15:23Are Muslims Becoming the “New Dalits” of India? nous Clips
This is an excerpt from a longer conversation. Full Video: https://www.youtube.com/watch?v=EPlSNwXgcTk&t=233s
‘’How does Hindutva evolve from a political movement into the Indian state's core logic?’’
लेकिन जो पॉलिथीज्म है उसमें इमटेरियलिज्म भी है। उसमें आईडिया ऑफ़ गॉड की पोटेंशियल है। तो उसमें वो मटेरियलिज्म भी आ गया जो सब्जेक्टिविटी का है। लेकिन साथ में उसमें ट्रांसेंडेंटल एक्सेस भी आ गया। तो अब जब हिंदुत्ववादी पोस्ट मॉडर्निटी को देख रहा है या हिंदूइज़्म पोस्ट मॉडर्निटी को देखेगा। उसमें भी अलग होगा क्योंकि हिंदूइज़्म का भी पूरा रेंज है। तो वहां पे पोस्ट मॉडर्निटी का जो वर्ल्ड व्यू है वो सबसेट है पॉलिथीज्म का। सुपर सेट नहीं है। तो कैसे इस पोस्टमॉनज्म को इंस्ट्रूमेंटलाइज करके एक एथनोनेशलिस्ट प्रोजेक्ट को जो न्यू हिंदुत्व अभी कर रहा है। किस तरह से पॉसिबल बनाया जा रहा है और इसमें क्या अपेरेटस इस्तेमाल हो रहे हैं। लेकिन आपने सेक्रेड ज्योग्राफी लगा दी। सेक्रेट ज्योग्राफी से वो डिवाइन शील्ड बन गया कि भाई बाहर की जो मल्टीप्लेसिटी ऑफ प्रोडक्शन है वो एब्सोल्यूट पोस्ट मॉडर्निटी नहीं है। ग्रेटर इजराइल और अखंड भारत कहीं ना कहीं एग्जांपल कन्वर्ज हो रहा है। तो जो चाइनीस इसमें चाइनीस स्टेट का जो क्लेम है उसमें इंडिया कैसे अपने को नेविगेट करता है? जो थिंकिंग टूल्स जिन कॉन्टेक्स्ट से आते हैं डीलोनियलिटी और इंडीजिनिटी वो सफिशिएंट नहीं होते हैं डिराइव करने के लिए क्योंकि अंडरलाइन जो फिलॉसोफी होती है जब तक आप उसको फर्स्ट प्रिंसिपल्स के लेवल पर नहीं देखेंगे तो आपको नहीं समझ आएगा। अ मुस्लिम एज अ पॉलिटिकल टेक्नोलॉजी तो क्या फिर वो बस वोट करने के लायक बचता है क्योंकि उसके अलावा उसका कोई रोल मुझे अपने पर्सनली मुझे अपने ऑब्जरवेशन में बहुत कम देखने को मिलता है और हर दिन यह स्कोप कम ही होते जा रहा है। तो इवन व्हेन यू आर एड्रेसिंग योर ओन प्रॉब्लम्स यू कैन स्टिल ट्राई टू क्रिएट अ यूनिवर्सल वोकैबलरी जो इनफॉर्म्ड होगी आपकी अपनी फिलॉसफी से। क्या इंटरनेशनल वर्ल्ड ऑर्डर में या इंटरनेशनल रिलेशंस में ओवरऑल एक थियोलॉजिकल अंडरपिनिंग है या नहीं? वो इस चीज में देख रहे हैं कि भ यहूदी एज ए एथनो नेशनलिस्ट प्रोजेक्ट वि देयर ओन फिलोसोफिकल बेस दे आर गोइंग टू प्रोड्यूस एन इंटरनेशनल रियलिटी वेयर इन मुस्लिम्स विल बी कंट्रोलोल्ड एंड करेल्ड। थ्योरी ऑफ डेमोक्रेसी में हम सिविल सोसाइटी की तरह बिहेव नहीं कर पा रहे हैं और बल्कि एज अ विक्टिम सोसाइटी बिहेव कर रहे हैं। क्या इस क्लेम को मुस्लिम खुद कैपेबल है? मुस्लिम कम्युनिटी खुद कैपेबल है इसको नलिफाई करने के लिए। हमारा अपना यूनिवर्सल क्लेम भी है सशंस का। इवन दो व्हेन यू आर अ माइनॉरिटी प्रॉफिट की मक्कन लाइफ का यह बड़ा मिसाल है कि भ यू आर बीइंग ऑप्रेस्ड एस एनीथिंग बट यू आर गिविंग यूनिवर्सल क्लेम्स। नाउ एक इंडिपेंडेंट थिंक टैंक मीडिया प्लेटफार्म है जो माइनॉरिटी और ह्यूमन राइट्स के इश्यूज पर रिसर्च और एविडेंस [संगीत] बेस्ड कन्वर्सेशंस को एंपलीफाई करता है। इसे और मजबूत बनाने के लिए नाउ को सब्सक्राइब करें और सपोर्ट करें। [संगीत] आज के इस पॉडकास्ट में हम शुरुआत करेंगे एक नई सीरीज की जिसका नाम है फर्स्ट प्रिंसिपल्स। इस सीरीज के जरिए हम डिस्कस करेंगे पॉलिटिकल थ्योरीज और पॉलिटिकल फिलॉसफी और इसके दायरे में शामिल मूवमेंट, आइडियाज और पर्सनालिटीज को एक क्रिटिकल नजरिए से समझने की कोशिश करेंगे। और साथ ही साथ एक रिफ्लेक्टिव अप्रोच इस्तेमाल करते हुए इस्लामिक इंटेलेक्चुअल हिस्ट्री पे भी नजर डालेंगे। आज के हमारे गेस्ट अली जावेद भाई हैं। जिनसे हम एक खास मौजू पर बात करेंगे जिसका नाम न्यू हिंदुत्व अ सिविलाइजेशनल स्टेट है। तो मेरा पहला सवाल अली भाई से यह है कि जब हम बात करते हैं हिंदुत्व के एववोल्यूशन की तो हाउ डू यू सी हिंदुत्व एज एन इवॉल्विंग आइडियोलॉजी और इज इट इवॉल्विंग फ्रॉम प्रगमेटिज्म टू मेटाफिजिक्स? और क्या यह एक प्रगमेटिक प्रोजेक्ट होते हुए भी एक अपनी मेटाफिजिक्स को साथ ही साथ प्रोड्यूस कर रहा है? जीयोलॉजी अगर ट्रेस की जाए सबसे पहले कि हिंदुत्व एज अ प्रोजेक्ट तो 1890 में भी बात हो रही है। वर्ल्ड सबसे पहले जो कॉइन हो रहा है वो 1890 में हो रहा है। तो लेकिन अगर हम हिस्टोरिकल कॉन्टेक्स्ट में देखें फॉल ऑफ 1857 के बाद जो मुगल सल्तनत का फॉल है राइज़ ऑफ पहले से चल रहा था। लेकिन ब्रिटिश जो राइज है कॉलोनियलिटी का फिर सर्वे हो रहा है सेंसस सेंसस में निकल कर आ रहा है कि रियल कंपोजशन क्या है उसके बाद बंगाल का पूरा मूवमेंट हो रहा है बंगाल का सो कॉल्ड पार्टीशन भी होता है क्यों क्योंकि एंजाइटटी प्रोड्यूस होती है कि भ हमें तो पता ही नहीं था कि इस इलाके में इतने मुसलमान रहते हैं क्योंकि हमेशा से ये था कि भ मुसलमान यहां सिर्फ काबिज है। रूलर है यहां पे कोई इनकी बहुत इनसिग्निफिकेंट पॉपुलेशन है। तो यह भी कभी नहीं इट्स अ सिग्निफिकेंट रियलिटी। तो यह सब टेंशन जब जब मुस्लिम सोवनिटी साउथ इंडिया में रिसीड हो रही थी एज एन इंस्टीट्यूशनल नेशनल फ्रेम नेशनल मत कहिए उसका एंपायर फॉर्म में तो उस वक्त जब भी कोई इस तरह का स्ट्रक्चरल चेंज होता है तो हर कोई चाहता है कि भाई हम अब सिस्टम बनाएं नेचुरल है। वो सोचता है मैं इस पावर को गैब कर पाऊं। मैं एक नॉर्मल कंपनी में या ऑर्गेनाइजेशन में भी चीजें चेंज होती रहती हैं। तो फलाना बंदा सोचता है मैं क्यों ना यूनिवर्सिटी का वीसी बन जाऊं। मैं क्यों तो ये नेचुरल प्रोसेस जो हो रहा था उसमें जो ये वेस्टर्न कॉलोनियलिटी थी स्पेशली यूरो यूरोपियन कॉलोनियलिटी थी उसमें भी ब्रिटिश कॉलोनियलिटी थी। उसमें ये रिकॉन्फ़िगरेशंस में मूवमेंट्स इमर्ज हो रहे थे। नेशनल मूवमेंट भी था जो बाद में कांग्रेस और नेशनल मूवमेंट के विदिन वह मूवमेंट भी था जहां पर हिंदू मेजॉरिटेरियन सिंबल्स का 186 70 स्पेशली 1880 90ज के बाद इस्तेमाल होना शुरू हो गया था। तो वहां पे सबसे पहले मैं बोलता हूं कि जो आनंद मठ में बंकिम चंद्र चैटर्जी हैं उन्होंने पहली बार एक केरला फाइल्स बनाई। उनकी बुक आनंद मठ के फॉर्म में। क्या है? है वो भी एक फिक्शनल स्टोरी है। वो भी एक हिस्टोरिकल एनालिसिस है। उसमें बताया जा रहा है कि भ एक मुसलमान है जो फकीर हैं वो हटा दिए जा रहे हैं हिस्ट्री से। मतलब हिस्टोरिकली हुआ यह ना कि भ मुस्लिम फकीर और हिंदू संतान ने मिलके लड़ाई लड़ी। किसके खिलाफ? ब्रिटिश कॉलोनियलिटी के खिलाफ। क्यों? क्योंकि उनकी पॉलिसीज की वजह से भुखमरी हो रही थी। उनकी पॉलिसीज की वजह से। उनके जो ट्रेडिशनल रूट्स हैं, वह खराब हो रहे थे। तो उसमें से आपने इनको तो हटा दिया मुसलमानों को पिक्चर से। बोला सिर्फ हिंदू जो हैं संतान जो भारत माता की जय बोल रहे हैं वही वो लोग हैं जिन्होंने ब्रिटिश के खिलाफ वो करी और उनका जो पिट्ठू बैठा हुआ है वहां पे वो ये मुसलमान नवाब है तो हिस्टोरिकल रिकंस्ट्रक्शन मिथ से जो मिथ उस वक्त वजूद में लाई जा रही है क्योंकि हिस्ट्री तो ऐसी है ना कि भ आपका नेक्स्ट जनरेशन अगर नहीं पढ़ी है उसको जो बता दें उसको ये लगेगा कि पहले यही हुआ है। हमें क्या पता हमारे परदादा से पहले की दुनिया क्या थी। वह पढ़ते हैं, पढ़ते हैं तो वह रिसोर्सेज क्या होती हैं? तो हिंदुत्व उस टाइम पर अगर आप देखें तो इस्लाम एज ए सोवरन फ्रेमवर्क विद मुस्लिम्स यूटिलाइजिंग इट वो तो फॉल हो रहा है। तो मुस्लिम पॉलिटिकल मुस्लिम कल्चरल मुस्लिम इकोनॉमिक सोवनिटी डिक्लाइन पे है। लेकिन एक कई सौ साल से हिंदी हार्टलैंड में और बहुत जगहों पे हिंदू क्योंकि डोमिनेंट फोर्स नहीं था तो वो भी ऐसा नहीं है कि बहुत ऑर्गेनाइज्ड है। तो जैसे होता है कि भाई पहले कोई इंटेलेक्चुअल है वह सोचता है किसी चीज के बारे में तो जो मुस्लिम जो हिंदू अपर कास्ट हिंदू इलीट हिंदू ब्यूरोक्रेट एक तरफ सर सैयद भी इन्हीं कैटेगरीज में आते हैं वो सोच रहे हैं तो इधर भी सोचा जा रहा है आर्य समाज मूवमेंट हो रहा है शुद्धि मूवमेंट हो रहा है हिंदू महासभा बन रही है बाद में मुस्लिम लीग भी बन रही है तो वहां पे जो तसवुर है हिंदुत्व का वो अभी भी एक ऐसी कोशिश है कि भाई कौन सी ऐसी आइडेंटिटी है जो मोबिलाइज कर सकती है हिंदू आइडेंटिटी को। तो वहां पर बंगाल में फॉर एग्जांपल जो दुर्गा पूजा है या दूसरी बहुत सारी जो वहां की लोकल फेस्टिवल्स हैं, फेस्टिविटीज हैं, हिंदू फेस्टिविटीज हैं उनको वंदे मातरम में या दूसरी जगहों पे उसको प्रिविलेज दिया जा रहा है। तो यहां से तो एक आइडेंटिटी कंस्ट्रक्ट हो रही है जो शुरू में क्या होता है कि बहुत वेग होती है। बट उसको यह पता होता है कि भई यह एक हिंदू समाज है। इसकी कोई हिस्ट्री है। वो यहां रहा है। इसको हमें प्रिविलेज और मेजोरिटेरियन पर्सपेक्टिव से देना है। जैसे कैपिटलिज्म के बारे में एडम स्मिथ ने कुछ सोचा लेकिन आज के डेट में जो कैपिटलिज्म है, न्यू लिबरलिज्म है वो एक बड़ा पैराडाइम है। वो जिंदगी के हर शोबे में उसके क्या असरात होंगे? वो पूरे डिराइव हुए हैं कई सौ साल की रीडिंग्स से और राइटिंग्स से। तो वहां तो हिंदुत्व का यह तसवुर पहली बार आया कि भाई हम एट द एंड ऑफ द डे सेंसस मेजॉरिटी हैं। हमारा यहां पर हिस्टोरिकल वो है। बहुत सारे लोग अलग-अलग तरीकों से लिख रहे हैं। विवेकानंद अपने आप कुछ बता रहे हैं कि भ हिंदू सोसाइटी का यहां पे यह है हमेशा जिसे कहते हैं कि नॉन अग्रेसिव सोसाइटी रही है। वेदांतिक फिलॉसफी को वो प्रमोट कर रहे हैं। सब बहुत सारी चीजें हो रही हैं। पहली बार सावरकर के पास आके जब हम पहुंचते हैं तो वह पॉलिटिकल थराइजेशन स्टेबल पॉलिटी का थराइजेशन वहां पर आकर कंसीव होता है कि भाई हमें ऐसी एक टेरिटरी को कंसेप्चुअलाइज करना है कि जहां पे वो