं लेकिन ममता नहीं गई। वो जो मीटिंग में जाते हैं वो नहीं गए। मेन डेरेको ब्रायन नहीं गई। देखिए देखिए और वहां पर उनके दो अलग साथी भी थे ना कम्युनिस्ट पार्टी के। हम दो वो भी थे। वो वो एज अ एज एन आप पार्टी वो नहीं बैठे थे वहां पर। वहां वो कम्युनिस्ट करके ही बैठे थे। वो अब उनके साथ तालमेल अच्छा रहा वो बात अलग है। वो तो नेहा का वर्जन है। लेकिन उनके साथ क्या हुआ वहां क्या नहीं हुआ उसका बॉल टू बॉल मिनट टू मिनट खबर मुझे थी। तो मैं समझ गया कि ये कुकर की चिट्ठी बनाने की कोशिश है और गृह मंत्रालय प्रोएक्टिवली इसमें लगा हुआ है। बिना गृह मंत्रालय के प्रोएक्टिव होने के 20 तारीख को जो लाठी चार्ज हुआ और कई लोगों को कई युवाओं को देश भर मारा गया। फेस रिकॉग्निशन से पकड़ा गया और आज भी उनके पीछे दमनकारी सारी एजेंसीज लगी हुई है। उसमें आप पहली बार विश्व के इतिहास में जो कोऑर्डिनेटर्स माने गए जे जंतरमंतर के जिनको मिलने के लिए सिर्फ 150 लोग रोज आते जब तक उसमें राहुल गांधी प्रोएक्टिवली प्रधानमंत्री निवास के सामने आंदोलन नहीं किए तब तक वो लोगों को अ लाठी चार्ज होने से पहले एक ट्रक पे बिठा के गायब कर दिया गया। एक आदमी उस वहां बर्गर खाता हुआ पकड़ा गया तो उन्होंने इन्होंने उसको डिसओन कर दिया। सबसे ऑनेस्ट वो था। वो बेचारा ट्रक पे नहीं गया। उसको पैदल ही चलना पड़ा तो जाके वो बर्गर खा रहा था। क्या ही गुनाह किया उसने। मैं मानता हूं कि यह दो चीजें तीन चीजें फिर नेता प्रतिपक्ष विपक्ष के नेता जो थे राहुल गांधी वो सबसे बड़े मैग्नेट थे। उन्होंने प्रधानमंत्री के निवास के बाहर जो आंदोलन किया वो देश का आंदोलन था। उसके सारे युवा उसके साथ जुड़ गए। लाठियां खाई, गोलियां खाई, पैेट गन खाए वो देश के सारे लोग थे। वह सीजेपी के नहीं थे। बात करने के लिए उनकी तरफ से सौरभ दास और रांका को किसने ऑथेंट ऑथेंटिट किया हम वो कैसे बात करते हैं उनकी तरफ से और जितेंद्र सिंह और नड्डा के साथ बंद कमरे में किसी भी यानी कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में हो या उनके घर में ये दो लड़के जाके कैसे बात कर सकते हैं आप बताइए एक यूनियन और मैनेजमेंट की मीटिंग हो उसमें भी बातचीत दोनों की सब वर्कर्स के साथ होती सामने होती है और ऐसा नहीं हुआ तो वर्कर के जितने गुट है जितने स्टेक होल्डर्स हैं उनके प्रतिनिधि उनके साथ रहते हैं। जो भी सामने वालों ने आपको पॉइंट कहे हैं या फिर उनका कहना है वो बाहर आके बुला बोला जाता है कि देखिए ये ये कह रहे हैं हमें मंजूर है नहीं मंजूर कैंसिल तो ऐसा कुछ भी नहीं हुआ वो सौरभ दास और रांका ने विद इमीडिएट इफेक्ट बोलो। ऐसा डिक्टेट किया जितेंद्र सिंह और नड्डा ने और उन्होंने इमीडिएट इफेक्ट कॉल ऑफ कर दिया। समझ लीजिए। राहुल गांधी का कोई रोल नहीं है। नेता विपक्ष को आप पूछेंगे नहीं। हम फिर आप जाते वक्त अपने ही साथी दीपके या फिर वो नेहा नेहा तो दूसरे पार्टी की थी और भी लोग थे। उसकी देखिए नेहा क्या कहती है वो मेरे लिए इंपॉर्टेंट नहीं है। मैं ये एक फिलॉसोफिकल और मैनेजमेंट स्ट्रक्चर का वो बोल रहा हूं। वो अभी छोटी बच्ची है। अभी उसको बहुत देखना है राजनीति और बाकी चीजें। उसकी अपनी पार्टी है और वो तय करेगी जो करना है और सही गलत। लेकिन वो अगर उनके साथ नहीं जाती तो वो वहां पर क्या सिर्फ अनशन करने आई थी और वो एकमात्र थी जिसने एक्चुअली अनशन किया समझे तो वो नाइविटी उसकी है और और भी चीजें हैं आगे जाकर वो उस पे साबित होगी नहीं होगी उस पे मैं नहीं जाना चाहता क्योंकि वो हो ऐसा मैं उसको शुभकामनाएं दे सकता लेकिन मैं आपको यह बोलता हूं कि ये दोनों ने जाके जो किया वो कंप्लीटली फेक है क्योंकि युवाओं का जो जो दमन हुआ था उन पर पैेट गन चली थी उनप बंदूक चलाई गई थी जो मुस्लिम्स थी उनको चुन चुन के बाद में पकड़ा गया उनको तकलीफ दी गई उनके घर पे गए इन्होंने मेटा एआई के चश्मे लगाकर उनके फेस रिकग्निशन किया 15-15 साल के बच्चियों से माफी मंगवाई सारी गुंडागर्दी के लिए हम ऐसा नहीं करेंगे यह सरकार से लिखित रूप में इनके पास है सौरभ दास और रांक के पास हम लेकिन ये तो ये कह रहे हैं कि जो हमारी तीन शर्तें थी उनमें शर्तें कहां थी हवा में हां किसने देखा जंगल में मोर नाचा तुम लोग क्या डील करके आए हो हमें कैसे पता चलेगा और हम कौन से तुम्हारे मौसेरे भाई हैं और मौसेरे भाई होते तो भी क्यों विश्वास रखे हैं हम और जितनी वीडियोस भी सामने आई हैं जो बातचीत की उसमें म्यूट किया गया है वो सब म्यूट है और हर जगह एएनआई को एक्सेस है आपने पूरे दुनिया के प्रेस जैसे अलजजीरा है इंडिपेंडेंट है फिर हिंदू है फिर वायर है उनको एक्सेस क्यों नहीं दिया वि ऑडियो तो ये सारा जो संदेहजनक मामला है वो एक एक बात मैं अगर पकड़ू सिर्फ दीपके को परमिशन मिलती है तो आप समझो कि चलो ये कोइंसिडेंस है कोइंसिडेंस हो नहीं सकता हो नहीं सकता इसकी वजह आप लेकिन ये कह सकते हैं राजू जी कि अगर विपक्ष इतना ही दमदार था राहुल गांधी में वो कन्विक्शन था राहुल गांधी ने शुरू किया ये ये सारी चीज चीज है नीट का। इसमें कोई दो राय नहीं है। मैं इसको डिनाई नहीं कर रही हूं। ऑफ कोर्स ही डड इट। और हमने सबने देखा। हमने देखा कि लाठियां चलाई गई। हमने देखा कि पानी की बौछारे हुई कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर यहां तक कि एक्स सीएम से लेकर सब और उसके बाद यह सीजेपी बनती है उस कमेंट के बाद और यह सब कुछ हुआ। लेकिन यह भी तो कहा हां देखिए ये भी तो कहा जा सकता है कि भ विपक्ष ऐसा क्यों नहीं कर पाया? एक विपक्ष के अंब्रेला के नीचे इतने लाखों छात्र एक साथ इस तरह से जंतरमंतर या सीपी पर या लुटियंस दिल्ली में क्यों नहीं इकट्ठे इकट्ठे हो पाए? सीजेपी ऐसा कर पाई आप उससे क्रेडिट क्यों लेते हैं? 2011 से यह सवाल का जवाब एक ही है। क्योंकि केजरीवाल की पर्सनल एंबिशन और ही आप ही कह रहे हैं कि केजरीवाल इज सो पावरफुल कि उसने तमन्ना किया और अब उसने सीजेपी अह को भी कामयाब कर दिया। केजरीवाल इज अ सो पावरफुल न्यूसेंस हम ये बहुत इंपॉर्टेंट है हम कि आपको समझिए कि एक मालवेयर आपके पूरे कंप्यूटर सिस्टम को या एक वायरस आपके पूरे पेंटागॉन हो आप फिर भी आपके कंप्यूटर सिस्टम को हैक कर सकता है तो पावर की बात नहीं है वो वो करप्ट की होने की बात है चाहे कंप्यूटर में हो चाहे सिस्टम में हो या किसी भी सिस्टम में हो केजरीवाल की स्टाइल ऑफ फंक्शनिंग क्या है? वो एक वायरस डाल देता है। जिस वायरस की वजह से कम्युनिकेशन, नरेशन और इतिहास तीनों में करप्ट वर्जन आने लगते हैं। तो अब वो ई20 के पीछे पड़ा है। क्योंकि ई20 क्या है? ई20 वो सिटी है जो अमित शाह को बचाएगी। ई20 के माध्यम से आप मांगेंगे क्या? नितिन गडकरी का इस्तीफा। तो नितिन गडकरी जाएंगे उसकी जगह दूसरे कोई आएंगे। जैसे देवेंद्र फडनवीस को वहां से बुला लेंगे या फिर यहीं के मंत्री कोई है। दूसरे यानी आरएसएस का कोई और दूसरा आदमी जैसे नए एजुकेशन मिनिस्टर हमारे प्रह्लाद जोशी जैसा है वैसे वैसा कोई दूसरा आरएसएस का आदमी सारंगी आ जाएगा जिसने वो ग्रामस्ट चेंज किया और उनके बच्चे मां बीवी की हत्या की थी। तो उसको मंत्री पहले भी बनाया था मोदी तो उसको बनाया गया। क्या फायदा है? हमें मोदी और शाह की सत्ता को चुनौती विपक्ष ने दी है। उस पर इंटरेस्ट है। और जब यह जब ये वृक्ष जो है विषव वृक्ष है वो गिर जाएगा तो शाखाएं अपने आप नीचे आएगी। ई20 का आपका प्रॉब्लम सही है। सबसे ज्यादा प्रॉब्लम केजरीवाल से ज्यादा मुझे है। क्योंकि मेरे पास पैसे नहीं है। उनके लिए तो 168 का भी भर सकते हो। लेकिन मुझे वही भरना पड़ता है और मेरी गाड़ी की बैंड बजती है। हालांकि दूसरे की गाड़ी मैं खरीद ले ले लेता हूं। इस्तेमाल के लेता हूं उससे वही भरता हूं। भर तो बात यह है लेकिन मुझे यह मालूम है देश के हित में अमित शाह का रेसिग्नेशन से डायवर्ट मोना नहीं चाहिए। वो डायवर्ट करने पर अब दूसरा पड़ाव केजरीवाल का लगा हुआ है। पहला था धर्मेंद्र प्रधान का उससे क्या हासिल हुआ? तो आप ये जो चाहती है कि विपक्ष एक आंदोलन ऐसा क्यों नहीं खड़ा? विपक्ष उसके कगार पर था। विपक्ष आंदोलन शुरू करेगा उससे पहले केजरीवाल पहुंच गया। जैसे उसको यही उसकी क्वालिटी है जो नकारात्मक है। भले क्वालिटी है कि ऐसा कुछ बनता हुआ दिखता है और उसका मुखिया वो नहीं। यानी उनकी क्या है प्रॉब्लम कि मोदी तानाशाह है। उनकी तानाशाही बिल्कुल चलनी नहीं चाहिए। लेकिन तानाशाही आनी चाहिए वो मेरी होनी चाहिए। और राहुल और उनके साथियों का कहना क्या है? देश एक वेलफेयर स्टेट बनना चाहिए। लोकतंत्र फिर बहाल होना चाहिए। और मिनिमम गवर्नमेंट और मैक्सिमम गवर्नेंस होना चाहिए और किसी क्रोनी का कुछ नहीं चलना चाहिए। केजरीवाल के पूरे एजेंडे में एक क्रोनी को बचाना है ही है। जिसकी देखिए मुझे बताइए आप तीन ही तो ऑर्गेनाइजेशन है। इस देश का बैंड बजा के रखा। एक आरएसएस दूसरी इंडिया अगेंस्ट करप्शन तीसरी सीजेपी तीनों रजिस्टर नहीं है। तीनों के खर्चे क्यों किसने किए? और आरएसएस तो अब 100 साल पुरानी हो गई। इंडिया अगेंस्ट करप्शन और सीजेपी का खर्चा किसने किया? आप बताइए मुझे पैसे आए कहां से? तो कह क्राउड फंडिंग से आए। बिल कहां है? आपको क्योंकि रजिस्टर ऑर्गेनाइजेशन नहीं है। आपको वेबसाइट पे देख नहीं सकते। ठीक है? देखिए जहां खर्चा है और जहां आय हुई है वहां एंट्री हुई है। एंट्री वो चीज है जो बच्चा पैदा होने जैसी है। आप वापस गर्भाशय में नहीं डाल सकते। तो जो एंट्रियां है वो डाल दो वेबसाइट। लेकिन जब उनसे ये सवाल पूछा गया तो उन्होंने ये कहा कि एक टेंट लगाने के लिए कितने पैसे की जरूरत है? किसको पूछा गया? ये सीजेपी को पूछा गया। सीजेपी यानी किसको? दीपके वगैरह को पूछा गया। दीपक को पूछा गया कि भाई आपके पास लोग पूछ रहे हैं कि आपके पास यह पैसा कहां से आ रहा है? इतने दिन से यह प्रोटेस्ट चल रहा है। तो उन्होंने कहा कि खाना तो आप देख रहे हैं कि लोग लेकर आ रहे हैं यहां पर यह सब कुछ हो रहा है और टेंट में कितना पैसा खर्च हुआ होगा? कितने पैसे यहां पर लगे होंगे? तो वो ये सवाल वो ये कह रहे हैं कि भाई मैं मैं आपको एक बात बताता हूं। आपको अ सामाजिक काम के लिए आप बैठी हो कहीं पर। है ना? हम तो लोग आपको दान देने लगते हैं। फ़ूड के स्वर रूप में कुछ मेडिकल फैसिलिटीज़, कुछ एंबुलेंससेस, कुछ पैसे पैसे तो देते ही देते हैं। बिना पैसे के कुछ तो व्यवहार होता ही है। है ना? हम्। यह सारे चीजों का अगर एक अह आपको इन्होंने एक सामाजिक ऋण को पे करने के लिए लोगों ने ये सारा किया है तो क्या उसका हिसाब नहीं रखा जाता? तो क्राउड फंडिंग से जो चीजें होती है उसका हिसाब नहीं रखा जाता। कोई नहीं रखता हिसाब। ऐसा कहां से कब से होने लगा? यानी आप ट्रस्ट बनाते हो, आप एनजीओ बनाते हो, आप कुछ भी करते हो, आप रास्ते पर एक जुलूस भी निकालते हो। हम तो वो जुलूस में हां ये अमित साहब ने ₹50 दिए। ये भल्ला साहब ने ₹100 दिए। इनके यहां से खाना आया। यह लिखता है ना कोई ना कोई या नहीं लिखते हैं ताकि पता चले कि किसने क्या दिया और जो बचा है वह किसका है? क्योंकि वह कलेक्टिव मलकियत होती है ना उसके ऊपर। अगर वह क्राउड फंडिंग है तो उसके ऊपर देश का हक है पूरा मालिकाना। अगर देश का हक है तो बचा हुआ कहां गया कहां से? कहां पे? हम्म। ये तो राम मंदिर वाली ही बात होगी। वैसे वो लवकुश मंदिर बनाने वाले हैं, लेकिन यह राम मंदिर वाली, वह मॉडल सेम है आरएसएस का। आरएसएस, इंडिया अगेंस्ट करप्शन और कॉकरोच जनता पार्टी मॉडल सेम है। आपको रजिस्टर करना नहीं है। कहना है कि क्राउड अब आप देखिए सौरभ दास जो क्राउड फंडिंग की बात कर रहा है 200 आती है वो कर देते हैं। अब तो ₹200 में कोई भी पोस्टर नहीं आता है। डीप के जो आप जो बोल रहे हैं। यही बात नहीं भागवत बोलते हैं। आप लगा के देखिए दो दो फुटेज अपने ही एपिसोड में लगाइए। हम्म। भागवत बोलते हैं लोग देते हैं हमको। हमारा तो लोगों का जमावड़ा है। हमारा ही कोई ऑर्गेनाइजेशन नहीं है। हमको लोग देते रहते हैं। हम करते रहते काम। यही सीजेपी बोल रही है। यही इंडिया अगेंस्ट करप्शन बोलती थी। तो क्या मेरे सामने अन्ना के गांव में झगड़ा हुआ था। ₹4 करोड़ आए हैं। मुझे दिए नहीं। इस बात से तब कुमार विश्वास सारे ये लोग गए थे उधर। कुमार विश्वास को मालूम था या नहीं मालूम है। लेकिन वो बाहर घूम रहे मैंने देखा लेकिन यह बात तो अन्ना को पसंद नहीं है कि मेरा फेस यूज़ करके इन्होंने पैसे इकट्ठे किए और मुझे नहीं दे रहे। तो लोगों ने इन लोगों ने क्या कहा कि अन्ना लेकिन इंडिया अगेंस्ट करप्शन कोई रजिस्टर्ड ऑर्गेनाइजेशन नहीं है। तो अपना कोई हिसाब है ही नहीं है ऐसा। तो ना खाता ना वही जो अरविंद कहे वही सही। हम ये तब से चल रहा है। तो क्या राजू जी फिर आप ये सीजेपी के अंब्रेला के तहत मैं सी बीजेपी को इस आंदोलन का हिस्सा नहीं मानता। ओके ये आंदोलन के हिस्से बने हम तो कालनेमी जितना हनुमान के गुरु थे उतने ही ये गुरु है इस आंदोलन के हम कालनेमी नाम के राक्षस थे ना वो गुरु थे वो भष बदल के आते थे रावण जितना साधु बनके सीता के पास आया था ना ये सारी देखिए हमारी जो मिथक है हमारे जो मिथक है माइथोलॉजिकल स्टोरीज है उसमें हमेशा राक्षस राक्षस नहीं होते एक्चुअली राक्षस पे विश्वास नहीं राक्षस भी इंसान है और वो वो तो जाति वर्ण व्यवस्था के ऊपर है लेकिन उस पे मैं जाता नहीं हूं जो भी राक्षस और बड़ा पावरफुल व्यक्ति दिखाते हैं वो भष बदल के आता है वो साधु बन के आता है साधु बनके ही आता है हम तो मैं सीजेपी को इस आंदोलन का ना ही मुखिया मानता हूं ना ही उनको सारे युवाओं और देश की तरफ से कोई पावर ऑफ अटर्नी देने के पक्ष में हूं हम और ना ही उनको कोई क्रेडिट है क्योंकि आज भी वह ऐसे इंटरव्यूज दे रहे हैं पड़ोसी को बच्चा हुआ इमीडिएटली सौरभ दीपके तो कम आता है लांका दोनों लगे रहते हैं कि अ हम बधाई देते हैं हमने लगातार और निरंतर कोशिश की उनको बच्चा हुआ तो ये ये मजाक है लेकिन इस लेवल पे कोई भी घटना घटती है देखिए अब पश्चिम बंगाल और कई स्टेट्स में बिहार में स्टूडेंट्स पे केस नहीं करेंगे। यह