ऐसी फिलॉसफीस जो हिंदू हिंदूइज्म की इंडीजिनिटी कि वो यहां का ओरिजिनल बिलोंगिंग है वो रह जाए और जो बाकी ऐसी आइडेंटिटीज हैं जो क्लेम कर सकती हैं पावर को वो स्ट्रक्चरली एक्सक्लूड हो को एक ऐसा बाउंडेड फिलॉसोफिकल फ्रेमवर्क पॉलिटिकल थ्यरी लानी थी। तो उसमें कि भाई ये मुसलमान बाहर से हैं। ईसाई धर्म बाहर से है। उसमें कि भ कम्युनिज्म, लिबरलिज्म, वेस्टर्न मॉडर्निटी मुसलमान भी इस तरह बहुत सारी चीजों में कुछ कैटेगरीज में सोच रहे हैं कि भ ये जो एपिस्टिमोलॉजी है वेस्ट की ये हमारे साथ कंपैटिबल नहीं है ट्रेडिशन के साथ। तो बहुत सारी चीजें ओवरलैपिंग भी होंगी। लेकिन डिफरेंस यह होता है उसमें कि पहली बार इमेजिनेशन में यह आता है कि जैसा कि यह जो नेशन स्टेट है इसकी जो टेरिटोरियलिटी है उसको भारतवर्ष की तरह पास्ट से रिकंस्ट्रक्ट ये करके बताया जाता है ये एज इफ यह कल्चर की बॉडी है। दिस इज़ एन ऑर्गेनिक होल विद इन व्हिच सर्टेन आस्पेक्ट्स ऑफ थ्यरी कैन इमर्ज। क्योंकि यहां की ज्योग्राफी सेक्रेट है और वही इस तरह की प्रोडक्शन करेगी। चाहे उनके बीच में इंटरनली बुद्धिस्ट यहां का है, सिख यहां का है। लेकिन जो बाहर से आए हैं वो उस सेक्रेट ज्योग्राफी के प्रोडक्ट नहीं है। तो वो आइडेंटिटी और आईडियोलॉजी के ला लेवल पे वो फॉरेन कल्चर और फॉरेन फ्रेमवर्क फुला रहे हैं। तो अभी तक यह था इवन 2014 से पहले तक भी कि आपने एक इलीट्स को ट्रेन कर रहे हैं। हिंदू महासभा ऑर्गेनाइज हो रही है। अखाड़े भी हैं, आरएसएस भी है, सारी चीजें हैं। बट वो बॉटम अप में बहुत छोटे लेवल पे मूवमेंट था। लोगों को जोड़ा जा रहा था, जोड़ के उनको कंसेप्ट कंसीव करवाया जा रहा था कि भ इस तरह की ज्योग्राफी है। ये हमारी हिस्ट्री है। उसमें रीाइटिंग हो रही थी। बट स्टेट की आईडिया के साथ वो टेंशन में था। नेशनल मूवमेंट के साथ टेंशन में था कि भ किस तरह का जो मुल्क है वो वजूद में आएगा। वो सारी चीजें हो रही थी। तो जो आपका यह सवाल है कि जो मॉडर्न नेशन स्टेट्स हैं 1947 के बाद हुआ यह कि क्योंकि नेशनल मूवमेंट डोमिनेंट था और पार्टीशन हो गया अगर पार्टीशन नहीं हुआ होता तो शायद कॉन्स्टिट्यूशन और थोड़ा प्रो माइनॉरिटीज होता लेकिन पार्टीशन की वजह से थोड़ा सा इनको जो हिंदू हिंदुत्ववादियां हैं हिंदुत्ववादी हैं उस जमाने के हिंदू महासभा के लोग आरएसएस के लोग जो उसमें थे उनको और मेरा तो यह आर्गुमेंट है कि पार्टीशन करवाने में भी अलग अलग-अलग लेयर्स हैं। कौन-कौन एक्टर्स हैं? तो नंबर वन हिंदू महासभा आरएसएस का इन्वॉल्वमेंट है। सेकंड नंबर पे फिर मुस्लिम लीग प्लस कांग्रेस वगैरह का जो रोल है। क्योंकि वो जो पूरे टाइम पीरियड में 1890 से शुरू हुआ मामला। फिर 1900 में आपका और ज्यादा वो एंटी मुस्लिम और एंटी मुस्लिम कम्युनल राइट्स और इधर से भी फिर मुसलमान रिसोंड कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि भ सिर्फ हर चीज को एक तरफा देखा जाना चाहिए। इधर से पत्थर फेंका तो फिर इधर से भी हो रहा है। फिर स्पेशली 1905 के बाद बंगाल में जब यह हुआ कि भाई दुकानें बंद करनी है नेशनल मूवमेंट के लिए और मार्केट बंद करनी है तो वहां पे गरीब मुसलमान था उसका ज्यादा नुकसान हो रहा था। वो अग्रेरियन इकॉनमी पर डिपेंडेंट था और हिंदू के पास पैसा था वो ज्यादा इलीट था तो मुसलमान और दलितों वगैरह को जो गरीब है उसको नुकसान हो रहा था। तो फिर वो कि भाई आपके नेशनल मूवमेंट में या तो हमें कुछ मिले हम सर्वाइव कैसे नहीं हो रहा है तो हमारा घर कैसे चलेगा? तो वहां पर फिर वो रिलीजियस स्ट्रगल से ज्यादा वो क्लास स्ट्रगल थी क्योंकि बंगाल की हिस्ट्री में अंग्रेजों के आने के बाद मुसलमानों को मार्जिनलाइज किया था एज अ पॉलिसी ब्रिटिश ने और न्यू क्लास ऑफ़ भद्रक इमर्ज हुए थे। तो नेचुरली जो डेमोग्राफिक डिविडेंड था वो ऐसा था। तो वहां पर जो इकॉनमी ऑफ वायलेंस शुरू होती है वो जो 30-40 साल का जो वायलेंस है जिसमें वो लोग जो नेशनलिस्ट पॉलिटिक्स कर रहे थे मुसलमान इवन इकबाल नेशनलिस्ट थे मौदूदी नेशनलिस्ट थे और भी लोग थे वो धीरे-धीरे इनके रिस्पांस में कि ये जिस तरह से हिंदूइज़्म को सामने रख रहे हैं और उसमें जो वायलेंस को इंटरटेन कर रहे हैं तो इनको खतशा पैदा होता है। हालांकि मैं उससे भी ना इत्तेफाक ही रखता हूं बहुत सारी चीजों में कि भ आपको विद इन फ्रॉम इस्लामिक थियोलॉजी यू हैव टू देन यू नो एंगेज विथ दैट इन अ सेंस दैट यू हैव टू ब्रिंग एन अल्टरनेटिव बट डिस्पाइट दैट हो ये रहा है हो ये रहा है कि एक टेंशन प्रोड्यूस हो रही है उससे पार्टीशन प्रोड्यूस हो रहा है पार्टीशन होने की वजह से जिसमें हायरार्किकल और रोल्स हैं जिसमें मेरे यू नो लिमिटेड पर्सपेक्टिव्स आई फाइंड जितना मैं उसको रीड करता हूं जो हिंदुत्व है नॉट लार्जर हिंदूज़्म वो पर्टिकुलर जो हिंदुत्व है वो बहुत स्मार्टली टेंशंस क्रिएट कर रहा है जहांजहां उसे मौका मिल रहा है और उसका रिस्पांस मुसलमान आज भी जैसे रिएक्शनरी कर रहे हैं जब भी रिएक्शनरी कर रहे हैं एक बड़ा तबका तो वो रिएक्शनरी रिस्पांस में यहां की एक रियलिटी प्रोड्यूस हुई जिसमें मुसलमान हिंदुस्तान में और माइनॉरिटी बन गया जितना वो लार्जर साउथ एशिया में ना होता तो उससे फिर जो नेगोशिएशन हुआ अभी तक कि आप एक लेवल पर थे कि ब्रिटिश कॉलोनियलिटी थी। ज्यादातर जो कम्युनिटीज़ थी वह उस कॉलोनियलिटी के विदिन रिसोंड कर रही थी। तो मजबूर थे इक्वल लेवल पे इंगेज करने के लिए। पार्टीशन के बाद कि भ देखो मुसलमानों को तो यह मिल गया है। अब हिंदुत्व फ्रॉम नॉन इंगेजमेंट विद दी स्ट्रक्चर। लेकिन क्या कर रहे थे कि भ ब्रिटिशर्स के साथ भी बाबू मिले हुए थे बहुत सारे। लेकिन ये नहीं था कि भ ऑनगोइंग टेंशन। तो फिर आरएसएस वगैरह ने यह भी डिसीजन लिया कि भ हमें हम डिस्टेंस रहते हैं कि यू नो अल्टीमेटली तो यहां पे जो आने वाला है वो तो अल्टीमेटली मेजॉरिटी हिंदू ही आने वाला है। वो बाद में देखा जाएगा। पहले तो हमें इनसे छुटकारा पाना है। तो पार्टीशन के बाद थोड़ी और ज्यादा रोल्स चेंज होते हैं। आप अब मेजॉरिटी में हैं। नेशन स्टेट है जिसमें यह नहीं है। ब्रिटिशर्स नहीं है। मुसलमानों के ऊपर ऑलरेडी इल्जाम लगा दिया गया है पार्टीशन का। तो उनको एज एन एक्टिव एक्टर कंसोलिडेट होने से अपने जिसे कहते हैं रेचरिक और डिस्कोर से रोका जा सकता है। कोई भी लिबरल सेकुलर पार्टी आइडियली जिसको अपना वो रोल लेना चाहिए था वो अपनी पॉलिटिक्स को कंसोलिडेट करने के लिए मुसलमानों को कॉम्प्रोमाइज और सैक्रिफाइस करने को तैयार हैं। और यहां पे भी बहुत जमाने तक अलग-अलग जैसे नेहरू से शुरू होता है तो नेहरू ज्यादा आईडियोलॉजिकल थे। इंदिरा उनसे कम आईडियोलॉजिकल थी। राजीव गांधी उनसे और कम आईडियोलॉजिकल थे। बीच-बीच में और एक्टर्स आ रहे हैं। वो तो बिल्कुल आईडियोलॉजिकल नहीं थे। उनका यह था कि भ कांग्रेस को इस सब में जो पिस रहा है वो धीरे-धीरेधी मुस्लिम्स पॉलिटिकल सोवनिटी जो 1857 पे एक लेवल पे थी वो फिर कल्चरल सोवनिटी की डिबेट हुई और कॉन्स्टिट्यूशनल राइट्स की डिबेट हुई। धीरे-धीरे धीरे के ये आ रहा है कि भ आप स्टेट के साथ टेंशन में तो हैं हिंदुत्ववादी। लेकिन स्टेट में आपके लोग भी हैं। कांग्रेस में भी हैं, ब्यूरोक्रेसी में भी हैं, पुलिस में भी हैं। तो एक एक्टिव डिसएंगेजमेंट, एंगेजमेंट, कॉन्फ्लिक्ट यूनिटी सब एक्सपेरिमेंट्स चल रहे हैं। देयर वाज़ अ कांस्टेंट बारगेन? कांस्टेंट बारगेन है। फिर राम जन्म मूवमेंट ने जिस तरह से उसको यूनिवर्सलाइज और नेशनलाइज किया। हम सब जानते हैं कि भाई डीडी न्यूज़ पर किस तरह से रामायण प्ले हुई उसमें भी सब कुछ 1000 बातें 1000 लोग करते हैं। लेकिन उसका अल्टीमेट जो रिजल्ट आया एव्री कम्युनल वायलेंस और एव्री ये कि भाई मुसलमानों का अपीज़मेंट हो रहा है। तो जैसे आजादी से पहले कंसोलिडेशन कर रहा था एक पर्टिकुलर उसका तो ये इनको मास्टर टैक्टिक पता है और ये वो करते चले गए और अल्टीमेटली जो कंसोलिडेशन हो रहा है वो स्टेट में आ गया 2014 में हिंदुत्व अब सिर्फ जो उसकी रूह उन्होंने पढ़ी थी बाद में गुलवलकर ने रिफाइन करी बाद में दूसरे लोगों ने रिफाइन करी कि हमने उसकी रूह तो डिफाइन कर दी लेकिन अभी उसके पास बदन नहीं है बॉडी नहीं है तो वो जो स्टेट को आपने डिफाइन किया था उस स्टेट को एज अ बॉडी ओढ़ने का आपको मौका 2014 के बाद मिला लेकिन अभी भी उस बॉडी का जो नफ्स है वो कॉन्स्टिट्यूशनली कुछ और डिफाइंड था उनके मकासिद के अलावा तो धीरे-धीरे धीरे ट्रिपल तलाक यूसीसी 370 का अब्रोगेशन और वक और ये सारी चीजें उस कॉन्स्टिट्यूशनलिटी का रिकंस्ट्रक्शन और रीरीडिंग दोनों एक साथ हुई और अल्टीमेटली जो रूह नफ्स और जो जिस्म है वो हिंदुत्व की फ्यूजन हो गया। उसके बाद भी बॉडी में तो रहता है ना कि भ आपके कोई वायरस रह जाएगा, कोई बैक्टीरिया रह जाएगा। बट अब वो मेजर कंपोनेंट नहीं है। वो ऑर्गन नहीं है ऐसा कि जो बॉडी रिजेक्ट कर रही है। तो जितने भी स्टेट के ऑर्गन्स हैं उनकी जो स्ट्रक्चर है वो अभी भी इट्स अ कंटिन्यूड प्रोसेस। आप ये मत बोलिए कि वो परफेक्ट हो गया है। इट्स एन ऑनगोइंग प्रोसेस। तो जिसको मैं न्यू हिंदुत्व बोल रहा हूं वो यह नहीं है कि भ वो हिंदुत्व से फिलोसोफिकली कंप्लीटली अलग है। फिलोसोफिकली एज अ प्रोजेक्ट तो वो आनंद मठ में भी सिमिलर बातें कर रहा है। लेकिन उसकी लेयर जैसे कैपिटलिज्म की इंडिकेशन और डायरेक्शन सिमिलर है। लेकिन फिर वो स्टेट में कैसे फ्यूज होगी? दूसरों के साथ कैसे इंगेज करेगी? जेंडर पे क्या होगा? क्लास की डिबेट में क्या होगा? वहां पे वो अपने आप को रीोकेट थराइज करती है कि वो इवन चाइना जैसे कम्युनिस्ट स्टेट में भी अपने आप को मैनिफेस्ट करवा सकती है। तो न्यू हिंदुत्व यह है कि इट इज नॉट जस्ट ए्बगुस क्लेम इट इज ए वेरी रोबस्ट मेटाफिजिक्स वेयर इन टेरिटोरियलिटी वेयर इन द नेचर ऑफ लॉ वेयर इन द आईडिया ऑफ़ कल्चर वेयर इन द आईडिया ऑफ़ एथनिसिटी वेयर इन द आईडिया ऑफ़ रिलजन वेयर इन द आइडिया ऑफ़ ऑल ऑफ़ द कंपोनेंट्स इंक्लूडिंग इकोनॉमिक्स इंक्लूडिंग हाउ सोसाइटीज़ आर कॉन्स्टिट्यूटेड वो वो सारी चीजें एक यूनिफाइड एक कंसिस्टेंट फ्रेमवर्क से आती हैं। और उसके लिए जो पहले रिक्वायरमेंट थी कि आपके पास एक मूवमेंट हो आरएसएस या कोई और वो मूवमेंट की रिक्वायरमेंट अब खत्म हो गई क्योंकि स्टेट ही हिंदुत्व बन गया है। पहले उसके लिए आपको एक ऐसी क्योंकि आप स्टेट नहीं थे तो आपको एक मूवमेंट चाहिए था। इसका मतलब ये नहीं कि मूवमेंट खत्म हो जाएगा। क्योंकि जब तक डेमोक्रेसी है जब तक पोटेंशियल रहता है एक्सचेंज का। लेकिन इसकी पावर आरएसएस की भी डिफ्यूज होने लगी है। इसीलिए आपको बहुत सारे इंटेलेक्चुअल्स थिंकर्स वो पोस्ट आरएसएस थिंकिंग ऑफ हिंदुत्व और पोस्ट हिंदू महासभा थिंकिंग ऑफ हिंदुत्व क्योंकि हिंदू महासभा तो और टॉप डाउन थी इलीट हिंदूज़ उसको डोमिनेट करते थे। आरएसएस में फिर भी आपका बॉटम अप और आपको दलितों को भी जोड़ा, ओबीसी को भी जोड़ा और ज्यादा लेकिन स्टिल एक हायरार्किकल कंस्ट्रक्शन था। अब क्या है कि वो वापस रिजॉल्व हो गया है। अलग-अलग जो आपकी कास्ट की लेयरिंग्स में उसकी पूरी एजेंसीज डिफाइन हो गई हैं। रूल्स डिफाइन हो गए हैं। और उसके लिए अब जरूरी नहीं है कि आरएसएस जब तक स्टेट है हिंदुत्व आरएसएस इज़ जस्ट वन ऑफ दी ऑर्गेनाइजिंग फोर्सर्सेस। आपके इस ऑब्जरवेशन से कुछ रिलेटेड कुछ सवाल मैं पूछना चाहूंगा। अगर जो एक्सप्लेनेशन आपने न्यू हिंदुत्व का दिया है उसमें अगर दो बड़े कैंप्स जो देखते हैं नेशनलिस्ट थ्योरीज में जो भी नेशलिज्म की थ्योरीज बनी है तो उसमें यह मालूम देता है कि इन इटसेल्फ इट इज़ अ प्रीमोडियल ऑफ नेचर और एट द सेम टाइम इट इज़ अ मॉडर्न क्रिएशन। और जैसा कि आपने एक मेटाफोरिकल एग्जांपल यूज़ किया कि एक क्लोक चाहिए था इस आइडियोलॉजी को ओढ़ने के लिए। तो उस क्लोक का जो सब्जेक्ट है वो टेरिटोरियलिटी बनी। तो इस एग्जांपल से मैं यह समझना चाहूंगा कि क्या न्यू हिंदुत्व इस पॉइंट पर डिफाइन की जा सकती है ये आइडियोलॉजी जहां पे गवर्नमेंट अपेरेटस पूरी तरह से आप ही के बात को रखते हुए कि एक पैथोजन जब ऑर्गन को अटैक करता है तो क्या नहीं अब सिर्फ स्टेट का एक मूवमेंट नहीं आइडियोलॉजिकल मूवमेंट नहीं या एक आइडियोलॉग का इमेजिनेशन नहीं है बल्कि एक लिविंग लॉजिक है जिससे एक स्टेट के सारे मेटाफिजिक्स को जज किया जाता है। क्योंकि हम लोग यूजली इन सारी की चीजों में हम भी और भी लोग एक बॉडी ऑर्गेनिज्म या उस तरह की जो एनालॉजीस है उसका इस्तेमाल करते हैं। तो अगर मैं उसी को इस्तेमाल करूं तो साइकोलॉजी को या साइकेट्री को या न्यूरोसाइंस को कॉन्शियसनेस में भी डिस्ट्रीब्यूटेड कॉन्शियसनेस के आईडिया है कि भ फिर वो नफ्स में रूह में मतलब जो तसव्वफ की भी लेयर्स हैं या फिर जो दूसरी जो मिस्टिकल ट्रेडिशंस हैं अद्वैतवाद है, द्वैतवाद है, विशिष्ट अद्वैत है, अचिंत भेदभेद है, शेवाइट ट्रेडिशन है या आपका योग ट्रेडिशन है। इसी तरह बुद्धिज्म में हीनयान है, महायान है। शून्यवाद है, क्षणिकवाद है। इसी तरह आपको यह ट्रेडिशंस मिलेंगे क्रिश्चियनिटी में, जुडिज्म में। तो वहां पे क्या है कि जो इंसान के जो साइकोलॉजिकल स्टेट्स हैं और जो उसका जिस्म है और जो उसकी फितरा है, जो प्राइमर्जियल जिसे कहते हैं कि डायरेक्शन है, जरूरी नहीं है कि ये हमेशा अलाइंड हो। 100% इनमें हमेशा टसल और टेंशन रहती है। तो इवन टुडे जब हम यह समझ रहे हैं कि हिंदुत्व ने एक काफी हाईएस्ट लेवल ऑफ कैलिबेशन उसकी रूह, उसकी नफ्स और उसके बदन और जिस्म से कर लिया है। लेकिन टेंशंस कंप्लीटली यू नो रॉल्वड नहीं है। क्योंकि इनकी अपनी खुद के चैलेंजेस हैं। चैलेंजेस ये हैं कि आपकी जो ऑंटोलॉजी है वो ग्रेडेड है। मसलन कि आपके यहां पर ब्राह्मण है। आपके यहां वैश्या है। आपके यहां शूद्रा है। आपके यहां दलित है या दूसरी चीजें हैं। तो दिक्कत यह होती है कि वो जो बॉडी है उस बॉडी के विदिन भी जो आपने ऑर्गन्स डिसाइड किए हैं उनकी कम्पीटिंग कॉन्शियसनेस है। यूनिफाइड कॉन्शियसनेस नहीं है। और यूनिफाइड कॉन्शियसनेस इसलिए नहीं है क्योंकि हिंदूइज़्म की मेटाफिजिक्स ऐसी है कि वह प्लूरलिज्म को थियोलॉजिकल लेवल पर एंटरटेन करती है। यह उसकी मेटाफिजिक्स का हिस्सा है कि मल्टीपल गॉड्स हो सकते हैं। उन मल्टीपल फिर उसमें भी डिबेट्स हैं इनके यहां पे बहुत जिसे कहते हैं मैंने क्योंकि पढ़ी हैं। बहुत ही इंटरेस्टिंग और बहुत ही फिलोसोफिकली इन डेप्थ डिबेट्स हैं कि भ वननेस और मल्टीप्लीसिटी को कैसे हर्ट ट्रेडिशन ने डील करने की कोशिश की है। हमारे यहां भी हुआ है वहां पे भी। लेकिन अल्टीमेटली जो कुरान को जब आप लेंगे तो उसकी ओवर आर्चिंग थीम तौहीद है। तो उसकी वजह से आपके यहां पे जो वननेस और मल्टीप्लीसिटी की जो डिबेट है उसमें डोमिनेंट पैराडाइम हमेशा वननेस की तरफ जाएगा। हिंदूइज़्म में उल्टा है। हिंदूइज़्म का जो ओवर आर्चिंग पैराडिग्मैटिक फ्रेमवर्क है वहां पे आपका जो मेटाफिजिक्स है वो प्लूरलिज्म ऑफ ऑंटोलॉजिकल ऑनटोलॉजी के मतलब जिसमें इवन जो ट्रुथ के क्लेम्स हैं वो म्यूचुअली एक्सक्लूसिव हो सकते हैं। तो वो उसकी तरफ जाएगा। तो जब हम हिंदुत्व को देखते हैं तो हिंदुत्व जब राम राज्य की इमेजिनेशन और राम जन्मभूमि मूवमेंट तो वहां पर जो वननेस का जो कांसेप्ट है वो आर्टिफिशियल है। मतलब उसको बहुत ज्यादा एनर्जी लगानी पड़ेगी सिस्टम को सिर्फ ऑर्गेनाइज्ड रखने के लिए इस फॉर्मेट में। वजह यह है कि जैसे मैंने बताया कि आपके हर ऑनटोलॉजिकल जो लेवल्स हैं फ्रॉम वजूद या फिर जो आइडेंटिटीज के जिसमें आपकी मुख्तलिफ जो कास्ट हैं, कास्ट हैं, क्लास है या जेंडर है सबको यहां पे भी अलग-अलग तरीके से देखा गया है। लेकिन उनमें भी फिर डिफरेंसेस हैं। भक्ति मूवमेंट कुछ कह रहा है, साउथ के मूवमेंट्स हैं। उसमें फिर एक ट्रेडिशन मतलब जैसे इस्लाम में भी अगर आप देखेंगे तो फिर मल्टीपल वर्जनंस हैं लोगों के क्लेम के। भाई पॉलिटिकल थ्यरी ऐसी होगी। 20वीं सदी में तो बहुत लंबी डिबेट हुई है। इसी तरह यहां पर भी है। तो विद इन द मेटाफिजिक्स ऑफ प्लुरल प्लुरलिटी मल्टीप्लीसिटी देयर इज़ अ पर्टिकुलर कॉन्फ़िगरेशन कि जहां पे उसके ऊपर सुपरइंपोज़ की जाती है वननेस ऑफ़ टेरिटोरियलिटी एंड वननेस ऑफ़ पॉलिटिकल ऑर्गेनाइज़ेशन। तो द अमाउंट ऑफ कंप्यूटेशनल रिसोर्सेज रिक्वायर्ड टू सस्टेन दैट आर मच हायर देन वुड बी रिक्वायर्ड फॉर ए मेटाफिजिक्स ऑफ़ वननेस। अब कोई बोलेगा कि भ फिर इस्लाम में और मुसलमानों में इतने डिवीज़ंस हुए हैं। क्योंकि वो टेरिटरीज में बट गया। उसका आपको बेहतर एग्जांपल मिलेगा यहूदियों से जस से। क्योंकि जज्म में जुडिज्म में भी मोनोथिज्म की तरफ और वननेस की तरफ है और एक स्मॉल टेरिटरी है। तो वहां पे एक्सट्रीम टेंशंस के बावजूद इंडिया में आपने वो नहीं इंडिया में आप एक मुख्तलिफ जिसे कहते हैं कि फेस में इंडिया गुजरा है। क्योंकि इतनी पॉकेट्स हैं, इतना कल्चरल डिफरेंस है, इतना स्पेशलिटी है, इतना वो है कि इंटरनल टेंशन बहुत है। जुडिज्म में वो इंटरनल टेंशन और ईरान में दो जगह पे। यह दो अलग केस हैं। इनको आप स्ट्रक्चरली कंपेयर कर सकते हैं। उसके बावजूद एक एथिकली बेटर पोजीशन में हो सकता है और एक एथिकली वर्स ऑफ में हो सकता है। बट कंपैरिजन अगर आप देखें तो टेरिटोरियलिटी एंड उस टेरिटोरियलिटी की रूह क्या होगी? उसकी उसके उसूल क्या होंगे? उसकी कॉन्स्टिट्यूशनलिटी क्या होगी? तीन जगहों पे स्टेबल है। एक वो है इजराइल में, एक वो है ईरान में और एक वो है इंडिया में। बाकी जगहों पर टेरिटोरियल सरप्लस है। चाहे वो क्रिश्चियनिटी हो। उसका क्लेम किसी एक टेरिटरी से परफेक्टली अलाइन नहीं होता। कुछ क्रिश्चियन मूवमेंट्स का होता है। लेकिन फिर भी टेंशन रहता है। सरप्लस रहता है। चाहे वो अ इस्लाम हो, चाहे वो बुद्धिज्म हो, चाहे वो कम्युनिज्म हो, चाहे वो लिबरलिज्म हो, चाहे वो कैपिटलिज्म हो। मतलब चाहे वो रिलीजियस आईडियोलॉजीस हो, चाहे वो नॉन रिलीजियस आईडियोलॉजीस हो। वहां पे यूनिवर्सलिज्म उनकी पर्टिकुलरिटी को सरप्लस देता है। इन तीनों में भी विद इन दी ईरानी ट्रेडिशन सरप्लस है। उम्मा का आईडिया गज्जा में क्या हो रहा है दूसरी जगह जितना सर उनके यहां और सरप्लस हो सकता था लेकिन फिर भी सरप्लस है। यहां पे वो सरप्लस की भी जरूरत नहीं है। दे हैव मल्टीपल एक्सेस पॉइंट्स टू देयर आईडिया। वो सारी जगह वो टेरिटोरियलिटी में, इंडजीनिटी में, कल्चर में उन्होंने उसकी एक अपनी मेटाफिजिक्स बना दी। दोनों इजराइल की और यहां की जो मेटाफिजिक्स हैं ये दोनों टोटिटेरियन प्रोजेक्ट्स हैं। एक मोनोथिस्टिक टोटलिटेरिज्म है जो एक्सक्लूसिविटी से इमर्ज होता है कि भ सिर्फ हम है जिन्होंने खुदा ने हमें तौहीद का पैगाम दिया और हमें वारिस बनाया इस इलाके का इस ख्ते का। लेकिन है मोनोथिस्ट लाइक द चोजन वन लाइक द चोजन वन बट एक्सक्लूसिव एक्सक्लूसिविस्ट है वो यूनिवर्सल नहीं है कि आप यहूदी हो सकते हैं और आप भी इससे फायदा उठाते हैं। नहीं ये एक पर्टिकुलर कौम है ऐसी बनिस्बत इसके ये देखिए मैं ये समझाने की कोशिश कर रहा हूं कि कोई एक लेवल ऑफ मैटिफिसिक सेम हो सकता है और एक रेडिकली डिफरेंट हो सकता है। उसके बावजूद कौन सा कंपोनेंट ऐड हो रहा है जिससे टोटिटेरियनिज्म प्रोड्यूस हो रहा है। दूसरी तरफ हिंदुस्तान में प्रोजेक्ट का क्लेम प्लूरलिटी है। इस्लाम में प्लुरलिटी भी है और वननेस भी है। यहां पर भी अलग-अलग लेयर्स में होता है रेंज क्या है? तो यहां प्लूरलिटी जो है वो पर्टिकुलर इंटरप्रिटेशन ऑफ हिंदूइज़्म में जिसमें मनुस्मृति का सुपरस्ट्रक्चर और पावर का एक क यू नो पर्टिकुलर कॉन्फ़िगरेशन एंड कॉन्सेप्चुअलाइज़ेशन हायरार्की ऑफ़ रिस्पांसिबिलिटीज़। आप