बात सरकार ने कही इमीडिएटली आके हमारी निरंतर कोशिश है। कौन सी कोशिश है? आप उस दिन घर गए। आपकी मां ने हारवार पहना यार। आप मुझे बताइए कौन से आंदोलनकारी जबकि वो जिस सत्ता के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं। वो आंदोलन खत्म होने के बाद उनको घर जाके मालावाला मां को पहनाने के लिए वक्त मिलता है। और सरकार पुलिस जाती भी नहीं है उनके पास। राजू जी लेकिन मेरा सवाल ये है कि हम अगर इसको शुरू से देख रहे हैं जैसे आपने एक एक खाका खींचा है कि कैसे दीप के जो है उसको परमिशन मिली उसके बाद ये ये शुरू हुआ प्रोटेस्ट शुरू हुआ और एक भी लाठी नहीं लगी सब लाड़ प्यार हुआ वही गुपचुप जाके बात कर दी चुपचाप जाके और उनको उनको जिस तरह का वीवीआईपी पूरा ट्रीटमेंट पूरा का पूरा स्टूडेंट और जो यूथ था देश का लड़ रहा था रास्ते पे आज भी लड़ रहा है सरकार के खिलाफ उनको इन दोनों ने बेच दिया। जबकि अगर बेचना ही था तो नेता विपक्ष जो है राहुल गांधी उनको मिलने तो बाहर आए थे जितेंद्र सिंह वहीं पे राहुल गांधी बोल देते ये डील है और कर दो आप खत्म। वहां रेसिग्नेशन मांग लेते तो कर देते रेिग्नेशन। तो राहुल गांधी ने उनको यू आर इररिलवेंट बोल के वापस भेज दिया। और यह दोनों जाके करके आते हैं। यह अपने आप में हिंदुस्तान के सारे युवा जो लड़ रहे हैं उनके खिलाफ आप पार्टीज केजरीवाल और ये लोग जो हैं सीजेपी नाम का उनका ऑिलरी स्ट्रक्चर उन्होंने किया हुआ घोर अद्रोह है। और उसको हिंदुस्तान के इतिहास में जैसे अह इंडिया अगेंस्ट करप्शन को माफ़ नहीं किया जा सकता। जो मनमोहन को झूठे आरोप लगाए अह और यह आप पार्टी का निर्माण हुआ। उसी तरह से इस चीज को माफ नहीं किया जा सकता। लेकिन मेरा सवाल ये है कि बदला क्या है? राजू जी बदला क्या है? इस प्रोटेस्ट के बाद देश में क्या बदला है? मेरा सवाल यह है। यह प्रोटेस्ट हुआ। छात्रों ने लाठियां खाई। छात्रों पर केसेस हुए। छात्राओं पर केसेस हुए। उनकी उनका कैरेक्टर कैरेक्टर असेसनेशन हुआ। उनके घरों तक पुलिस पहुंची। उनके समाज ने एक तरह से बहुत जगहों पर उनका बहिष्कार तक किया। पेरेंट्स जब इतना ज्यादा प्रोटेस्ट हुआ तो वो एक तरह से डिसोन भी करते हुए नजर आ रहे हैं बच्चों को कि नहीं बहक गए थे मोदी जी इन्हें माफ कर दें। इस तरह की चीजें भी वो करते हुए नजर आ रहे हैं और धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो गया। मेरा सवाल आपसे यह है कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से इस देश में क्या बदला? इन युवाओं को क्या मिला? मेरा सवाल है आपसे। यही मैं बोल रहा हूं कि कल नितिन गडकरी के पीछे इस्तीफे के पीछे केजरीवाल लगे हुए हैं। हम् वह आपको गोलपस से दूर लेके टारगेट दे रहे हैं जिसमें आपको टाइम और एनर्जी वेस्ट कराने पे लगे हुए हैं। मेरा यह मानना है कि अगर आप जो नेता विपक्ष राहुल गांधी कह रहे हैं कि हमें रेसिग्नेशन अमित शाह की चाहिए। जो गृह मंत्री अपने बच्चों पर AK-47 और पैेट गन चलाता है जो इजराइल में नहीं गाज़ा में किया अपने देश में नहीं वो ये अपने देश में ही कर रहा है उसका रेसिग्नेशन और बाद में उसकी ट्रायल होनी चाहिए तभी बच्चों को न्याय मिलेगा और बड़ी बात बोल रहे हैं आप ये बहुत बड़ी बात बोल रहे हैं आप इसमें इसमें न्याय का राज्य अगर है तो यही इसी तरह से जाता है आगे हम आप बात समझिए कई कई बार हमने जो पहला एपिसोड किया था जब लोगों को कुछ भी मालूम नहीं था तो लोग कई मुझे बोलते थे अरे इतना बड़ा आंदोलन हो रहा है उसमें तुम क्यों बीच में आ रहे हो ऐसा क्यों खिलाफ बोल रहे हो मैं आंदोलन के खिलाफ नहीं बोल रहा हूं आंदोलन में कुछ ऐसे षड्यंत्रकारी तत्व घुस जाते हैं जिसे जिससे यह आंदोलन को वो खोखला बना देते हैं वो एक सिटी निकाल कर पूरे आंदोलन की पावर को कम करते हैं धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ऐसी ही एक चिट्ठी निकालना था जो केजरीवाल ने अपने लोगों बच्चों को लगाकर करवा दिया वो सीजेपी के अब यह नहीं सहना चाहिए अब हमें लगे रहना चाहिए अमित शाह के इस्तीफे पर और जिस तरह से प्रधानमंत्री मोदी उनकी तो क्या ही कहूं मैं उन्होंने जो इंस्टा पर आकर अपने रील बनाना शुरू कर दिया और उसमें उन्होंने जिन बच्चों पे पैेट गन से लेके AK-47 से लेके लाठियां चलाई गई है और आज भी उनको हंट कर रहे हैं, शिकार कर रहे हैं। पुलिस, प्रशासन, बजरंग एनएसए सारे लोग उनको यह माफ़ कर रहे हैं। एक्चुअली इनको माफी मांगनी थी। यानी ये किस दुनिया में रहते हैं? इनको इनको एक और इसकी ये बात जो हो रही है, इसके ऊपर वो जो चुकरोच जनता पार्टी जो है जनता पार्टी वह उसके जो चारप प्रवक्ता हैं वह क्या बात करते हैं? थैंक यू। पहले तो सौरभ दास ने यह बात की कि जिस लड़की ने कुछ अभद्र अभद्र बात की उसको न्याय अब यानी लीगल प्रोसेस से गुजरना ही चाहिए। फिर उसको देखा कि देश पूरा इसके खिलाफ है। उसके बयान के तो उसने अपनी गाड़ी की वो बदल दी। स्टयरिंग मार दी। तो ये जो है कौन ये लोग? यह लोग इररेिलवेंट है, इनसिग्निफिकेंट है और इस देश के युवाओं का आंदोलन है। उसके खिलाफ काम कर रहे हैं। तो आप देखिए कि किसी भी युद्ध में, किसी भी लड़ाई में, किसी भी मोमेंट में, किसी भी स्ट्रगल में हमारे खिलाफ जो लोग होते हैं, उनके और हमारे बीच में कुछ ऐसे अ एक ऐसे टाइप के लोग होते हैं जिनके अपने ही महत्वाकांक्षा के लिए वो जी रहे हैं। उनको देश समाज से कुछ नहीं होता। वो सारी जो देश विरोधी ताकतें हैं उनसे हाथ मिलाने के तैयार होते हैं। जैसे आपने वो 300 फिल्में देखा ना वो जो अपाहिज होता है वो सारी राज बता देता है 300 की वो रोमंस रोमंस की जो राज बता देता है वो पर्शियन सम्राट को और उनको वो मारे जाते हैं। वैसे ही ये जो होते हैं वो आते तो आपको इंडिया गठबंधन हो हां आपका सही है। देखिए केजरीवाल ने तीन बार बचाया है मोदी जी की सत्ता को। एक बार तो मैं बता ही दूं धनकड़ साहब का जब इस्तीफा हुआ। दूसरा तो बता दूं नीतीश कुमार को जब कन्वेनर बनाने जा रहे थे इंडिया गठबंधन का तो इन्होंने और ममता ने विरोध किया। ये ऐसे मौके थे जिससे मोदी की सत्ता पूरी तरह इसलिए इस बार देखिए अब अब देखिए वहां पर अनशन पे एक सज्जन बैठे थे। अब उनका नाम लेना भी ठीक नहीं क्योंकि वह इरिलवेंट है। वो बोले राहुल गांधी को यहां आना चाहिए। वो नहीं आए तो बहुत बुरा होगा उनके लिए। हम फिर राहुल गांधी लड़ाई में पहले से थे। राहुल गांधी जानते थे कि ये किसका कौन मोहरा है। वो उन्होंने प्रधानमंत्री कार्य आवास के बाहर ही आंदोलन शुरू किया। अब आंदोलन जब देशव्यापी है तो अह ये क्या राम मंदिर है जंतरमंतर कि वहीं पे आना चाहिए सबको। नहीं ना राहुल गांधी मिलने क्यों नहीं गए उसका जवाब आपको बाद में मिल गया ना सेकुलरिज्म पे उनके वह गीतांजलि का जो भी बात आई वो खुद वंदे भारत की बात कर रहे तो राहुल गांधी को आने की जब बारी आई या राहुल गांधी जब उतरे तो राहुल गांधी को कोसने लगे ताकि पहला तो उनको यकीन था कि राहुल गांधी नहीं आएंगे इसलिए हम कोसते रह सकते हैं। जब राहुल गांधी रास्ते पे ही उतर गए जबकि उनका खून ही बहा तब वह कोसना बन करके वह एकदम बैकफुट पर गए। फिर वह कंफ्यूजन में इतने गए कि उनको पता नहीं चला और फिर वो कंफ्यूजन इस लेवल पे गया कि वो अपना रांका और सौरभ दास जाकर अंधे अंदर उन्होंने डील अपना बजाकर आ गए। अब इसमें धर्मेंद्र प्रधान जाकर प्रह्लाद जोशी आए तो देश का क्या भला हुआ? वही देश अपने आप में अंदर एक भावना लेकर बैठा है कि मोदी और शाह को अब सत्ता में रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। उन्होंने जो 12 साल से भारत की अमन पसंद संविधान पसंद लोकतांत्रिक गंगा जमीनी तहजीब वाली जनता को एक तरफ एक तरफ़ा जंग में रखा है और उस जंग में पैेट गन से लेके इजराइल के पैगसस तक और इजराइल के जो जो उनके आकाओं के जो भी साथियार आते हैं उनमें इस्तेमाल करके उनके साथ जंग छेड़ी उसमें नोटबंदी हो या कुछ 50 चीजें उसके लिए लोग तैयार नहीं और दूसरी चीज इस बीच एमनेस्टी का एक वो भी आया कि गाज़ा में जो हुआ उसके लिए सारी दुनिया नित्यनियों को क्रिमिनल मान रही है। उनको हथियार मोहया कराने में मोदी सत्ता आगे थी। हम ये देश के इतिहास में यह बहुत बहुत डार्क चैप्टर है। भारत को हमेशा एक मोरल पावर माना जाता था। यानी किसी दो देशों के बीच में युद्ध होता था तो भारत को पूछा जाता था हमारी राय क्योंकि हम किसी के साथ गलत तो खड़ा ही नहीं रहते थे। हम इनको कोई साध्य साधन सुचिता नहीं है। कोई विवेक नहीं है और अपने देश के जनता के ये शत्रु है। तो आप अभी अमित शाह जी के इस्तीफे के पीछे जो लगे हैं वो इसलिए लगे हैं क्योंकि वो जिम्मेदार है। हमारे बच्चों पे लाठियां पड़ी। उन पे पैेट बगन चलाए गए। उन पे AK-47 चलाए गए। और रैंक एंड फाइल में मैंने जानता हूं कि कई आला अफसर है। जिन्होंने इंकार कर दिया सीधा गोली चला जा सकती थी और वो इंकार ही इनके डर का पहला कारण बना उसके बाद रील बनने लगे फिर फ्रेंड्स आया फिर अपनी सुरक्षा में बहुत अरे कल अमित शाह पुणे में थे हम वो तो दुर्भाग्य की बात है कि लोकमान्य तिलक के नाम का पुरस्कार एक तो अजीत ढोबाल को दिया गया और जिनके हाथों से दिया गया वो अमित शाह का हाथ तो तिलक साहब ने अपने स्वर्ग में होंगे तो करवट ली होगी। वो वो बुरा मान गए होंगे। अब क्या ही बोले? देखिए आपके आपके बाद आपके अनुयाई और आपके जो रिश्तेदार है वो आपका जो भी करते हैं उसके ऊपर आपका कंट्रोल नहीं होता। तो वहां पर पत्रकारों को काला रेनकोट काली डायरी तक मनाई करके रखी थी। इतना डरते हैं लोग और इसके बाद इतना नाकाबंदी घेराबंदी ट्रैफिक बंदी इतनी थी पुना के लोग इतना गुस्सा हो गए जब अमित शाह जा रहे थे तो उन्होंने हॉर्न आंदोलन किया सारी गाड़ी थी उन्होंने हॉर्न पे हाथ रखा ताकि आप सुन ही नहीं सकते वो देखिए फुटेज इनके प्रति जो देश में गुस्सा 140 करोड़ लोग इतना अगर आप पर गुस्सा है तो आप वोट चोरी करके जो बने हुए हो उस कुर्सी में बैठने का आपको अधिकार नहीं है। आप इस्तीफा दे दो और आपकी ट्रायल चलने दो। लेकिन क्या आपको लग रहा है कि अमित शाह यानी कि नंबर टू यानी कि उनको जिस तरह से राहुल गांधी ने कहा कि भाई एक को हीरो बना रखा है दूसरे को भगवान बना रखा है। यानी कि अमित शाह को हीरो और नरेंद्र मोदी को भगवान बना रखा है। और ये गुब्बारा जो है उनका फट गया है और यह गुब्बारा पूरी तरीके से अब देश के सामने आ गया है। तो क्या आपको लग रहा है वाकई में कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा तो इतनी बम मुश्किल से हुआ था और इसलिए हुआ ताकि अमित शाह और नरेंद्र मोदी को बचाया जा सके? इसमें भी कोशिश में लगे हुए हैं केजरीवाल ई20 वाला लिखा ताकि गडकरी गडकरी का इस्तीफा हां इस्तीफा हो जाए मतलब सबका हो जाए लेकिन अमित शाह और और नरेंद्र मोदी तक किसी तरह की कोई आंच ना पहुंचे लेकिन सवाल फिर यह है कि मेरा आपसे राजू जी कि जब इस आंदोलन के बाद अगर मैं आपसे कहूं कि पांच ऐसी चीजें जो आपको लग रहा है कि देश के लिए बहुत अच्छी हुई हैं तो आप क्या कह पाएंगे और पांच ऐसी चीजें जो आपको लग रहा है कि यह ठीक नहीं हुआ इस प्रोटेस्ट के जरिए और इसमें मैं ऑर्गेनाइज़र्स को अलग कर रही हूं। मैं जो युवा आए जिस तरह से उन्होंने अपनी बातों को रखा जो लगा पहली बार के कोई डर नहीं है, खौफ नहीं है मिडिल क्लास, अपार्ट मिडिल क्लास वो बच्चे आए जिनके माता-पिता बीजेपी के सपोर्टर रहे होंगे या अभी भी हैं और वो सामने निकल कर आए। एक तरह का रिस्क लेकर वो सामने निकल कर आए और अपने अंदाज में उन्होंने वो प्रोटेस्ट किया। तो आपके लिए वो क्या पांच बातें होंगी जिसको आपको लगता है कि आप एक उम्मीद की किरण देख रहे हैं इस मढ़ते हुए लोकतंत्र में और क्या आपको वो लगता है कि पांच चीजें ऐसी हैं जो नहीं होनी चाहिए थी और अगर बेहतर होती तो ये जो हम कह रहे हैं कि होना चाहिए अमित शाह का इस्तीफा या मोदी को जाना चाहिए वो हो चुका होता। सबसे पहली अच्छी चीज यह हुई कि भारत एक आर्गुममेंटेटिव देश था। वह वापस आ गया। ओके हम अब आप आर्गुममेंट करने लगे हो फिर से। अब आप किसी को भगवान नहीं मानते। दूसरी [खांसने की आवाज़] चीज है कि हम [गला साफ़ करने की आवाज़] इस्लामोफोबिया फैलाकर हिंदू मुस्लिम करने की जो कोशिश आरएसएस परिवार ने और मोदी सत्ता ने इजराइल के मदद से नृत्यनों की खास करके जायनिज्म की मदद से की थी वो पूरी तरह से उनका रायता फैल गया। हिंदू और मुसलमान अलग भले अलग धर्म हो लेकिन हिंदुस्तान की मिट्टी में दोनों एक है। ये बात फिर से एस्टैब्लिश हो गई। जेंस ही अब जब आपको आप हिंदू मुसलमान की बात करते तो मजाक उड़ाते हैं। ऐसे वीडियो भी आए लड़कियों के देखिए लड़कियों में वो अवेयरनेस है। वो कितनी साल की 202 तो ये आरएसएस के पुरोहित्स जो हैं उनके लिए यह अ डेथ बेल्स है। ये ये दूसरी बात तो मुसलमानों को अब डरने की जरूरत नहीं। हिंदुस्तान उनके साथ है जैसे था क्योंकि उनका ही देश है और मुसलमान हिंदुओं के साथ है इसलिए हिंदुओं को भी डरने की जरूरत नहीं। लेकिन ये बात दूसरी आई है। जी इस पे मैं आपको आपको रोकूंगी क्योंकि मैंने अभी भी देखा कि जब कावड़ यात्रा निकल रही थी तब भी एक मुसलमान को पकड़ के पीटा गया। मैं देख रही थी कि जो हिजाब पहने हुए महिलाएं हैं अपने शायद मां बेटियां हैं वो खड़ी हुई है और वहां पर कुछ युवा हैं और उस तरह के वो गीत गा रहे हैं ताकि वो अनकंफर्टेबल हो जाएं। और हो सकता है उनमें से वो युवा रहे हों जिन्होंने इस प्रोटेस्ट का साथ दिया हो या इस प्रोटेस्ट में वो रहे हों तो मुसलमानों के लिए क्या वाकई में आपको लग रहा है बहुत कुछ बदला है? मुसलमानों के लिए सब कुछ बदला है। उनको यह पता चला जनता उनके साथ है। आप जो बता रही है वह योगी मोदी और शाह की जो सत्ता जहां पर है वहां पर ये चीजें सत्ता से पुरस्कृत की जाती है वहां हो रही है। सत्ता जैसे ही चली जाएगी आपको पता ही नहीं चलेगा ये लोग कौन थे और कहां गए। वो छुप-छुप के घूमेंगे। जैसे आप समझिए कि इनको मोरल अथॉरिटी नहीं है इस देश में। हम इनको जो अथॉरिटी है वो चुराई हुई वोट चोरी से