ब्राह्मण हैं, आप नॉलेज प्रोडक्शन करेंगे। आप वैश्या बनिए हैं। आप मर्केंटाइल सोसाइटी हैं। आप वैश्या हैं। आप क्षत्रिय हैं तो आपका लड़ाई झगड़े से या फिर आपका मिलिट्री यू नो वो है। आप शूद्रा हैं तो आप लेबर काम करेंगे। आप दलित हैं। आप बिल्कुल आउटसाइड द फोल्ड हैं जो मुसलमानों को भी बना दिया गया है। तो उस कॉन्टेक्स्ट में जब आप देखेंगे तो बजाहिर आपको प्लूरलिज्म लगेगा। इसी से खेल होता है। एक क्लेम ऑफ प्लुरल प्लुरलिटी है, मल्टीप्लेसिटी है लेकिन वो हरार्किकल है और उसमें ऑर्डर है और उसमें रिस्ट्रेंट है और उसमें फोर्स है। दोनों आइडियोलॉजीस में एक ग्रैंड हिस्टोरिकल क्लेम है। और दोनों जगह में टेरिटोरियलिटी है। जो टेरिटोरियलिटी एक दूसरे से भी म्यूचुअली एक्सक्लूसिव है। और इसलिए दोनों टेंशन में है। ईरान प्लस जो मिडिल ईस्ट का एरिया है। अगर मिडिल ईस्ट कभी अपने आप को सुनी ट्रेडिशन के विज़न स्टेबलाइज कर पाता है तो ये वो एरियाज हैं जहां पे इधर का भी ओवरलैपिंग क्लेम है और इधर का भी ओवरलैपिंग क्लेम है। तो इसलिए टेंशन भी है। लेकिन जो इजराइल के टेरिटोरियल क्लेम्स हैं। हालांकि यहूदियों को बिल्कुल पॉलिथीज्म के आप उनका पूरा वो देख लीजिए। इस्लाम में तो यह बोल दिया गया कि हम पिथिज्म के खिलाफ हैं। आईडियोलॉजिकली लेकिन लाइक फ्दीन अल्टीमेटली हम आपको पैगाम दे रहे हैं। हम आपको सच बता रहे हैं। अगर आप नहीं एक्सेप्ट कर रहे हैं तो वी कांट फोर्स इट अपॉन यू। हमारा फोर्सफुल नेचर बस यहां तक होना चाहिए। हिस्टोरिकली बहुत चीजें हुई होंगी। मैं इसको डिनाई नहीं करता। हर जगह पे जब पावर कंसोलिडेट होती है तो मुसलमानों ने भी खूब खून खराबा किया। ये गैर जिम्मेदार होगा कि भ आप बोलेंगे कि भ हमारे से कुछ हुआ ही नहीं। मैं एक फिलोसोफिकल लेवल पर बात कर रहा हूं। इधर जब आप देखेंगे जुडिज्म में पॉलिथीज्म की अंडरस्टैंडिंग वो कंप्लीटली डिस्ट्रक्टिव है। उसके बावजूद नेचुरल एलआई है कौन? हिंदुस्तान अंडर हिंदुत्व और इजराइल वो अंडर किसी के भी हो वही फिक्सेशन होगा। क्योंकि छोटी सी टेरिटरी है कंसोलिडेटेड है, घिरी हुई है सब जगह से। तो उसने बाय चूजिंग दैट वो इट्स चोजन ह बैलग्राउंड। इंडिया का कॉन्फ़िगरेशन ज्यादा वाइड है क्योंकि म्यूचुअल एनिमी है इस्लाम क्रिश्चियनिटी कोई भी सरप्लस यूनिवर्सलिस्ट क्लेम कोई और भी होता सरप्लस यूनिवर्सल क्लेम होता तो दोनों की जुगलबंदी बहुत सॉलिड है। तो सवाल का जो मैं हम आगे बढ़ते हैं इस पे कि आपको कोई भी एनालॉजी जब इस्तेमाल करते हैं तो उसकी होलिज्म चला जाता है। लोग जब बोलते हैं भ एथेनो नेशनल स्टेट है तो एथेनिक अपने आप में एक कैटेगरी है। नेशनलिज्म अपने आप में एक कैटेगरी है। तो एथेनिक के भी अलग-अलग लोग हैं जो अलग-अलग फिलॉसफी लाएंगे। हर एथनिक नेशनलिज्म सेम नहीं होगा। हो सकता है कोई एथनिक नेशनलिज्म एक्चुअली अच्छा हो। चाहे वो डिजायर्ड मोड ऑफ़ पॉलिटिकल फॉर्मेशन ना भी हो। लेकिन उसका जो फॉर्मेशन के बाद प्रोडक्ट हो सकता है क्योंकि जो एथेनिक अंडरस्टैंडिंग है वहां की फिलॉसफी जो आ रही है फिर एथेनिसिटी में भी मल्टीपल क्लेम्स ऑफ होंगे। यहां पे चारवाग भी है यहां पे जिसे कह सकते हैं कि भाई वैशिका भी है। यहां पे उत्तर मीमांसा भी है, पूर्व मीमांसा भी है। योग स्कूल ऑफ़ थॉट छह दर्शन है। बुद्धिज्म है, जैनिज्म है। उनके भी अपने-अपने जिसे कहते हैं स्कूल्स ऑफ़ थॉट है। तो क्या व्हाट [गला साफ़ करने की आवाज़] डस दैट मीन? तो यहां पे जो थरीज हैं। वह ऐसे रेजोल्यूशन से बोलती हैं भाई इंडिया फैशिस्ट है। इंडिया से ज्यादा फैशिस्ट इस वक्त यूएई है। अगर प्योर फैश में बोला जाए अगर स्केल बनाया जाए इंडिया वुड यू वुड फाइंड रिलेटिवली लेस फैशिस्ट। तो कई बार होता क्या है कि जो मेन हमारा जो होता था कि भ जो थिंकिंग टूल्स जिन कॉन्टेक्स्ट से आते हैं डीलोनियलिटी और इंडीजिनिटी वो सफिशिएंट नहीं होते हैं डिराइव करने के लिए क्योंकि अंडरलाइन जो फिलॉसफी होती है जब तक आप उसको फर्स्ट प्रिंसिपल्स के लेवल पे नहीं देखेंगे तो आपको नहीं समझ आएगा। अगर बाद में हम चाहें तो इसमें कैसे ये इसको डिफाइन आरएसएस एक्चुअली इसको मेटाफिजिक्स के लेवल पे करती है आज की डेट में। इस बात से मतलब जो मेरा एक परसेप्शन है वह यह है कि हिंदुत्वनिज्म जब कन्वर्ज होता है कुछ बेसिक प्रिंसिपल्स पे और टेरिटोरिटी को अपना डिफेंस बनाता है तो कहीं ना कहीं यह अपने आप में एक पॉलिटिकल थियोलॉजिकल प्रोजेक्ट बनता है जहां पे पॉलिटिक्स थियोलॉजी को वेपनाइज वेपनाइज [गला साफ़ करने की आवाज़] करती है ताकि एक पर्टिकुलर गोल को अचीव किया जा सके क्योंकि हिंदुत्व का अपने कॉन्फ़िगरेशन के हिसाब से एक अलग गोल है और इजराइल का एक अलग गोल है बट एट द सेम टाइम दे हैव दिस कॉमन एनिमी व्हिच यू टर्म एस इस्लाम कॉमन एनिमी एंड म्यूचुअल एक्सक्लूजन एंड म्यूचुअल एक्सक्लूजन एक्सक्ट्ली अगर सिर्फ कॉमन एनिमी होता और म्यूचुअल एक्सक्लूजन नहीं होता तो भी लड़ाई होती और ये भी बहुत नेचुरल है कि हम क्लास स्ट्रगल में लेफ्टिस्ट के साथ काम करते हैं। हमें अगर कम्युनिटी में कहीं पे औरतों के ऊपर अगर जुल्म हो रहा होगा तो हमें हो सकता है लिबरल्स और फेमिनिज्म के उस कॉन्टेक्स्ट में उनके साथ काम करना पड़े थोड़ा। हमें अगर दिख रहा है कि भाई जिसे कहते हैं ऊंचनीच की बात हो रही है खास कि हम अंबेडकर राइट्स को ढूंढते हैं तो ऐसा नहीं है कि आप नहीं करते और नेचुरल भी होता है कि भ आप एक मल्टीकल्चरल सोसाइटी में पर्टिकुलर पॉलिसी प्रोजेक्ट के लिए अपने नेचुरल एलयंस ढूंढते हैं तो ये कोई डिस्टिंशन नहीं है कि भ वहां पे हो रहा है। सवाल होता है कि सही हो रहा है या गलत हो रहा है। पर्पस क्या है? इसी अलायंस को जिसके बाद इन जिसमें इंडिया और इजराइल शामिल है। अगर हम इंटरनेशनल वर्ल्ड ऑर्डर में पिछले कुछ महीनों में जो चीजें हुई हैं यूएस ईरान वॉर के वक्त और उसके बाद प्राइम मिनिस्टर का केनेस में जाके ऑनर लेना और उसके बाद चीजों को दो दिन के बाद आयतुल्लाह खामनाई को शहीद कर दिया जाता है। तो हमें यह मालूम देता है कि इंटरनेशनल ऑर्डर में भी इंडिया और इसराइल कहीं ना कहीं ओवरलैप करते हैं। तो मैं यह भी जानना चाहूंगा कि वििन स्टेट इट इज वेरी डिफाइनेबल दैट यू हैव अ आइडियोलॉजी एंड अ रिलीजन व्हिच यू कैन बिल्ड अप अपॉन बट क्या इंटरनेशनल ऑर्डर में भी एक थियोलॉजिकल प्रोजेक्ट एक पॉलिटिकल थियोलॉजिकल प्रोजेक्ट देखने को मिलता है जहां पे एक रिलीजियस सिंबलिज्म के थ्रू एक न्यू वर्ल्ड ऑर्डर को हम लोग इस्टैब्लिश करते हैं और उसके खुद के विक्टिम्स होते हैं और खुद के उसके नैरेटिव्स होते हैं। तो मेरा सवाल यह है अब आपसे कि क्या इंटरनेशनल वर्ल्ड ऑर्डर में या इंटरनेशनल रिलेशंस में ओवरऑल एक थियोलॉजिकल अंडरपिनिंग है या नहीं? बिल्कुल जो हमने पिछला डिस्कशन किया जहां पे हमने ये वाज़ किया कि भ जो मेटाफिजिकल लेवल पे डिफरेंसेस और ओवरलैप जो हैं इजराइल और हिंदुत्व एज अ जाइनिज्म एंड हिंदुत्व एज अ प्रोजेक्ट में। तो पहली बात तो यह कि भाई एक हमें जो पिछले 100 150 200 साल में जो एकमिया ने किया क्योंकि वहां पे स्पेशलाइजेशंस सुपर स्पेशलाइजेशंस हुए तो उन्होंने एक तरफ इंटरनेशनल रिलेशंस को अलग पढ़ाया। नेशनल पॉलिटिक्स को अलग पढ़ाया और वहां पर जो मॉडल्स प्रोड्यूस किए उसमें आपने नेशन स्टेट को ज्यादातर लोगों के ज़हन में एक एब्सोल्यूट आइडेंटिटी की तरह नेशन स्टेट भी एक तरह की आइडेंटिटी है ना। तो वो नेशन स्टेट 200 से ज्यादा हैं। तो इसका मतलब 200 लोग हैं जो शुरा में बैठ सकते हैं कि दुनिया पूरी क्या होगी? तो उन 200 लोगों के जो पूरा का पूरा जब जिस्म बन गया और उस जिस्म में उसकी नफ्स की कॉन्स्टिट्यूशनलिटी डिफाइन हो गई और उसने यह देखा कि इंटरनल पैथोजन क्या है तो वो बाहर भी देखेगा कि भ कौन बंदा कैसे बीमार है यही था कि भ क्यों म्यूचुअली एक्सक्लूसिव तो उस टाइम पे जब बड़ा अजीब सा लगता है कि जब हम यह देखें कि इजराइल 2023 के बाद पूरी दुनिया में उसको एक नेगेटिव परसेप्शन बिल्ड होता है। अभी तक एक 70 साल तक हिंदुस्तान का जो तजुर्बा और जो अ ओरिएंटेशन था वो डुअल नेचर का था, बैलेंसिंग था, नॉन इंटरवेंशनिस्ट था। अमेरिका और रशिया के बीच का या दूसरी सारी चीजों का। यहां पे पहली बार ऐसा हुआ कि बहुत विज़िबल पॉलिसी डिसीजन हुआ। आप चाहे आर्म्स ट्रेड ले लें, चाहे आप शेयरर्ड इंटेलिजेंस ले लें। यहां तक कि कि भाई वह जमाने में जो पूरा का पूरा पेगसिस का जो पूरा किस्सा हुआ था वो टेक्नोलॉजी कहां से आती है या फिर एलबिट सिस्टम्स हैं जो अडानी और ये सब जो वो है वो किस तरह से बहुत कॉम्प्रहेंसिव ट्रेड डील्स में है यहां तक कि यू नो पर्टिकुलरली द इशज़ ऑफ़ होमलैंड सिक्योरिटी। होमलैंड सिक्योरिटी के ट्रेनिंग होती है। ऑफिसिसेस ट्रेनिंग होती है। इतना तक कि भाई जब फिलस्तीनियों को 2000 ये 7 अक्टूबर 2023 के बाद क्योंकि हम जो बाद में बात करेंगे कि भाई किसी भी ऑप्रेसिव स्टेट की या किसी भी स्टेट की एक पॉलिटिकल इकॉनमी भी होती है। तो ऑप्रेसिव पॉलिटिकल इकॉनमी में होता यह है कि भाई आप चीप लेबर आपको चाहिए होता है। तो फिर जो इजराइल में चीफ लेबर था वह फस्तीनी थे और कजा के जो बेल्ट है या फिर वेस्ट बैंक है उससे करीबी जो वहां पे एग्रीकल्चर या दूसरी चीजें होती थी फस्तीनी जाते थे सुबह शाम को आते थे तो जब यह हुआ तो फिलस्तीनी अवेलेबल नहीं रहा आपके लिए आपने उनको सिक्योरिटी थ्रेट की तरह देखा और आपने उनको वापस भेज दिया अब आपको चीफ लेबर चाहिए था तो चीफ लेबर देने वाला हिंदुस्तान है हिंदुस्तान से लोग हजारों की तादाद में भेजे जाते हैं सिर्फ यह नहीं है कि भ आपका कि वो हाई लेवल पर आप इंटरेक्शन कर रहे हैं। आप अपनी सिटीजंस को वहां भेज रहे हैं कि उसकी इकॉनमी में पार्टिसिपेट करने के लिए। तो हत्ता उस वक्त जब हम यह देख रहे