आई हुई सत्ता से आई हुई है। अब वहां जो हिंसा हो रही है ये सब आरएसएस पुरस्कृत है। यह बीजेपी पुरस्कृत है। मोदी शाह योगी इनकी जो सत्ता है उसके बल पे है। हम ये ऑर्गेनिक नहीं है। ये इस आंदोलन में देखा। अगर ऑर्गेनिक होती तो इतनी भीड़ ज़नजी से लेके जेनेक्स तक सब सब लोगों की हुई। वहां एक कावड़िया आके खड़ा रह सका। कोई हिंदू संगठन का आदमी मैं हिंदू मुसलमानों के बीच में फूट डालने के लिए आया और हिम्मत हुई ये सब कायर है और देखिए अगर क्या अगर कल राजू जी किसी छात्र को अगर लिंच किया जाता है मान लीजिए ये छात्रों का ही युवाओं का आंदोलन था मैं एक लार्जर पर्सपेक्टिव लार्जर पिक्चर की भी बात नहीं कर रही मैं बहुत एक नैरो एक सिचुएशन यहां पर ले रही हूं कि माना कि कोई एक छात्र या फिर किसी युवा कोई मुसलमान को अगर लिंच किया जाता है उसके घर को बुलडोज किया जाता है तो क्या आपको लग रहा है इनमें से कुछ युवा उठ खड़े होंगे? क्या वह इतनी हिम्मत दिखाएंगे? या फिर यह सिर्फ जंतरमंतर तक ही महदूद था? आपको जवाब दूं जी। हमने जो बात की उसके बाद जोहार यूनिवर्सिटी आप गई वहां उसको गिराने के गिराने से रोकने के लिए जो लोग सामने आए उसमें हिंदू नहीं थे। नहीं थे। ऑफ कोर्स थे। थे ना? तो अब वक्त बदल चुका है। हवा बदल रही है। एक दिन में सब कुछ नहीं बदलेगा। लेकिन जुनेद के लिए जो मुझे फोन आए, मैसेजेस आए वो सारे के सारे हिंदुओं के थे और इरफान के लिए उनका वीडियो देख के रोए। वो भी तो हिंदू थे मेरे जानकारी में। मुस्लिम तो थे ही लेकिन मुस्लिम ये डरे हुए थे कि ये इरफान भाई क्यों जा रहे हैं? इनमें इतना क्यों वो है? ऐसा सोच रहे थे चिंता से। हम हम क्योंकि यहां पर दिल्ली में केजरीवाल यानी बी टीम ऑफ़ आरएसएस शासन था। था तब शाहीन बाग में और दिल्ली दंगों में इनको ऐसे ही छोड़ दिया था। यह सारा सत्ता के एक सत्ता के बल पे किया गया चीज था और सत्ता में गलत आदमी बैठे थे तब ये हुआ। लेकिन अब जो जन जागृति है मैं जो दूसरा पॉइंट है ये सिर्फ मेरा कि उसमें इस्लामिक अ रिलजन यानी इस्लामोफोबिया का इस पीढ़ी में कोई भी स्थान नहीं है। हम मुसलमानों को अलग मानते ही नहीं है। मुसलमान तो हमें कभी अलग मानते ही नहीं थे। तो बात मोदी और शाह तक सीमित है। आरएसएस तक सीमित है। और 2019 में मैंने पहली बार कहा और आज फिर से दोहराता हूं। आने वाले 3 साल बाद आरएसएस के जो बड़े-बड़े ऑफिस बने वहां आइसक्रीम पार्लर खुलेंगे और उसके बाद आरएसएस के जो गणवेश है यानी जो यूनिफॉर्म्स है वो आप म्यूजियम में देखेंगे। ये तो आप बहुत ही एक मैं हमेशा आगे की बताता हूं ना। मेरे एपिसोड इसलिए कुछ लोग पसंद नहीं करते क्योंकि तत्कालिक सच उनको नहीं दिखता। हम उनको लगता है नहीं ऐसा हो रहा है। नहीं मैं बोला आगे की क्योंकि हमारा काम आगे की देखना है। जो तीसरा फायदा हुआ इस आंदोलन का कि मोदी और शाह ये दो लीडर को ये देश पूरी तरह से अपने गट से अंदर से नफरत करता है। युवा पीढ़ी नफरत करती है। ये टेबल पे आया। रिकॉर्ड पे आपके मोदी जी ने कुछ वीडियो डाला तो नीचे की कमेंट्स पढ़िए। हम हम तो अब इनके लिए अह वापसी का रास्ता बना। अब पीछे मुड़ने से गुजरा जमाना लौट के नहीं आएगा। ये तीसरी अच्छी चीज हुई। चौथी अच्छी चीज ये हुई इस आंदोलन की कि हमारा जो हमारी जो दोस्ती थी यानी ये बहुत बड़ा बड़े परिप्रेक्ष्य में मैं कह रहा हूं ईरान के साथ और हम फिलिस्तीन के साथ मान्यता देने वाले पहले देश हैं यहां के इसमें तो तो हमारी जो भूमिका थी उस भूमिका पे आज भी देश के लोग कायम हैं। पता चला हम इजराइल के साथ उनके नरसंहार में नहीं है। हम जाोनिस्टों के साथ नहीं है। हम यहूदियों के बचाने के पक्ष में थे। जो गांधी जी ने लिखा था वही आज की पीढ़ी भी सोचती है। ये इस आंदोलन से पता चला। और पांचवा हम और सबसे महत्वपूर्ण आप 12 साल तक यह सोचते रहे लोग और मैं नहीं कभी सोचा कि इस देश की जनता का विवेक और इस देश की जनता का विज़डम कभी कम मत आको जो गलती आरएसएस मोदी शाह और उनके गुज्जू क्रिस इन्होंने की गुज्जू का स्पेलिंग जी यू जे डबल ई डब्ल्यू हम तो वो एब्सोल्यूटली फाल्स और खोखली थी। ये इससे पता चला। ये पांच जो चीजें हैं हम उसके आधार पर मैं कह सकता हूं कल परसों अगले महीने या मार्च 27 से अप्रैल 27 तक मोदी शासन का हमारे देश से उच्चाटन निश्चित है। ओके। लेकिन शहा तो छोड़िए मोदी को इस्तीफा देना पड़ेगा। किस देखिए मोदी जी के हाथ से देश जा चुका है। कोई सुनेगा नहीं उनकी। आप सोचिए कि मोदी और शाह के कहने पर अब कौन सा ब्राइट ऑफिसर संविधान की जो मूल तत्व है उसको छोड़कर बस जो ना खाता ना वही जो अमित कहे वैसे ही इस बात पे काम करेगा। कर सकता है। उसे मालूम है एक न्यूरबर्ग ट्रायल जैसी ट्रायल उसका इंतजार करेगी। ऐसा करेगा तो वह अपने विवेक का स्मरण करके ही उसको काम करना पड़ेगा। हां जिनके वेस्टेड इंटरेस्ट है वो बहुत ही करप्ट है। वो लोग उनके साथ रहेंगे। हम लेकिन एक गैंग अपना ताकत खोती है तब भी आखिरी दिन तक गैंगस्टर्स कुछ साथ में रहती है। [गला साफ़ करने की आवाज़] ना यानी हिटलर के सुसाइड के दिन भी कुछ लोग बाहर बंदूक लेके घूम ही रहे हम इससे पहले मैं नेगेटिव पर आऊं। मेरे एक सवाल का जवाब दीजिए आप कि हम एक लोकतांत्रिक निजाम में हैं। तो कोई भी बदलाव बदलाव मतलब सत्ता परिवर्तन। अभी हम ये देख रहे हैं सारी एजेंसीज इनके पूरे कब्जे में है। खासतौर पर इलेक्शन कमीशन सबसे ज्यादा तो आपने इसके बारे में बोला है। एसआईआर से लेकर सब कुछ यानी कि वो चुन रहे हैं कि कौन होगा हमारा वोटर? वोटर नहीं चुन रहा कि सरकार क्या होगी। फिर आपको क्यों लगता है और कैसे आपको लगता है कि वो लोग जो 12 साल से सत्ता पर काबिज हैं, वो लोग जो ज्यादातर राज्यों में हैं। अब आपको ऐसा क्यों लगता है कि उनके अब जाने का समय आ गया है या अमित शाह और नरेंद्र मोदी ऐसे ही आसानी से चले जाएंगे क्योंकि जाने का मतलब सत्ता परिवर्तन और सत्ता परिवर्तन मतलब लोग उनके खिलाफ वोट करें और लोग उनके खिलाफ तभी वोट करें जब फ्री एंड फेयर इलेक्शन होंगे तब एजेंसीज फ्री एंड फेयर होकर काम करेंगी तो आपको क्यों लगता है कि ऐसा हो जाएगा मेरे लाइफ में मेरे बाबा से मेरे पटी नहीं कभी इसकी वजह यह है कि मैं बॉक्स टाइप सोचता ही नहीं हूं। मैं हमेशा आउट ऑफ बॉक्स सोचता हूं और बाबा को बिल्कुल पसंद नहीं था। हम बड़े अनुशासित व्यक्ति थे। आपने जो अब इसका कॉन्टेक्स्ट ये है कि आपने जो सवाल पूछा उसका जवाब ये है कि आप अभी भी उसी अ सोच में लगी हुई हैं। हम कि अब आज से उन 2029 आएगा फिर इलेक्शन होंगे। हम वो इलेक्शन के टाइम में मोदी प्रधानमंत्री रहेंगे और शाह गृह मंत्री रहेंगे और वह इलेक्शन में वोट चोरी होगी और फिर कहां से कहां होगा फिर कौन यही आएंगे आप विद्रोह की बातें कर रहे हैं मैं विद्रोह की बात कर नहीं रहा विद्रोह हो चुका है हम देखिए विद्रोह बाहरी चीज नहीं है। विद्रोह अंदर होता है। लोग इनको मानते नहीं है तो मानते नहीं है। आप आज की तारीख में राहुल गांधी की पॉपुलैरिटी और मोदी की पॉपुलैरिटी को कंपेयर