हैं कि दुनिया का जो रुझान है वह इजराइल से थोड़ा हट रहा है और नेक्सस में आप यह देख रहे हैं कि भ ओवरऑल जो है ये जो वॉर है या ये जो कॉन्टेक्स्ट है उसमें जो भी लोग इजराइल के साथ जुड़ रहे हैं या खड़े हो रहे हैं उनको बहुत नेगेटिव तरीके से देखा जा रहा है। इट इज विद इन दिस कॉन्टेक्स्ट दैट दे हैव चोजन टू ओपनली स्टैंड एट नेसेसट एंड डिक्लेयर कि भाई तुम जो है फादरलैंड हो हम मदर लैंड हैं और यह भी कोई ऐसा नहीं है कि भ जैसे वो आ रहा है कि भ सवरकर जब जाइनिज्म का मूवमेंट हो रहा है शुरुआत में 2030 में जब वो देख रहे हैं तो और उसके बाद जो 40 में 48 में जब वजूद में आता है या उससे पहले जो डिस्कशन हो रहा है वो यह बोल रहे हैं कि भ हमारे लिए जो सबसे अच्छा काम होगा वो यह होगा कि यहूदी अपना स्टेट बना लें ताकि मिडिल ईस्ट में मुसलमानों को वो क्योंकि वो वो इस चीज में देख रहे हैं कि भ यहूदी एज एथनो नेशनलिस्ट प्रोजेक्ट विद देयर ओन फिलोसोफिकल बेस दे आर गोइंग टू प्रोड्यूस एन इंटरनेशनल रियलिटी वेयर इन मुस्लिम्स विल बी कंट्रोलोल्ड एंड करेल्ड बट एट द सेम टाइम आरएसएस की बड़ी लीनिंग हिटलर के जर्मनी से नाजी पार्टी से तो यह दूसरा आस्पेक्ट है कि उसी वक्त वही जो यहूदी हैं जिनका जेनोसाइड हो रहा है उसको भी अप्रिशिएट कर रहे हैं। गोलवालकल बोल रहे हैं कि भ यही तरीका है कि भाई जब आप अपनी माइनॉरिटी आपके हाथ में नहीं आती तो आपको उस तरह दबाना चाहिए। बाय द लॉजिक ऑफ एब्सोल्यूट पावर जो आपकी वहां पर क्या देखा जा रहा है कि हिटलर को देखा जा रहा है कि वो अपने प्रोजेक्ट का टैिलिटेरियन वर्जन है जहां पे वो कोई भी जो पैथोजन है उसको इरेज करेगा। तो वहां पे जूस पैथोजन है। यहां पे जूस जो हैं वो अपनी एथनोनेशनलिस्ट आइडेंटिटी को कंस्ट्रक्ट कर रहे हैं और वहां पे उनको यह फायदा मिल रहा है कि यह मुसलमानों को भी चेकक्स एंड बैलेंस में रखेंगे। तो द प्रोजेक्ट इज यू नो मेजोरिटेरियन नेशनलिज्म प्यूरिटेटरिनिज्म प्यूरिटेटरिनिज्म है तो यह कॉमनैलिटी है तो यूजुअली होता क्या है कि लोग इस इसी कॉमनैलिटी से पूरी फिलॉसफी को बोलते हैं दोनों कंपैरेबल है इतना ही कंपैरिजन है और इसकी वजह से जैसे हमने बोला कि भाई क्लास में किसी से बात होगी कास्ट के लेवल पे किसी को उस इंटरसेक्शनलिटी पे जो पॉलिटिक्स होगी वो कॉमन पॉलिटिक्स होगी चाहे बाकी सब चीजों में अलग हो तो कॉमनलिटी यह है कि भाई आप एक ही टाइम पर हिटलर को भी इसलिए अप्रिशिएट कर सकते हैं उसको भी क्योंकि आपका प्रोजेक्ट जो है वह जेनोसाइडल है। टोटलिटेरियन है, मेजोरिटेरियन है। एंटी प्लूरलिस्ट है। अगर आप आपकी मेटाफिजिक्स आप प्लूरलिज्म से ले रहे हैं। लेकिन वो ऑर्डर्ड हरार्किकली ऑर्डर्ड प्लूरलिज्म है कि दुनिया तो प्लूरल प्लूरल ही भी है। मुस्लिम इलाकों में भी रह रहे हैं दूसरे लोग। लेकिन आपका डिस्ट्रीब्यूशन ऑफ जिसे कहते हैं एजेंसी कैसे है? एक पर्टिकुलर तरह की होमोजेनिटी जो अचीव करना चाहते हैं और उसका वायलेंस सबसे बड़ा सहारा बनता है। मगर साथ-साथ यह भी है कि जहां तक मेरी रीडिंग है गोवलकर यूज़्ड टू लाइक उनका एक नजरिया था कि हम स्टेट को एक ऑर्गेनिक नजरिए से देखते हैं। एंड इट इज़ अ वेरी प्रिवेंट प्रिवेंट थ्योरी इन एकेडेडमिया कि एक ऑर्गेनिक व्यू ऑफ़ स्टेट होता है। तो, जो बात आपने कही, इट अटेस्ट द अह टु द फ़ैक्ट दैट कि वह अह आउटसाइडर्स को यानी मतलब जो उनकी टर्मिनोलॉजीस थी उसमें वो पैथोजन की तरह देखते थे कि वी हैव टू क्लीन देम। वी हैव टू क्लीन देम आउट। एट द आज भी लोग कॉकरोच की तरह देख रहे हैं। हालांकि वो मूवमेंट में बहुत प्रॉब्लम्स हैं। लेकिन द वोकैबलरी तो कहीं ना कहीं से आती है ना। टर्माइड्स हैं, कॉकरोचेस हैं। और एट द सेम टाइम जब आप जर्मनी में देख रहे हैं ड्यूरिंग 1930 हिटलर का भी एक यही नजरिया था कि वी हैव टू फॉर्म अ रेस व्हिच इज़ प्योर इन इट्स क्रिएशन। लाइक वी हैव टू लाइक दे आल्सो हायर्ड उनके खुद के यूजेनिक्स थे जो ये चीजें चेक करते थे कौन रेस में असिमिलेट हो सकता है कौन नहीं हो सकता है। सो दे डीएनए का प्रोग्राम था। प्योर डीएनए का प्रोग्राम था। और एग्जैक्टली इसी तरीके से जब हम देखते हैं कि जाइनिज्म में अब जब हम मॉडर्न टाइम्स में ये चीजें देखते हैं कि इस वक्त पे जाइनिज्म और हिंदुत्व का जो पॉलिटिकल प्रोजेक्ट है जो थियोलॉजिकल ग्राउंडिंग पे एस्टैब्लिश किया गया है। ये ग्रैंड हिस्टोरिकल क्लेम के साथ एक एक्सक्लूजन इंक्लूजन को भी आगे बढ़ाता है। यह एक्सक्लूजन सिर्फ अह वायलेंस को नहीं सामने लेके आता है। साथ ही साथ ये एक सिविलाइजेशन स्टेट के भी अ क्रिएशन को आगे बढ़ाता है। जो ये सिविलाइजेशन स्टेट का डिस्कोर्स है इसमें आपको क्या ये स्टेट के सिर्फ हिस्टोरिसिटी से रिलेटेड है या इसके ये गवर्निंग लॉजिक में भी शामिल है? जब हमने यह आर्गुममेंट दिया कि जो टेरिटोरियलिटी है और जो जो फिलॉसफी है वो कंप्लीटली फ्यूज्ड है। फिलॉसोफी के भी अलग-अलग लेवल्स होते हैं। एक होता है कि भाई इंडिविजुअल लेवल पर फिलॉसोफी क्या कह रही है? एक उसका इज्तिमाई और कलेक्टिव विज़ होता है। ऑर्गेनाइज कैसे हो रही है? वो फिलॉसोफिकल विज़न। तो कोई भी जो फिलॉसफी अपनी को यह क्लेम करेगी कि उसका होलिस्टिक विजन है किसी चीज का लेके तो उसका एक विज़ सिविलाइजेशन का भी होगा। सिविलाइजेशन को अब प्योरली आप स्टेट के फॉर्म में देखें तो गलत है। मतलब सिविलाइजेशन ऐसी भी हो सकती है। पर मान लीजिए पर्शियन सिविलाइजेशन है, इंडियन सिविलाइजेशन है वो है कि वो ओवरलैप कर सकती है डिफरेंट टेरिटोरियल रीजंस में। टेरिटरी फॉर्म और वो होती रही हैं हिस्टोरिकली। तो जो उसका सिविलाइजेशनल पर्सपेक्टिव है कि हिंदू सोसाइटी ऑर्डर्ड कैसे होती है? और वो नॉन हिंदूस से कैसे डील करते हैं? मलेज हो या दूसरे भी या विद इन हिंदूइज़्म जो डिस्टिंशंस हैं उनके विद इन ऑर्डरिंग कैसे होती है? उसके रूल्स क्या हैं? उसके रेगुलेशंस क्या हैं? उसकी राइट्स क्या हैं? उसके ड्यूटीज क्या हैं? क्या चीजें वो प्रोहिबिट करते हैं? तो सिविलाइजेशन तो प्रोड्यूस होती ही है। सिविलाइजेशन स्टेट जब बनता है कि जब स्टेट का जो स्ट्रक्चर है वो ये कोशिश करे कि सिविलाइजेशन के लॉजिक को बॉटम अप के साथ-साथ वो स्टेट के इंस्टीटशंस में मैनिफेस्ट कर दे। शुरू में हमने यही बात की ना कि लॉ का पर्टिकुलर यूनिफॉर्म सिविल कोर्ट का एक पर्टिकुलर इंटरप्रिटेशन होगा। ट्रिपल तलाक का होगा, एसआईआर का होगा, सीए का होगा, इमीग्रेशन का होगा, सिटीजनशिप का होगा। हम आपका यह होगा कि भाई किसको रिजर्वेशन मिल सकता है, किसको नहीं मिल सकता। आपकी और भी जितनी भी स्टेट की किसको आपको आपको यह बोल सकते हैं किस तरह का काम करना चाहिए? किसको आपको अगर आपके बच्चे इतने से ज्यादा हैं तो फिर आप को जॉब नहीं मिलेगी। हालांकि वो जो रूल्स हैं वह रिलैक्स कर दिए जाते हैं। इवन अगर वह कहीं और पर मिलते भी हैं। लेकिन रूल्स एक्सिस्ट इसलिए करते हैं क्योंकि उसका कम से कम एक पर्टिकुलर कम्युनिटी को यूज करने में उसको मार्जिनलाइज करने में टारगेटिंग हो सके। तो उसमें फिर उनको एनआरसी के बाद सीएए लाना पड़ता है कि भ अगर हम इसमें हमारे भी लोग आ रहे हैं तो उनको फिर इंक्लूड करने का लॉजिक। तो एक्सक्लूजन और इंक्लूजन ये दोनों चीजें एक साथ चलती हैं। और उससे यह है कि भाई सिविलाइजेशन स्टेट जब हो जाता है जैसे इस जाइनिज्म के पर्सपेक्टिव से हालांकि जुडिज्म का जो प्रैक्टिस्ड फॉर्म है और जाइनिज्म की जो पॉलिटिकल फिलॉसफी है आज की डेट में उसमें कोई डिफरेंस नहीं है। 93% ऑफ द जूस विद इन इजराइल। अगर यह बोले कि भाई हम चाहते हैं कि गजा में जेनोसाइड हो तो इट इज़ अ हाईली फ्यूज्ड सब्जेक्ट। सब्जेक्टिविटी अगर कोई और वर्जनंस हैं भी अवेलेबल तो दे आर अ माइक्रो माइनॉरिटी। दे डोंट मैटर मच। इंडिया में अभी उस लेवल का फ्यूजन हुआ नहीं है लेकिन हो रहा है। वह फ्यूजन जो है वह उसको सिविलाइजेशन स्टेट के लॉजिक की तरफ ऑलरेडी एकिस्ट करता है फ्रॉम द फोर्स पर्सपेक्टिव जितना [नाक से की जाने वाली आवाज़] जितना जो एंटी माइनॉरिटी एंटी मुस्लिम इवन दलितों के खिलाफ वो बहुत सारी चीजें ऐसा होता है कि भ क्योंकि मुसलमानों को विजिबलाइजेशन और हाइपर विजिबलाइजेशन किया एक तरफ उनको इरेज किया जा रहा है उनकी पावर को दूसरी तरफ उनकी उनसे होने वाले पोटेंशियल थ्रेट को हाइपर विजिबलाइज किया जा रहा है तो इनविज़िबलाइजेशन और हाइपर विजिबलाइजेशन का कंट्राडिक्शन एक्सिस्ट करता है कि आपको क्या चीज विजिबलाइज करनी है, क्या चीज इनविज़िबलाइज करनी है। तो उस कॉन्टेक्स्ट से अगर आप देखें तो मुसलमानों की मार्जिनलाइजेशन का हाइपर विज़िबलाइजेशन में जो दलित एट्रोसिटीज हैं वो भी छुप रही हैं। हालांकि दलित एट्रोसिटीज कम नहीं हुई हैं। और वो छुपने की वजह से विजिबलाइजेशन ऑफ सबोल्टन दलित पार्ट ऑफ हिंदुत्व को हाइपर विज़िबलाइज किया जा रहा है। तो उससे जो प्रोजेक्शन हो रहा है कि भाई दूसरे दलितों पर जो आप पर नहीं है कि भाई पोटेंशियली हमारा यहां स्पेस है तो फिर सिविलाइजेशन कर क्या आती है कि वो सिर्फ यह नहीं प्रोड्यूस करती कि हम अपने बारे में कैसे सोचें वो यह भी प्रोड्यूस करती है हमारे बीच में लोग जैसे मुस्लिम राष्ट्रीय मंच क्रिश्चियन राष्ट्रीय मंच जैसे मजदूर का कोई आंदोलन बीएमएस जैसे जैसे आपकी कोई सोशल वेलफेयर की सोसाइटी जैसे कोई आपके स्कूल्स का नेटवर्क तो वो फिर एजुकेशन से लेकर वो वर्ल्ड व्यू जो है वो सिर्फ यह नहीं है कि हिंदूइज़्म अपने बारे में ऐसे सोचे। आप भी हिंदूइज़्म के बारे में कैसे सोचें कि आप भी हिंदू हो। यही बोल रहे हैं ना आए के चीफ? हम विश्व गुरु हैं। किस चीज के विश्वुरु हैं? तो फिर यह सिविलाइजेशन लॉजिक ऐसा होता है कि जो सेल्फ रिप्रोड्यूस्ड होता है। मतलब नेशन स्टेट अभी भी एक टेक्नोलॉजी है। अब टेक्नोलॉजी क्या है कि