करके देखिए। दो स्टॉल लगाइए। एक पे बोले कि ऑटोग्राफ देने के लिए मोदी जी बैठे हैं और एक स्टॉल पे जाइए कि एक एक स्टॉल पे राहुल गांधी ऑटोग्राफ देने के लिए बैठे हैं। मैं आपके साथ बेट लगाने के लिए तैयार हूं। कैसे कितने 5- 5 लाख लगा के लगाते हैं। अभी तो है नहीं लेकिन बाद में मिल जाएंगे। [हंसी] हां। मैं गारंटी देता हूं। मोदी [गला साफ़ करने की आवाज़] के भक्त पेड़पड़ भक्त जो होते हैं उनके हर जगह जाते हैं हर देश में वह नहीं आए जनता रही तो वहां कोई ऑटोग्राफ लेने के लिए जाएगा ही नहीं इतिहास का वो भुला बिसरा पन्ना है जिसको हिंदुस्तान की जनता फाड़ के फेंक देना चाहती है क्योंकि जनता लज्जित है इस बात से कि जिस व्यक्ति ने दो और छह आठ आठ एक और सात आठ दैट्स व्हाई यू आर माय फ्रेंड [हंसी] ऐसा कहा वो क्या ही यार वो रात को जिस तरह से फ्रेंड भी बोलते हैं एजेंसीज भी पीछे लगवाते हैं डंडे भी मारते हैं छुपते भी हैं और दादागिरी भी करना चाहते हैं। ये सब एक साथ नहीं होता। पीसफुल ट्रांसफर ऑफ पावर कितनी महान और महत्वपूर्ण चीज है। हम इसका पता आरएसएस मोदी शाह को बहुत जल्द पता चल जाएगा। जो पीसफुल ट्रांसफर ऑफ पावर से उतरे सिंहासन से दिल्ली में वो शांति से सो गए और बाद में भी रिस्पेक्ट और पेंशन लेते रहे। इनके नसीब यह सारी चीजें नहीं होगी। तो आप ये कह रहे हैं कि ये ऐसे ही सत्ता छोड़कर जाएंगे और सत्ता का हस्तांतरण इसी तरीके से होगा। आप 2029 तक जान जाने की बात नहीं कर रहे हैं कि इफ आई एम सेइंग 2019 जो जो आप सवाल पूछ रही है उसका जवाब आपको भी अच्छी तरह से मालूम है। आप नजदीक से देख रही है कि हो क्या रहा है और होगा क्या? हर कोई यह दिखाने की कोशिश करेगा एक साल में कि मोदी जी के साथ तो मैं था ही नहीं। मैं अंधभक्त था ही नहीं। मैं एक्चुअली इनके बहकावे में आया था। यह गलत था। एक्चुअली मैं था ही नहीं वहां। या आप प्रेडिक्ट कर रहे हैं एक और बात। सर मैडम मैंने प्रेडिक्ट की हुई कौन सी बात हां वही मैं बोल रहा हूं इसीलिए मैंने इसीलिए और आपने जो सवाल पूछा आपने पीछे वाला एपिसोड पिछले वाला एपिसोड जिसमें लाल शर्ट मैंने पहना है वो निकाल के देखिए मैंने आपको ये पूरी क्लेरिटी से कहा है 2029 के इलेक्शन की बात मत करिए लोग उठेंगे सड़कों पर आएंगे 2029 के इलेक्शन तक इनके जाने का इंतजार नहीं करेंगे। ये बात मैंने उस एपिसोड में बोली है जिस एपिसोड में कोई सुगबुगाहट भी नहीं थी दिल्ली के रास्तों पर कही थी तो मेरा कोई भी कहना हम उस कल्पना से मेरी मेरा इश्क नहीं होता मेरा तर्क मेरा इंट्यूशन उसका करेक्ट कॉम्बिनेशन और परिस्थितियों के बदलते अरे उस दिन स्पेन में इमीग्रेंट्स आने लगे जैसे ही आने लगे तो मुझे पता चला तो मैंने इमीडिएटली मेरे एक स्पेशल कॉरेस्पोंडेंट एक विदेशी अखबार किया उनको बोला कि इसमें नित्यन हूं और जायोनिज्म का हाथ होगा। जबकि स्पेन में भी यह मालूम नहीं था। हम अब ये मैंने तो अपने रूम में था। मैं उनको लगा होगा मेरे क्या सोर्सर्सेस है लेकिन कुछ भी नहीं। मैंने किसी से बात नहीं। मैंने कहा ये मोरक्को से किया होगा और इसमें नेताओं का हाथ होगा जो इन्होंने आधिकारिक रूप से मान नहीं लिया। तो आप समझिए कि छह और दो आठ होते हैं और सात और एक आठ होते हैं। इसलिए आप मेरी दोस्त नहीं है [हंसी] क्योंकि आप मेरी दोस्त है इसलिए आप मेरी दोस्त है। इसके लिए मुझे ये दो अंकों का मिलना जरूरी नहीं है। बिल्कुल तो मेरे तर्क के लिए आगे बढ़ाने के लिए या तर्क से मैं जो देखता हूं जो दृष्टि है उस दृष्टि से मैं जो बता रहा हूं मैं आपने बोला किस फिर पीसफुल ट्रांसफर ऑफ पावर बहुत अच्छी होगी ऐसा लगेगा। इसकी वजह है कि इनके प्रति जो देश के मन में नफरत देखिए आप चुनना लोग चुनते नहीं ना आपको यह तब आपको सत्ता से उतरना चाहिए जिस चुनाव को रिक करके आप बैठे सत्ता में तो लोगों की आपके प्रति नफरत बढ़ती जाती है वो ऐसा कुकर है जो ऐसा ज्वालामुखी है जो फट्टा है हम तो आप उसके ऊपर बैठे हैं तो आप समझ ही लीजिए हम दो तीन मेरे लास्ट सवाल आपसे राजू जी एक तो ये कि आप क्या इस प्रोटेस्ट के कुछ नेगेटिव्स भी देखते हैं। दूसरा मेरा सवाल आपसे यह कि अब जबकि यह प्रोटेस्ट खत्म हो गया है। अभी भी हम यह देख रहे हैं कि जो सीजेपी से जुड़े लोग हैं इनका वीवीआईपी ट्रीटमेंट तो हम देख ही रहे हैं। ये उसी गोदी मीडिया पर जाकर बैठ रहे हैं। जिन्होंने दहशत गर्द कहा था। जिन्होंने वहां जाकर फटके नहीं थे। उसको कवर नहीं किया था। आप उसी से ही सौरव दास रूबिका लियाकत से मैं नाम लेकर बोल रही हूं। रूबिका लियाकत से पूछ रहे हैं कि आपकी हमसे क्या एक्सपेक्टेशंस हैं? आप रूपिका लियाकत से पूछ रहे हैं आप कि हमसे क्या एक्सपेक्टेशंस है और फिर वो बता रही है कि देखिए सौरभ मैं आपको यह बताना चाहती हूं तो आप तो यह कितना बड़ा धोखा है ऐसे वक्त पर आपको गुस्सा मन में आता है तो एक लाइन आप सिर्फ गुनगुनाइए बाकी तो कायनात आपके साथ आएगी हम वो लाइन है अंगे गात [हंसी] [हंसी] हां तो अब दूसरी बात ये सीजेपी [नाक से की जाने वाली आवाज़] का मैटर जो है वो गोदी मीडिया में जा रहा है इसलिए दुखी होने की जरूरत नहीं हम आखिर आप जिसका हिस्सा हो वहीं आप जाते हो ये लोगों ने और बेसिकली आप पार्टी ने केजरीवाल की गोदी मीडिया तो था ही उनके साथ लेकिन 90 क्योंकि उनका डील ही जिनके साथ था वोट गोदी मीडिया चलाते हैं। लेकिन उन्होंने 90% YouTube मीडिया को भी गोदी मीडिया अपना गोदी मीडिया बना लिया। आम आदमी पार्टी की बात कर रहे हैं। हां तो वो जो आप कल तक मोदी शाह के खिलाफ बोल रहे वो आज भी मोदी शाह के खिलाफ बोल रहे हैं। लेकिन ऑन केजरीवाल टर्म्स एंड कंडीशन ताकि मोदी शाह के खिलाफ गडकरी रिजाइन करें। मोदी शाह के खिलाफ धर्मेंद्र प्रधान रिजाइन करें। यह जो गोलपस को बदल के आप केंद्र तक नहीं जाने दे रहे हैं। वो जो खेल है उस खेल का 90% YouTube मीडिया के ओनर और जो पत्रकार है वो हिस्सा बन गए क्योंकि इसमें वही खेल है जो ओरिजिनल गोदी मीडिया के साथ क्रोनीस और दो और दो चार खेल रहे हैं। तो क्या इस प्रोटेस्ट का यह नेगेटिव आप देख रहे हैं कि यह बहुत बड़ा नेगेटिव है कि YouTube मीडिया की आप 10% ही लोग हैं जिन पे आप भरोसा कर सकते हो कि वो क्रांति के साथ है अप्राइजिंग के साथ और और दूसरा दूसरा क्या आप ये नेगेटिव देख रहे हैं कि एक तरह से युवाओं का गुस्सा कुछ हद तक सप्रेस हुआ वो आए उन्होंने अपनी बातों को रखा डंडावंडा खाया तो गुस्सा उनका और बढ़ा लेकिन एक हद तक कहीं वो सप्रेस हुआ लेकिन उसका सीधे तौर पर नुकसान बीजेपी को नहीं हुआ और सीधे तौर पर फायदा कांग्रेस को नहीं हुआ। इसको आप कैसे देख रहे हैं? गुस्से का फायदा या नुकसान इस तरह से तब नापा जाता है हम जब फ्री एंड फेयर एंड लेवल प्लेइंग इलेक्शंस होते हैं। स्थितियां ऐसी नहीं है युवा को सबसे ज्यादा बखूबी मालूम है। तो लेवल प्लेइंग फील्ड नहीं है। इलेक्शंस फ्री एंड फेयर हो नहीं रहे हैं। एनिमी ऑफ द पीपल वन वन वन मोर एनिमी ऑफ द पीपल ज्ञानेश गुप्ता चुनाव आयोग के कर्ताधर्ता है। वह