भाई लोग ही टेक्नोलॉजी हैं। तो न्यू हिंदुत्व नेशन स्टेट के भी इस लेवल के नीचे है कि भ आरएसएस नहीं अब आपने एक्सियम्स प्रोड्यूस कर दिए कि भ हिंदू सिविलाइजेशन कैसे प्रोड्यूस होती है और वो आपने जो एक्सियम्स हैं मतलब जो उसकी रिक्वायरमेंट्स हैं उन्होंने आपने उनको लोगों की रूह में तक निचोड़ दिया जिसको इरफान अहमद एक लेवल पर हिंदू ओरिएंटलिज्म भी बोलते हैं कि आपको आपके बारे में सोचने के उन वो तो यह बोलते हैं कि भ ब्राह्मण कैसे या दूसरे लोग जो अप्रकाश है वो कैसे मैं उसको और ज्यादा आगे ले जाऊंगा कि आप ही के लोग में लोग क्रिएट करें और उनसे बुलवाएं कि अपने बारे में कैसे सोचो ये और एक्सटेंशन है। हालांकि वो भी हिंदू ओरिलिज्म में आएगा कि उनको इंपल्स हो रहा है। बट उसकी जो लोकेशन है फिजिकल लोकेशन है। उसमें फिर और जस्टिफ़िकेशन है कि भई 2002 के 2002 के गुजरात राइट्स के कुछ महीने बाद मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ऑफ़िशियली बनाई गई। और उनका काम क्या था कि भ ये साबित करना कि भ जो हिंद कुछ मुसलमान भी हैं वो भी बीजेपी के साथ हैं। आज आप देखिए वाइस चांसलर्स हमारे जामिया के दूसरी जगहों के किस तरह से तो सिविलाइजेशन और डीपर हो गई है। वो नेशन से भी इसीलिए बोलते हैं वो लोग कि भ हिंदू सिविलाइजेशन बिफोर नेशन। लेकिन मुसलमानों के लिए क्या इस्लाम पहले या नेशन पहले? और हिंदुओं के लिए क्या सिविलाइजेशन पहले या नेशन पहले? तो डिस्कोर्स की कॉम्प्लिकेशन और कॉम्प्लेक्सिटी भी क्रिएट की जाती है। क्योंकि पावर आपके पास में है, माइक आपके पास में है। आप उनसे क्या सवाल पूछोगे? उनसे क्या सवाल पूछोगे? और आपने नहीं हिंदू सिविलाइजेशन ही हिंदुस्तान है। तो फिर नेशन और सिविलाइजेशन की हायरार्की क्यों? क्योंकि आपको पता है कि नेशन की कैटेगरी में कल को अगर कोई और आ गया तो हो सकता है कि भाई सिविलाइजेशन को फिर दूसरे इंडियन पर्सपेक्टिव जो कोई और दिया जा रहा है उससे देखा जाने लगे। तो इसका मतलब आपके लिए भी नेशन फर्स्ट नहीं है लॉजिक में। तो जैसा कि आपने बहुत इस बात पर बहुत ही अच्छा एनालिसिस दिया कि कैसे हिंदुत्व अपने को एक्सेसबल बनाता है सिर्फ अपनी कम्युनिटी के लिए नहीं साथ ही साथ दूसरी कम्युनिटीज के लिए भी स्पेशली माइनॉरिटीज के लिए भी ताकि जो गेज़ है हिंदुत्व को लेके वो डिॉल्व हो सके जिससे एक पर्टिकुलर तरह की साइकी प्रोड्यूस हो सके जहां पे आपकी बाइनरी कि आप लॉयल हैं कि लॉयल नहीं हैं ये चेंज हो जाए नेशन और सिविलाइजेशन के क्वेश्चन में जब हम बात करते हैं कि जो एक डिवाइन क्लेम है जो एक एब्सोल्यूट क्लेम है लैंड को लेके और इसका जो बेसिस है वह इसमें है कि जो भी फॉरेनर यहां पे आए एज अ मुस्लिम एज अ क्रिश्चियन जो एक बड़ा क्लेम है आरएसएस के टेक्स्ट में देखने को मिलता है उनके आइडियोलॉग्स के रिट्रिक में देखने को मिलता है तो जो पर्टिकुलरली मुस्लिम्स के कॉन्टेक्स्ट में जो फॉरेनर का परसेप्शन है उसमें सबसे बड़ी जो इनकी वो कंटेंशियस बात है वो यह है कि मुस्लिम जो है वो किसी भी तरह से अगर इस कंट्री में एक्सिस्ट कर रहा है देन ही इज़ नॉट टोटली एकिस्टिंग एस पर नेशनल है पोटेंशियल एंटीनेशनल है वो यहां फिट नहीं होता इवन इफ ही इज़ अ सेकुलर ही माइट ही माइट बिकम समवट मोर मुस्लिम एंड ही इफ ही इज़ मुस्लिम देन ही इज़ ही माइट बिकम अ रेडिकल ऑफ सम काइंड सो जो एक फनेटिक गेज़ है मुसलमानों को लेके उसके बारे में कुछ कॉलोनियलिटी को डी कॉलोनियलिटी को हिंदुत्ववादी जब कंस्ट्रक्ट कर रहे हैं तो उस लॉजिक में बड़ी इंटरेस्टिंग बात मैंने देखी है। पहली बार मैंने जैसा दीपक के एक पॉडकास्ट में सुना कि भाई जो ओरिजिनल जो सेपरेटेस्ट लॉजिक है वह इंडिया में आता है वो शाह वली उल्लाह के अ उससे आता है उसकी लिटरेचर से आता है और उसमें स्पेशली जो शाह अब्दाली को उन्होंने लेटर लिखा यहां पे क्योंकि मराठा और जो जाट वो उस टाइम पर मुगल जो एंपायर है उसमें ऑलमोस्ट कंफ्रंटेशनल वो चल रहा है और मुगल डिक्लाइन हो रहा है तो उस कॉन्टेक्स्ट में शाह वली उल्लाह जो हैं वो एक लेटर लिखते हैं शाह अब्दाली को कि भाई आप आके यहां पर इंटरवीन कीजिए मुगल वरना सोवनिटी डिक्लाइन हो जाएगी। तो उसको देखा जाता है कि भ ये हिंदू के खिलाफ वो था। हालांकि शाह वली उल्लाह की जब आप खुद की वो देखेंगे लिटरेचर पढ़ेंगे तो वहां पे हिंदू वर्ड नहीं इस्तेमाल हो रहा है। वो जाट और मराठा और सिख क्योंकि वो वहां का जो उस टाइम की जो जो पूरी अ पॉलिटिकल जो कंफ्रंटेशंस हैं उसका लॉजिक हिंदू मुसलमान कम है क्योंकि बहुत सारे हिंदू आपको उसमें भी मिलेंगे वहां पे औरंगजेब की खुद की उसमें बहुत हिंदू थे और ये सारी चीजें लोग जानते हैं। वहां का लॉजिक ज्यादा था कि मुगल सोवनिटी कि भाई एक एक तरीके का हिंदुस्तान में मुसलमानों का जो यहां पर हिंदुस्तान में मुसलमान है उनका रूल है और उस टाइम पे जो एक इंटरनेशनल ऑर्डर उस टाइम पे भी था जैसा आज है कि भ इजराइल जो मदद मांगता है तो अमेरिका की मांगता है कोई बोले इतनी दूर से क्यों मदद मंगाई जा रही है या फिर ईरान जो मदद कर रहा है वो हजबुल्लाह की कर रहा है इसकी कर रहा है तो उस टाइम पे एक पर्शनेट वर्ल्ड भी था जिसको बोलते हैं कि भ आपकी बहुत सारी वहां पे क्योंकि अफगानिस्तान में भी जो रूल हो रहा है या फिर जो इस इलाके में भी जो रूल हो रहा है, वह कहीं ना कहीं बहुत सारी लीनेजेस कॉमन भी थी और उनका इंटरेक्शन भी था, गुड रिलेशंस भी थे। तो ऐसा भी हुआ है कि भ आपने टीपू सुल्तान ने खलीफा से मदद मांगी ब्रिटिशर्स के खिलाफ। लेकिन उन्होंने सेफ पैसेज दिया क्योंकि ब्रिटिशर्स ऑटोमोमंस के फ्रेंच के खिलाफ उनके सपोर्टर थे। तो यह बड़ा लॉजिक जिसे कहते हैं ना कि कई बार बहुत सिंपलिस्टिक हो जाता है कि मुस्लिम वर्ल्ड हमेशा एक दूसरे के सपोर्ट में रहा है या हुआ है। बहुत सारे हिंदुओं ने रूलर्स ने भी अब्दाली को लेटर लिखा मराठा और उसके खिलाफ क्योंकि उनकी खुद का रूल इंटरइंड था मुगल सल्तनत से। तो एक तो यह बात है कि एक बड़ी डिफरेंट कॉन्टेक्स्ट में हुई हुई बात है। दूसरी यह बात है कि भाई उसका मेन लॉजिक यह है कि जो ज्यादातर हिंदुस्तान में इस्लामिक मूवमेंट्स हैं जो 20थ सेंचुरी लेट 19 सेंचुरी अर्ली 19 सेंचुरी या 20th सेंचुरी में जो डिबेट्स हुई हैं कि हिंदुस्तान में मुसलमानों का क्या रोल है क्योंकि 1857 के बाद आपकी पॉलिटिकल सोवनिटी खत्म हो गई है। और अब आपको यहां पर रहने के लिए क्योंकि वहां पर जो लॉ ऑफ फेक और यह सब प्रोड्यूस हुआ उसकी आपकी जो रिलेशंस क्या होंगे माइनॉरिटी के मेजॉरिटी के ये सारी चीजें आपने एक हिस्टोरिकल 1000 साल क्योंकि दुनिया पे रूल किया तो आपका फिक का ज्यादातर जो डिस्कशन है वो इस कॉन्टेक्स्ट में हो रहा है। तो एक बहुत लंबी डिबेट्स हुई तो उनमें अलग-अलग वर्ल्ड व्यूज आए। उसमें जमीत उलमा भी है, जमात इस्लामी भी है, मुस्लिम लीग भी है। उसमें बरेलवी बरेलवियों का भी एक व्यू है, अहले हदीस का भी एक व्यू है। वहां पे सर सैयद अहमद खान भी एक व्यू लेके चल रहे हैं। लेकिन सब में जो कॉमनैलिटी कॉमन थ्रेट है इंटेलेक्चुअल ट्रेडिशन में वो शाह वली उल्लाह का जो इस्लामिक होलिज्म है वो है। तो कहीं ना कहीं अलग-अलग चीजों में अपनी जस्टिफिकेशन लाने के लिए वो शाह वली उल्लाह के लिटरेचर से कोई ना कोई जस्टिफिकेशन लाते हैं। जैसे अहले हदीस का जो है कि भ वो उनकी हदीस फर्स्ट अप्रोच है और अथरी उनका क्रीड है लेकिन क्योंकि हदीस का लिटरेचर आपको बहुत स्ट्रांग मिलता है शाह वली उ्ला में हिंदुस्तान के कॉन्टेक्स्ट में तो वो भी उनको मानते हैं पॉलिटिकल थियोलॉजी उनके यहां पर है क्योंकि भाई मुगल सोवनिटी के उस दौरान लिख रहे हैं तो भाई इस्लामिक वर्ल्ड व्यू से पॉलिटिक्स कैसे होती है उसकी बात हो रही है तो आपको मौदूदी भी मिलेंगे उनमें इंटरेस्टेड आपको उनमें इंटरेस्टेड हमीदुद्दीन फराही भी मिलेंगे कि जो नज़्म की बात कर रहे हैं क्योंकि जो शाह वली उल्लाह हैं वो एक होलिस्टिक अप्रोच की बात कर रहे हैं। वो कुरान का तर्जुमा भी कर रहे हैं। कुरान के विदिन भी वो बात वो तदवी की भी बात कर रहे हैं। वो कुरान की विज़डम और हिकमत की भी बात कर रहे हैं। वो सारी चीज़ आपको शिबली नोमानी भी उनकी तारीफ करते हुए मिलेंगे क्योंकि वो हिस्टोरिकल एनालिसिस भी कर रहे हैं। सिविलाइजेशनल स्टडी भी कर रहे हैं। आपको अल्लामा इकबाल भी मिलेंगे क्योंकि शाह वलीला भी ऑनटोलॉजी की बात कर रहे हैं। वह भी वजूद की डिबेट्स में जा रहे हैं। वो भी वहदतु वजूद और वहदतु शहूद जो पूरा एक डिबेट तसवुफ का है उसको डील कर रहा है। तो इसी तरह सर सैयद का जो एजुकेशनल रिफॉर्म है कहीं ना कहीं शाह वली उल्लाह भी करिकुलम के हवाले से क्या पढ़ाना चाहिए कैसे पढ़ाना चाहिए होलिस्टिक होना चाहिए कंटेंपरेरी होना चाहिए और उसका इंपैक्ट होना चाहिए तो वहां से वो भी निस्बत पाते हैं। तो ऐसा कोई शायद ही गुजरा होगा जो 19वीं सदी और 20वीं सदी में सोच रहा हो जिसके ऊपर शाह अली उ्ला का इंपैक्ट ना हो। हालांकि हम इस पे पेपर लिख रहा हूं मैं। आप भी उसको देख रहे हैं कि वो इंपैक्ट अपने आप में सब लोगों ने शाह अली उल्लाह प्रेम्ला के विज़न के टुकड़ों को अह अपना यूनिवर्सल बनाया। विदाउट नेसेसरीली अंडरस्टैंडिंग एंड इंटीग्रेटिंग ह होलिज्म। वह किसी और गुफ्तगू का मौजू है। बट जो यह लोग हैं जो हिंदुत्ववादी हैं और स्पेशली जय साहिब दीपक वगैरह ने अपनी इंडिया दैट इज बाहर ट्रियोलॉजी में जो वो वाला उनकी किताब है जहां पे वो इस्लाम की हिस्ट्री हिंदुस्तान में उसको टच कर रहे हैं। तो उनका यह है कि भाई एक तरफ तो आपने बाहर से किसी को बुलाया हिंदुओं के खिलाफ और दूसरी तरफ यहां पर अब जो बकाया जितने भी पिटिकल इस्लामिक या नॉन पॉलिटिकल मूवमेंट्स हैं तबबलीगी जमात भी कहीं ना कहीं वहीं से नस्बत पाती है तो ये नजवा भी वहीं का प्रोडक्ट है। तो ये सब जो लोग हैं वो अब इस शाह वली उल्लाह जो कॉलोनाइजर हैं ये उनके प्रोडक्ट्स हैं। इसीलिए मदरसे, मस्जिद यह सारी चीजें वह चाहे आपका एक हिंदुस्तान की आजादी में मूवमेंट हो, चाहे आपका ना हो, वो जो हिंदुत्व की जो अंडरस्टैंडिंग है इस्लाम की वो कंप्लीटली एक्सक्लूसिव और एग्जॉस्टिव है। नंबर वन। नंबर टू जब इन्होंने यह बोला कि भाई इन्होंने भी हम भी मॉडर्निटी का क्रिटिक करते हैं। इन्होंने भी मॉडर्निटी का क्रिटिक किया और यह बोला कि भ जो मॉडर्निटी है वो मुसल्लत है यहां पर। दूसरा जो हमने बोला कि भाई सिर्फ मॉडर्निटी नहीं जो मुखल सोवनिटी से निकलने वाले जो इस्लामिक प्रिंसिपल्स हैं वह भी यहां पर काबिज थे कोलोनाइजर्स थे और हम उसको एड्रेस नहीं कर पाए तो ये तो हमारा इसमें आ गया लेकिन जो मॉडर्निटी वाला पार्ट है ये तो शाह व्ली उल्लाह में पूरा आ गया कि भ इस्लामिक कॉलोनियलिटी बट एक जो मॉडर्निटी की कॉलोनियलिटी है उसमें फिर अगर मुसलमान सब कुछ छोड़ के एथिस्ट भी हो जाए लिबरल भी हो जाए तो भी वह अब फॉल बैकक होता है। मॉडर्निटी के इंप्लिकेशन में आप सेकुलराइजेशन है, लिबरलाइजेशन है आपकी ये सब कुछ है। हालांकि डीकॉलोनियलिटी भी एक मॉडर्निटी का फ्रेमवर्क है जिसको आप खुलेआम इंत इस्तेमाल कर रहे हैं। यही मुसलमान भी करते हैं कि आपको मॉडर्निटी से प्रॉब्लम है लेकिन आप मोटरनिटी के फ्रेमवर्क्स को जो इस्तेमाल कर रहे हैं उनको बगैर क्वालीफाई किए कर रहे हैं। आप कर सकते हैं। लेकिन फिर आपको अपेरेटस को जिसे कहते हैं वेस्टर्न ट्रेडिशन से डिलिनिएट करके उसकी उसकी वो फ्रेमवर्क को सामने रखना पड़ेगा कि उसकी लिमिट्स क्या है या अगर उसको एक्सपेंड करें जैसे इस्लामिक कलाम में यूनानी फलसफे के साथ हुआ ग्रीक फिलॉसफी के साथ हुआ तो इस तरह से आप ना तो आप कम्युनिस्ट हो सकते हैं ना लिबरल हो सकते हैं ना आप मॉडर्निस्ट हो सकते हैं ना आप यू नो सेकुलर हो सकते ना आप कोई भी जो इस्लामिक ट्रेडिशन है ना देवबंदी हो सकते ना आप बरेलवी हो सकते बरेलवी लोग भी तसवुफ की अपनी पूरी लीनेज शाह वली उल्लाह से लेते हैं इतना एग्जॉस्टिव है वो पैराडाइम क्योंकि वो होलिस्टिक था तो वहां से अब आप इसका मतलब हिंदुस्तान में जो सिर्फ एक बकाया आइडेंटिटी हैज़ अ मुस्लिम वो वो आइडेंटिटी है जो उन्होंने आपको दी मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की आप हिंदू हैं आपकी की यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर्स यह बोलते हैं कि भाई हम हिंदू हैं। वो मूर्ति के सामने हाथ भी जोड़ते हैं। इंडिया जैसी मल्टीकल्चरल कॉन्स्टिट्यूशनल स्टेट में इसकी जरूरत नहीं थी। ना हमें ये उम्मीद करनी चाहिए कि हिंदू लीडर्स आके मस्जिद में, मदरसे में या फिर खानकाहो में विजिट करें। कोई जरूरत नहीं है। उनका अपना एक रिलीजियस अंडरस्टैंडिंग हो सकती है। ना उन्हें उम्मीद करनी चाहिए हम हमें यह करने की। ये एक डिफरेंट आस्पेक्ट है आपकी लाइफ का। ये जहां भी हुआ है वो एक गुडविल के रिसेप्शन से हुआ है। गुडविल के रिसेप्शन से भी कह सकते हैं लेकिन पॉलिटिकल अपीजमेंट भी है, वोट पॉलिटिक्स भी है। इट हैज़ मल्टीपल डायमेंशंस। ना हो तो चल सकता है ना। आप उसको न्यूट्रल स्पेस में कीजिए। मैं नहीं चाहता आप मेरी मस्जिद में आके मेरी मस्जिद को आप उसको एक पॉलिटिकल स्पेस की तरह इस्तेमाल करें। उसको हम कर सकते हैं एज अ मोबिलाइजिंग फोर्स। अपनी लोकालिटी में चीजें सॉल्व करने के लिए। बट वहां से फिर आप एक पर्टिकुलर आईडियोलॉजी को आप मरकज बनाते हैं उसको वो एक अलग चीज है और एक मेंबर में बैठ के इमाम एक बात बोल रहा है वो अलग चीज है। तो यह यह जो है इस तरह का एग्जॉशन है कि भाई शाह वली उल्लाह दहलवी जिसको यह समझा गया कि वह बरे सगीर में साउथ एशिया में उनसे बड़ा इस्लामी मुफकिर थियोजियन जरिस्ट सिविलाइजेशनल थिंकर वो करप्शन की भी बात कर रहे हैं। आज हम करते हैं कि भाई किस तरह से मुस्लिम इललीट्स करप्ट हो गए हैं। कैसे वो वैल्यू एक्सट्रैक्ट कर रहे हैं। गरीबों से क्लास की स्ट्रगल को भी वह वाज़ कर रहे हैं। तो उस पूरी जो ट्रेडिशन की जिनलॉजी को वह एक ही बार में आपने एक्सक्लूड कर दिया और एग्जॉस्टिवली एक्सक्लूड कर दिया। तो फिर अब कुछ बचा नहीं। मतलब आप हिंदुस्तान में सिर्फ एक सब्जेक्ट हो सकते हैं। आप उसके सिटीजन नहीं हो सकते। सेकंड क्लास सिटीजन छोड़िए आप। सेकंड क्लास भी एक सिटीजन होता है। जब आपको यह बोला जा रहा है भ एसआईआर और उसके थ्रू कि आपकी सिटीजनरी भी आप सिटीजन ही नहीं है। आप सब्जेक्ट हैं। आपकी एक्सिस्टेंस इंस्ट्रूमेंटल है। इंस्ट्रूमेंटल है वो। और उसकी जो इंस्ट्रूमेंटालिटी है उसमें सबसे प्राइम जो ऑब्जेक्टिव है वो हिंदुत्व का कंसोलिडेशन एज ए ऑर्गेनाइजिंग प्रिंसिपल एज ए स्टेट। तो मुसलमान की कोई भी मोड ऑफ एक्सिस्टेंस मेजिटेरियन अप्रूवल के बिना पॉसिबल नहीं है। फिर लोग बोलते हैं भाई कांग्रेस का दौर अच्छा था, यह था वो था। हां हमें मानना चाहिए कि वो बेहतर था। उसमें भी दो चीजें हुई कि भ वो बेहतर था लेकिन जैसा होना चाहिए वैसा नहीं था। एटलीस्ट जो कॉन्स्टिट्यूशनल जो पैक्ट हुआ है उसके उस पे जो उनकी अपनी फिलॉसफी है उस पे भी पूरा नहीं हुआ। लेकिन उस वक्त में जो मुसलमान इस्तेमाल कर सकते थे उस वक्त का वह भी नहीं हुआ। हमने भी कंस्ट्रक्टिव यूटिलाइजेशन नहीं किया उस वक्त आज भी नहीं कर रहे। मैं फ्रैंकली बताऊं मुझे 5 साल हो गए, छ साल हो गए मुस्लिम कम्युनिटी इश्यूज में को करीब से देखते हुए सब लोगों के साथ काम किया, कोशिश करी। आज भी नहीं हो रहा है। जिस तरह से होना चाहिए। कोशिश तब कर रहे हैं। अब आप किसी की गुडविल को, किसी की नियत को तो आप नहीं बोल सकते। अच्छा हम कर रहे हैं। हम भी कोशिश कर रहे हैं। वो भी कर रहे हैं। हमारे ऊपर जो हमारी मिल्ली इदारे हैं उनकी सरपरस्ती रही है। लेकिन एक आइडियल होता है कि भाई आप मिनिमम आप इस तरह से करें। आपका एक प्रोफेशनली हो। आपकी अंडरस्टैंडिंग हो। आप इस चीज को एक लार्जर कैनवस पे देख रहे हो तो वह अनफॉर्चूनेटली वो वो लो रेोल्यूशन पिक्चर है। हाई रेोल्यूशन एग्जीक्यूशन का रोड मैप नहीं है। और उसके लिए जो फर्द की जरूरत है। ह्यूमन बीइंग्स की जरूरत है। वो ह्यूमन बीइंग्स प्रोड्यूस नहीं हो रहे हैं क्योंकि आपका कोई करिकुलम नहीं है। आपका कोई दायरा नहीं है जो इस तरह के ह्यूमंस प्रोड्यूस करता हो। जो इंडिया की प्रॉब्लम्स को सॉल्व कर सके। नॉट जस्ट मुस्लिम्स की प्रॉब्लम्स को। अब इस अब हमारी गुफ्तगू को थोड़ा थोड़ा लॉजिकल तरफ ले जाते हैं। जहां [नाक से की जाने वाली आवाज़] पे हम ये समझेंगे कि कैसे न्यू हिंदुत्व अपने आप को डिफरेंट अपट्रेस में एस्टैब्लिश करता है। इंटरेस्टिंगली जब हम पैरेलल्स ड्रॉ कर रहे हैं हिंदुत्व और जैनिज्म के बीच में तो एक पर्टिकुलर एग्जांपल मुझे याद आ रहा है इस वक्त कि जैसे अक्सर ये सवाल उठता है कि इतनी वैशत के बाद और इतने खून खराबे के बाद जो फिलिस्तीन में जोसाइड हो रहा है इजरयली सिटीजन कैसे इसे लेजिटमेट मानते हैं या कैसे इस चीज को लाइक वही डिस्कोर्स कि कैसे एक ह्यूमैनिटी के पर्सपेक्टिव से इसे सोचते नहीं है। मगर जहां तक इस पे कुछ डिस्कशंस हुए हैं जिसमें ये समझाया गया है कि उनका पर्टिकुलर उन सिटीजंस की पर्टिकुलर कंडीशनिंग बहुत डिफरेंट तरीके से होती है। फॉर एग्जांपल कि स्कूल्स में जब इजरयली बच्चे पढ़ाए जाते हैं तो वहां पे ये बताया जाता है कि तुम्हारे साथ एक होलोकास्ट हुआ है। एक होलोकास्ट चल रहा है और एक होलोकास्ट होगा। और ऑफकोर्स जो पास्ट का रेफरेंस है वो नाजी जर्मनी से है। जो प्रेजेंट का है वो फिलिस्तीन के कॉन्टेक्स्ट में है। तो उन्हें ये चीज कंडीशंड है कि जो अभी हमारे साथ स्ट्रगल हो रहा है हमारी टेरिटरी में या दूसरे की टेरिटरी में ये जरूरी है अपने साथ जुल्म होने जो उनके साथ जुल्म हो सकता है उसे रोकने के लिए। तो ये कंडीशनिंग आप देख रहे हैं ये इंडक्ट्रिनेशन बहुत छोटी उम्र से कराया जाता है। मगर मैं ये समझना चाहूंगा कि जब इस लेवल की पैडलिंग किसी आइडियोलॉजी की की जाती है तो उसे हार्ड वायर करना क्योंकि एक एक पर्टिकुलर टर्म है पॉलिटिकल थ्योरी में सोशियोलॉजिकल इंस्टीट्यूशनलिज्म जहां पे इंस्टीटशंस जो हैं वो सिर्फ अपने लॉज़ या कोड ऑफ कंडक्ट या रूल्स से बाउंडेड नहीं होते हैं। अपने ये सोसाइटी में एस्टैब्लिश किए गए हैं। उनके कल्चरर्स, उनके सिंबल्स और उनके रेट्रिक से भी इन्फ्लुएंस होते हैं। तो ये चीज न्यू हिंदुत्व के पैराडाइम में कैसे ऑपरेट करती है? इसकी क्या मेथोडोलॉजी रही है? जो तरह-तरह के इंस्टिट्यूशन चाहे वो स्कूल्स हो, चाहे वो नॉर्मल थिंक टैंक्स हो, चाहे वो इवन इट वुड बी वेरी प्लेन टू से कि गवर्नमेंट इंस्टिट्यूशन कैसे काम कर सकते हैं। मगर बहुत मन लेवल पे, बहुत ग्राउंडेड लेवल पे स्कूल्स, यूनिवर्सिटीज और जितने भी नॉलेज प्रोडक्शनंस के इंस्टीट्यूशन है वो कैसे इससे इन्फ्लुएंस हो रहे हैं और इसमें क्या तरीका न्यू हिंदुत्व अपनाता है? तो एक चीज जो आपने बोली वो तो एजुकेशन के हवाले से बोली के जब आपके पास स्टेटस अपेरेटस हो जाता है तो फिर आप डिसाइड कर सकते हैं कि भ करिकुलम क्या होगा? एजुकेशन पॉलिसी क्या होगी? वो तो हम लोग देख ही रहे हैं कि भाई किस तरह से एजुकेशन के करिकुलम को मुगल हिस्ट्री को या फिर ऐसे लोग लोगों को जो इंडियन मूवमेंट्स में जो एज अ थिंकर्स रहे चाहे वो मौदूदी हो मौला मौदूदी हो या दूसरे लोग हो अल्लामा इकबाल हो ये सारे लोगों को आप सिस्टम से बाहर कर रहे हैं। चलिए ये तो हायर एजुकेशन के लेवल पर हो गया। ठीक है वो लेकिन आप जो एक जनरल हिस्ट्री है एक हिंदुस्तान की कि आपको पता हो तो यही पता हो कि भ शिवाजी थे। पता हो तो कि मराठे थे। पता हो तो आपको चोलास थे। आपको पता हो चाणक्य थे तो आपको पता ही ना हो कि भाई आप