चुनाव आयोग पूरी तरह से बीजेपी के पाले में डाले पड़े हैं। डाल डाल के बैठे हैं। ये सारी चीजों का ज्ञान युवाओं को है। देश की जनता को है। यह तो अब पता चल ही गया है। हर जगह बोल रहे थे ना चोरी करके आए हैं इलेक्शन। तो उसके बाद यह जो गुस्सा है वो कम नहीं होगा। आप बैलट पेपर पे इलेक्शन करो और फ्री एंड फेयर इलेक्शन जीत के बताओ तब हम माने। अब जीतेंगे ही कैसे? जो आपको चैलेंज कर रहे हैं वही तो वोटिंग करने वाले हैं। तो वो कर नहीं सकते। इनकी मांग पूरी नहीं हो सकती। इनका गुस्सा कम नहीं हो सकता। तो कोई गुस्सा कम नहीं होगा। और जो फायदा नुकसान की बात है जब लड़ाई लड़ते हो तो लंबा फायदा और लंबे नुकसान का सोचते हैं। छोटा फायदा और छोटा नुकसान बाद में। अभी मोमेंट्री है। अभी ये जो गुस्सा है वो जो हम देख रहे हैं उसको लग रहा है राहुल गांधी लगातार इन बातों को उठा रहे हैं। राहुल गांधी को लग रहा है कि अभी जाहिर सी बात है वो युवाओं की की बात उठाते रहे हैं। एक मोमेंटम है वो अमित शाह का इस्तीफा मांग रहे हैं। मेरा सवाल आपसे यह है कि क्या इस मोमेंटम को इस गुस्से को क्या राहुल गांधी दूर तक ले जा सकते हैं? क्या इस तक ले जा सकते हैं? राहुल गांधी की जरूरत राहुल गांधी दूर तक ले ही जा सकते हैं लेकिन वो दूर तक जा चुका है। भारत में जो शाह ने किया लड़कों के साथ लड़कियों के साथ स्पेसिफिकली अंडर 18 जो लड़कियां थी उनके साथ किया उनके चेलर चौपाटो ने किया और मोदी जो कर रहे हैं वो क्राइम अगेंस्ट ह्यूमैनिटी है और एमनेस्टी का रिपोर्ट आने के बाद ये दिख रहा है कि इनके क्रोनीज़ और ये मिलकर इंटरनेशनल लेवल पे वो भी वो क्राइम ऑफ़ ह्यूमैनिटीज के हिस्सा बन रहे हैं। हम्म तो राहुल गांधी सिर्फ बोलेंगे लेकिन यह तो ऑन पेपर आ गया है हर चीज। इट्स अ डॉक्यूमेंटेड थिंग। आपने AK-47 घर पे दिखी घर के बच्चों पे चलाई। आपने दिखा आठ फायरिंग किए हैं। आठ राउंड्स फायर किए हैं। पैेट गन लोगों के आंखों में जाके आंखें वो अंधी हो गई औरतें और आदमी। ये सारी चीजें जो है वो क्राइम अगेंस्ट ह्यूमैनिटी है। वो आपने जो नित्यान गाज़ा और लेबनान में कर रहा है वो अपने देश में ही आप कर रहे हैं और ऊपर से आप नित्यन को गाज़ा में करने के लिए कुछ हथियार मुहैया करा रहे हैं। तो आप ओवरऑल क्राइम अगेंस्ट ह्यूमैनिटी के हिस्सा हो तो पूरे इंटरनेशनल कम्युनिटी आपको इसके लिए बख्शीश तो जरूर देगी। तो कोई बोले ना बोले इनका अंत निश्चित है। देखिए ऐसा है कि हमारी जो मिथक कथाएं हैं रावण, दुर्योधन, जरासंध, कंस इनकी भस्मासुर, कालनेमी ये सों की कहानी यही है। दिल्ली में जो शासक है उसको याद रहे इसलिए हर साल रावण का पुतला दहन करते हैं। हम कि इतना शक्तिशाली था। लेकिन अहंकार से जब वो लूटपाट करने लगा और औरतों पे यानी बेटी बचाओ की जगह उससे बेटी बचाओ का आंदोलन करना पड़ पड़ने लगा तब उसका दहन हो गया और यही दिल्ली में हर साल करते हैं तो और वो प्रधानमंत्री के हाथ से इसलिए करते हैं कि प्रधानमंत्री याद रखे हम हम है ना ये ये हमारा एक सुंदर सा मिथक है लेकिन प्रधानमंत्री को समझाई नहीं ये बात हम उन्हें अभी भी ऐसा लगता है कि वो रील बनाकर और सीधे संवाद उनको ऐसा नहीं लगता नहीं लगता उनको क्योंकि आपको कुछ तो करना चाहिए ना ज़ार को जब तक पकड़ के साइबेरिया लेके नहीं गए उसके फैमिली के साथ तब तक वो कुछ ना कुछ करता रहा जैसे हिटलर ने बंकर में जाके खुदकुशी नहीं की तब तक सुबह भी भाषण किया था उसने उस पे मत जाइए हाथ को देखिए हम कांप रहे थे हाथ अ मराठी में एक बहुत अच्छा गीत है। अ मुझे ठीक से याद नहीं आया लेकिन मैं बताता हूं आपको और उसका जवाब है पीते दूध डोले मिटुने जात मांजराची मनी चोरटला कारे भीती चांदणची इसका मतलब बिल्ली दूध पीती है ना वो आंख बंद करके पीती है उसको लगता है मेरी आंख बंद है तो कोई देख नहीं रहा है और रात को को जो आसमान में तारे आ जाते हैं उससे उजाला हो जाता है। उसको चोर को उसका डर लगता है। अब वो आसमान का थोड़ा सा उजाला उससे चोर पकड़ा जाएगा ऐसा नहीं है। और यह भी नहीं है कि बिल्ली को आंख बंद करने से पकड़ने से रोका जाए। मोदी जी जो कर रहे हैं तो पीते दूध डोले मिटुनी जात मांजराची [गला साफ़ करने की आवाज़] वो उनके रील का एक ही लाइन में सार मराठी में ये है कि बिल्ली की जात आंख बंद करके दूध चोरी का दूध पीती है कि मालिक को छुपा के मालिक जनता है जनता को मालूम है बिल्ली दूध पी रही है तो वो तैयार ही है वो आंख बंद करके जब खोलती है और पी दूध पीना शुरू करती है तो जनता बैठी है, देख रही है। तो वह जो वीडियो बना रहे हैं हम अच्छा है और बनाएं। हम तो इस पर मैं ये कहूंगी कि जिस तरफ देखिए है खोखले लफ्जों का हुजूम। जिस तरफ देखिए है खोखले लफ्जों का हुजूम। यहां कौन समझेगा आवाज की गहराई को? तो आपको लग रहा है आवाज की गहराई को जनता समझ रही है? क्यों नहीं समझेगी? कि अगर आप और हम अपने आप को जनता समझते हैं तो जनता समझ रही है। हम क्या हम वीआईपी हो गए हैं? नहीं हम जनता हैं। मैं हमेशा ये मानता हूं बुशराज जी कि मुझे जो लगता है वही जनता को लगता है क्योंकि मैं जनता हूं। मैं कॉमन मैन हूं। मेरा ऐसा कोई खास चीज ही नहीं। मेरे पास ना खास पद है, ना खास पैसे है, ना मेरा कोई खास स्टेटस है, ना मुझे कोई कहीं जाता हूं तो खास अंदर लेके जाते हैं। जस्ट पुलिस वाले सैल्यूट मारते हैं। ऐसा कुछ भी नहीं है। तो मैं कॉमनर हूं। मुझे भी लाइन में खड़ा रहना पड़ता है। डॉक्टर के पास जाता हूं तो घंटों इंतजार करता हूं। यह सारी चीजें होती है। तो जो मुझे लगता है वही जनता को लगता है क्योंकि जनता को लगता है तो वह मुझे लगता है क्योंकि मैं और जनता अलग नहीं है। हम ये हम ये द्वैत को क्यों माने? जनता मैं और आप एक अद्वैत है। जैसे मुसलमान और हिंदू एक अद्वैत है। यह मुसलमान है। ऐसा कहना गलत है। यह देशभक्त है। मुसलमान है लेकिन देशभक्त है। ऐसा जो कहते हैं वो संघी है। ये मुसलमान हैं। हम हिंदू हैं। हम सब देशभक्त हैं। क्योंकि जितना यह देश मेरा है उतना उसका है। क्योंकि इस मिट्टी में जितना मैं गया हूं, मेरे पुरखे गए हैं, उतने उसके भी गए हैं। अलग कुछ भी नहीं है। आप जिस कन्विक्शन से कहते हैं चीजों को, तो यकीन करने के अलावा और कोई चारा आपके पास दूसरा नहीं होता है। सो विद सो मच ऑफ कन्विक्शन व्हेन यू से थिंग्स और जो आपके आइडियोलॉजिकल स्टैंड रहे हैं। वो जाहिर सी बात है मैंने देखा है और मैं खुद उसकी गवाह रही हूं कि इतनी मुश्किल सबके बाद भी पिछली बार मैंने कहा था मुशराज जी सत्य जब अकेला हो तो हुसैन साहब को याद कीजिएगा। बिल्कुल आपने इसलिए कहा था और काफी लोगों ने उस बात को आपकी पसंद भी बहुत किया था कि आपने किस कन्विक्शन से उन चीजों को कहा था। बहुत-बहुत शुक्रिया राजू जी। आप ऑल द वे आप मुंबई से एक बार फिर से हमारे स्टूडियो की आपने रौनक बढ़ाई एंड आई एम श्योर कि फिर से बहुत सारी चीजें पता चली होंगी ऑडियंस को और आंखें भी उनकी खुली होंगी। ऐसा हम सोच सकते हैं। तो बहुत-बहुत शुक्रिया आपका आने के लिए। थैंक यू जी।

Companion article

A protest, and a disputed acronym

The starting point for this conversation between anchor Bushra Khanum and Mumbai-based political commentator Raju Parulekar is a wave of student protests that followed a leaked NEET medical entrance exam paper — protests that grew, over weeks, into a broader youth movement demanding accountability from India's Home Minister, Amit Shah. By the time of this interview, the sit-in outside the Prime Minister's residence had ended, an unrelated resignation had been extracted from Union Education Minister Dharmendra Pradhan, and commentators were arguing over what the whole episode had actually accomplished. Khanum's opening question sets the terms for the rest of the conversation: who deserves credit for the scale of the protest, and did any of it change anything for the students who took the beatings?

Much of the interview turns on a single acronym, CJP, which had become closely associated with the protest camp at Jantar Mantar in the public conversation. Parulekar spends much of the interview trying to dismantle that association. In his account, the protest did not begin with CJP at all — it began with the Indian Youth Congress and the NSUI, the Congress party's student wing, which he says organised the earliest marches in city after city once the NEET leak became public. He credits the scale of what followed to ordinary parents and students rather than to any single organisation, invoking Irfan and Junaid — two names he uses without further identification, apparently understood by his audience as recent victims of communal violence — as examples of people who kept showing up despite knowing exactly what participation could cost a Muslim family specifically.

“A virus,” not a movement

Parulekar's sharpest criticism in the interview is reserved not for the government but for Arvind Kejriwal. He argues that Kejriwal's Aam Aadmi Party effectively parachuted into a youth-led movement it did not start, through associates he names as Deepak, Saurabh Das and Ranka — figures he says secured permits and access that, in his telling, only a Home Ministry favourite could realistically obtain. He compares Kejriwal's role to a piece of malware: not powerful in the conventional sense, he argues, but corrosive to any system it enters, corrupting “communication, narration and history” from within. Asked directly why the political opposition, with Rahul Gandhi as its most popular face, wasn't able to build and hold a movement of this scale on its own, Parulekar's answer is that it was building one — until Kejriwal's camp moved first.

The specific grievance he lays out is procedural: he says representatives identified only as being aligned with Kejriwal negotiated behind closed doors with the government's own point-people, Jitendra Singh and J.P. Nadda, and announced a call-off of the protest — in exchange, he alleges, for Dharmendra Pradhan's resignation — without the Leader of the Opposition or the wider body of protesting students being consulted or even present. He likens it to a labour negotiation conducted without any of the workers in the room. Whether that account of the negotiation is accurate is not something either speaker in the interview substantiates beyond assertion; it is presented, and should be read, as Parulekar's own reconstruction of events he did not personally witness.

He extends the same skepticism to the protest camp's finances. Pressed by Khanum on whether crowdfunded money raised for the sit-in should be publicly accounted for, Parulekar argues that any collective structure, registered or not, owes the public a ledger of what came in and where it went — drawing a direct parallel to a funding controversy that dogged the India Against Corruption movement of the early 2010s, out of which Kejriwal's party itself was born.

What the resignation actually bought

The interview repeatedly circles back to a blunt question from Khanum: what, concretely, changed because of Dharmendra Pradhan's resignation? Parulekar's answer is that it changed very little for the students who were beaten, arrested or had cases filed against them, and that the resignation itself may have been designed less as accountability than as a diversion — a lower-ranking casualty offered up, in his reading, specifically to keep the demand for Amit Shah's resignation from gaining any further ground. He extends this argument to a separate, unrelated controversy over highway tolling that he says Kejriwal has since latched onto for the same reason: to keep public anger circulating around any minister other than Shah or Prime Minister Narendra Modi.

On the substance of the allegations against Shah himself — that police under his authority used pellet guns and, in Parulekar's telling, live rounds against minors during the crackdown on protesters — Parulekar does not offer documentary evidence in the interview beyond citing an Amnesty International report on the use of force during the protests. He frames the violence as part of a pattern that, in his view, mirrors tactics used by Israel in Gaza, a comparison he returns to more than once. These are presented as his own conclusions and allegations rather than facts independently verified within the conversation.

Five things he says did change

Asked to set aside the organisers entirely and assess the protest's effect on the country, Parulekar offers five outcomes he considers genuine gains. First, he says, India became an “argumentative” country again, with young people newly willing to question authority rather than treat it as sacred. Second, he argues that an attempt to split public sentiment along Hindu-Muslim lines — which he attributes to the RSS working with what he calls Israeli and Zionist backing — collapsed in the face of visibly mixed crowds of young protesters. Third, he says an entire generation now openly expresses contempt for Modi and Shah in ways that leave a public record, pointing to comment sections under the Prime Minister's own social media videos. Fourth, he cites the protest generation's sympathy for Palestinians as continuous with an older Indian foreign-policy tradition of non-alignment with Israel. Fifth, and most sweepingly, he argues the protests proved that ordinary public judgment in India had not been permanently blunted by twelve years of what he calls propaganda — a claim he uses to justify a specific prediction: that Modi's government will not survive in its current form past March or April of 2027.

Whether it actually changed anything for Muslims

Khanum pushes back on the rosier parts of this account with a pointed, narrower question: if a Muslim student or bystander were lynched tomorrow, or their home bulldozed, would any of the young Hindus who marched at Jantar Mantar actually show up for them — or was solidarity confined to the protest camp itself? She cites recent incidents that complicate the picture: a Muslim man beaten during a Kanwar Yatra procession, and young men jeering at women in hijabs to make them visibly uncomfortable.

Parulekar's answer distinguishes between two different things: public sentiment, which he insists has shifted, and violence carried out or tolerated by whichever party currently holds state power, which he says has not. He points to the response when Jamia Millia Islamia's campus was threatened with demolition, and to the volume of calls and messages he personally received from Hindus mourning Junaid and expressing alarm over what happened to Irfan, as evidence that solidarity now runs both ways rather than being confined to Muslims defending Muslims. But he is explicit that the violence itself — the heckling, the lynchings, the bulldozers — continues wherever the BJP, or in Delhi's case what he calls Kejriwal's “B-team of the RSS,” controls the police and administration, and that it will not simply vanish with a change in public mood. He points back to the treatment of the Shaheen Bagh protesters and the 2020 Delhi riots under the AAP government in Delhi as evidence that a change of ruling party alone offers Muslims no guarantee of safety without an accompanying change in who controls law enforcement.

A prediction, offered as a prediction

The interview closes on Parulekar's forecast that the ruling dispensation's exit is now a matter of when rather than if, delivered with the same confidence he says he brought to an earlier, pre-protest episode of the same programme, in which he claims to have predicted that students would eventually take to the streets rather than wait for the 2029 general election. He reaches for the imagery of Indian mythology — tyrants like Ravana and Kansa whose downfall, in the stories, follows directly from their own arrogance — and for twentieth-century history, invoking the fall of authoritarian rulers who lost power without a peaceful transfer, to argue that Modi and Shah are on a similar trajectory. Khanum closes the interview by thanking Parulekar for travelling from Mumbai to join the conversation, telling viewers they can expect their own view of events to have shifted by the end of it — a fair description of an hour built less around settled facts than around one commentator's forcefully argued case for where the country is headed.

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