हिंदुस्तान में एक 600 700 800 साल ऐसे लोग भी हुकूमत में रहे हैं कि जिनकी एक अपनी अंडरस्टैंडिंग थी चीजों को लेके चाहे सही थी या गलत थी वो एक डिबेटेबल चीज है। जैसे हम आज की डेट में हिंदुत्व को डिबेट कर रहे हैं। उसी तरह आप आराम से डिबेट कर सकते हैं कि औरंगजेब वर्सेस अकबर या फिर फलाना इट शुड बी अलाउड इन दैट सेंस। बट अगर आप उसको सिर्फ वेपनाइज कर रहे हो वेपनाइज लेकिन करते कैसे हैं? उसका भी कोई एक फ्रेमवर्क होना चाहिए ना। जब उन्होंने होलोकास्ट बोला तो उनको उनके पास एक लॉजिक है कि भ हमें मारा गया और हमें वो किया गया। तो यहां वहां पे तो फिर भी आपके पास एक ऑनगोइंग 10 साल 20 साल पुरानी हिस्ट्री थी जहां पे यह हुआ एक्चुअली उसी प्रिंसिपल को इन लोगों ने इस्तेमाल किया लेकिन उसमें मिथ कि उसमें हुआ नहीं हुआ वो मैटर नहीं करता। तो उसके अंडरपिनिंग लॉजिक्स हैं। एक तो यह लॉजिक है जो एकेरीमिया ने पूरी की पूरी जो थ्यरेटिकल फ्रेमवर्क डेवलप किया यह समझने के लिए कि कॉलोनियलिटी क्या प्रोड्यूस करती है और उससे वापस बाहर निकलने का क्या मतलब है? तो डीलोनाइजेशन का एक जिसे कहते हैं कि एक फ्रेमवर्क सामने रखा गया। लेकिन मुसलमानों ने भी इस मैं चारप साल पहले जब जेएनयू में था मैंने पहली बार सुना एसआईओ के बच्चे बोल रहे थे भाई डीलोनाइजेशन जेएनयू के एक प्रोटेस्ट में वर्ड मैंने सुना था जामिया में क्योंकि मेरा फिलॉसोफी का बैकग्राउंड है तो ट्रेनिंग है लेकिन डीलोनियलिटी ज्यादा पॉलिटिकल स्टडीज में और इस तरह एंथ्रोपोलॉजी और इस जगह ज्यादा इस्तेमाल होता है। तो मैं सोचा है क्या जरा इसको डीकंस्ट्रक्ट पूरा पढ़ा जाए। हालांकि डीकंस्ट्रक्ट वर्ड भी उसकी जीनियोलॉजी भी कहीं ना कहीं पोस्ट मॉडर्निटी और क्रिटिकल थ्यरी से आती है। तो डीलोनियलिटी जैसे थोड़ी देर पहले हो रहा था कम्युनलिज्म, डीकोलोनियलिटी, एथनिसिटी, नेशन ये कंटेनर कॉनसेप्चुअल कंटेनर्स हैं। कॉनसेप्चुअल फ्रेमवर्क्स हैं। सवाल मेरे ज़हन में आया कि हु इज़ डीकोलोनियलिटी? क्या हिंदुस्तान में या इंडीजिनिटी? कोई सबसे ज्यादा इंडीजीनस कौन है हिंदुस्तान में? डीएनए स्टडीज तो बोलती हैं कि भाई एनसेेस्ट्रल साउथ एशियन जो पिट पपुलेशन है जो यहां पर क्लासिकली हम जिसको ड्रविडियंस बोलते हैं अगर आप प्योर बोलेंगे कि भ सबसे ज्यादा जो यू नो सर्वाइविंग डीएनए वो तो फिर आपको अंडमान और निकोबार आइलैंड में वो एक यू नो पॉपुलेशन है वो और ज्यादा आपको कि यहां की इंडिजिनिटी [नाक से की जाने वाली आवाज़] और यह प्रविडियंस कि भ उनकी जीन पूल में तो एक तरफ तो इंडजीनिटी सवाल फिर से हु इज इंडजीनिटी इंडीजीनस है कौन? दूसरा सवाल डीलोनियलिटी कि भाई हमने चलो एक इंडजीनिटी की लॉजिक लगाई वह एथेनिसिटी से बोला तो फिर क्या यहां पे डीलोनियिटी एक दलित की ब्राह्मणों से या ब्राह्मणों की मुगलों से या फिर हिंदू की ब्रिटिश से मुसलमान की ब्रिटिश से मुसलमान की हिंदू से हिंदू की मुसलमान से एब्स्ट्रैक्ट लॉजिक है डीलोनियलिटी अगर आप एथिक्स डिफाइन नहीं करेंगे अगर आप हिस्ट्री डिफाइन नहीं करेंगे। आप अगर इंडजीनिटी डिफाइन नहीं करेंगे तो जो लॉजिक्स होते हैं चाहे वो सिविलाइजेशनल स्टेट हो, नेशन स्टेट हो इनके प्रिसीडिंग प्राइम प्रिमिटिव कांसेप्ट्स होते हैं कि भ वो प्रिमिटिव कांसेप्ट क्या है जिसकी कॉनसेप्चुअल इंटीग्रेशन से इंटरसेक्शनालिटी से वो आइडेंटिटी वजूद में आ रही है। जैसे शुरू में बोला कि भाई हिंदुस्तान मुसलमान सुन्नी मे बी हनफी मे बी देवबंदी मे बी यूपी वेस्ट मर्द फलाना शहर हिंदुस्तान का पार्ट एशिया का पार्ट उसमें भी फिर और क्रॉस सेक्शनालिटीज हैं इंटरडाइमेंशनलिटीज हैं। तो फिर ये डीलोनाइजेशन भाई किसका हो रहा है? तो मैं इनको बोलता था कि भाई ये जो लॉजिक है वो हिंदुत्ववादी इस्तेमाल करेंगे। डीलोनियलिटी तो एक यू नो ऑप्रेसर और ऑप्रेस के बीच का रिलेशन है और यह और वह फिर मेरे सामने जैसा ही दीपक आते हैं और वो हर वक्त डीोलोनियलिटी डीकोलोनियलिटी डीलोनियलिटी एक तरफ इरफान अहमद की किताब आ रही है टेररिज्म पे डीलोनाइजिंग एंथ्रोपोलॉजी ऑफ वायलेंस एक तरफ इंडिया दैट हज़ भारत डीलोनाइजिंग बड़ा एब्सर्ट लगता है। एक तरफ आपके जो सलमान सईद से लेकर यू नो शेर अली तरीन से लेकर आपके इनसे लेकर वाइल हल्लाक से लेकर आपके जोथन जो भी तलाल असद पोस्ट तलाल असद जनरेशन है और तलाल असद का ये भी जैसाई दीपक भी क्योंकि तलाल असद तो ही इज़ अ बिग थरिस्ट उनको सिर्फ ये नहीं उनको सेकुलर इंटेलिजेंस में भी पढ़ाया जाता तो अब उन्होंने डिसाइड कर दिया कि भ हिंदुस्तान में टू टाइप्स ऑफ कॉलोनाइजेशन वन इज़ द अरब मुस्लिम परर्शियन कॉलोनाइजेशन। द अदर इज़ द कॉलोनाइजेशन ऑफ़ द ब्रिटिश। एंड दिस इज़ मोर प्रिमिटिव कि भाई कॉन्स्टिट्यूशन ने एक कॉलोनाइजेशन को तो एड्रेस किया, दूसरे को नहीं किया। ब्रिटिश कॉलोनाइजेशन को एड्रेस किया उसको नहीं। अब आपके लिए आप मुसलमान के जब भी कॉन्स्टिट्यूशनल डिबेट हो कि तुम कॉन्स्टिट्यूशन को नहीं मानते। और हिंदुत्ववादी सुबह शाम बैठे हुए अपने फोरम्स में यह कॉन्स्टिट्यूशन प्रॉब्लमेटिक है। वह दिन रात यह बात करते हैं। सिविलाइजेशन प्रसीड्स कॉन्स्टिट्यूशन। सिविलाइजेशन प्रसीड्स एथिक्स क्योंकि एथिक्स उस सिविलाइजेशन में एक पर्टिकुलर एथिक्स है। हमें डीलोनाइज करना है, डीकोलनाइज करना है क्योंकि आपने करिकुलम चेंज करनी है। हमें डीकोलनाइज करना है इससे। अंबेडकर राइट को आपने एक्सेप्ट कर लिया क्योंकि वह कॉन्स्टिट्यूशनल लॉजिक है तो पेरियार से द्रविडियन लॉजिक से पर्टिकुलर लैंग्वेज से आप समझ रहे हैं तो डीलोनाइजेशन का इस्तेमाल किया गया लॉजिक का उसमें कि भ टू टाइप्स ऑफ कॉलोनाइजेशनंस हुई हैं। अब उस कॉलोनाइज़ेशन को अगर आपको जस्टिफ़ाई करना है तो किसी भी हिस्ट्री में मेरी ही कितनी से लड़ाई है। घर में लड़ाई है, बाहर लड़ाई है, कॉम्प्लिकेटेड सिचुएशंस होती हैं। वो होती है। उससे होता यह है कि मतलब ये वही लॉजिक है जो छोटे लेवल पे कि आपको विलनाइज कर दिया जाए। अरे यार वो तो है ही ऐसा। उसकी कोई कॉन्टेक्स्ट ना देखा जाए, हिस्ट्री ना देखा जाए, कॉम्प्लिकेटेड रियलिटी ना देखा जाए। अरे एक मंदिर तोड़ा था या 10 मंदिर तोड़े थे या 50 मंदिर बनवाए थे। मैटर नहीं करता। आनंद मठ में एक हिस्ट्री को हटा दिया गया। एक हिस्ट्री को रख दिया गया। उस हिस्ट्री को यूनिवर्सलाइज़ कर दिया गया। उस यूनिवर्सलाइज़ेशन के प्रिंसिपल्स सामने रख दिए गए। तो एक तरफ कॉन्स्टिट्यूशन का रीइंटरप्रेटेशन है और एक तरफ कॉन्स्टिट्यूशन का नेगेशन है। रीइंटेशन तो ऐसे है कि कॉन्स्टिट्यूशन तीन हिस्सों में है। प्रएमबल है। एक कॉन्स्टिटुएंट असेंबली से निकली हुई बॉडी ऑफ़ कॉन्स्टिट्यूशन एक ये है कि भ जो चीजें रॉल्व नहीं हो पाई डिबेट उसको डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स में डाल दिया। यहां पे आपकी जो कॉन्स्टिट्यूशनल बॉडी ऑफ़ लिटरेचर है। उसमें तो आपका लीगल प्लूरलिज्म है। लेकिन डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स जो ले जा रहे हैं वो यूनिफॉर्म सिविल कोर्ट की तरफ ले जा रहे हैं। वो काऊ सैक्रिफाइस की पर्टिकुलर डिबेट की तरफ ले जा रहे हैं। वो तो मेजोरिटेरियन जो लॉजिक है वो चाहे कॉन्स्टिटुएंट असेंबली में फॉर सेवरल रीज़ंस कंप्लीटली नेगोशिएट भी नहीं हो पाया लेकिन उधर प्रिंसिपल्स छोड़ दिए गए। और जो आपका प्रएमबल है वो 10 ऐसी चीजें हैं जो एब्स्ट्रैक्ट हैं। फ्रेटरनिटी इक्वलिटी इसको कोई भी डिफाइन कर दे। आज की डेट में वो बोल रहे हैं कि भ हम अद्वैतवाद वननेस ऑफ़ अहम ब्रह्मास्मि जब सब इक्वल हैं तो फिर ऊंचनीच कहां से हो गई? चाहे सोशियोलॉजिकल एंथ्रोपोलॉजिकल ऊंचनीच एक्सिस्ट करे। मुसलमान भी ऐसे ही कहता है कि भ इस्लाम में कहां कास्ट है? दलित मुसलमान एक्सिस्ट कर रहा है। वो शादियां नहीं हो रही है। एंड ऑफ कोर्स दैट इज़ नॉट एट ऑल कंप्लीटली इक्विवेलेंट टू द वे इट वर्क्स इन हिंदूज़्म। बट इट्स अ रेमिनेंस ऑफ इट। यू कैन नॉट डिनाई इट। आपने सैयद की कैटेगरी को भी वेपनाइज किया है। उसकी थियोलॉजी का क्या रिस्ट्रिक्शन है और उसकी आपने कहां से कहां तक ले आए उसको या शरीफ्स हैं तो बात यह कि भ आपको अब हिस्ट्री चाहिए कॉलोनलाइजेशन को जस्टिफाई करने के लिए और अगर आपके पास हिस्ट्री है तो अब आप उस हिस्ट्री के बेस पे आप यह बोल सकते हो कि भाई अब हमें यह चीज वापस एथिकल जिम्मेदारी है स्टेट की कि यह जो हिस्टोरिकल रॉन्ग हुआ है जैसे अंबेड कर ने दलित के लिए साबित किया। तो अब हमारे साथ ये हिस्टोरिकल रोंग्स हुए हैं। हिस्टोरिकल राइट्स हटा दो क्योंकि वो ठंडे बस्ते में तो वो मीनाक्षी जैन विक्रम संपत मीनाक्षी जैन टेंपल वायर का जो पूरा लिटरेचर है विक्रम संपत ने पहले सावरकर को थेराइज किया। अब वो भी टेंपल पे बोल रहे हैं। मथुरा के ऊपर उनकी पूरी किताब आई है। तो आपने एक लेवल पर हिस्ट्री, एक लेवल पर कॉन्स्टिट्यूशनल लैंग्वेज, कॉन्स्टिट्यूशन की लिमिटेशन जो कॉन्स्टिट्यूशन है उसको भी रीइटरप्रेट और जो नहीं है उसका सरप्लस जो आपको चाहिए डायरेक्शन की तरफ वह भी उसकी लिमिटेशन फिर आप नेशन से प्रसीड सिविलाइजेशन फिर आपकी हिस्ट्री का वेपनाइजेशन उसके बाद आपकी जियोपॉलिटिक्स इंटरनेशनल रिलेशंस तो राजीव बल्होत्रा कि भाई ये टुकड़े-टुकड़े लोग बांटना चाहते हैं। उसकी ये लॉजिक है ये सरप्लस जो आइडेंटिटी है वहां पे तो वो बैठ के जो पूरा का पूरा बाहर वो ग्लोबल हिंदू महासभा भी चल रही है। ग्लोबल विश्व हिंदू परिषद भी चल रहा है। आरएसएस भी जिसे कहते हैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से हिंदू स्वयंसेवक संघ बन जाता है। बट वो सरप्लस उम्मैटिक नहीं होना चाहिए। वहां से सरप्लस हो सकता है। तो राजीव मरोसा ब्रेकिंग इंडिया का फ्रेमवर्क उसके बाद आपका खुद आरएसएस के जो मोहन भागवत साहब हैं कि भ हर कोई हिंदू है। उसको राम माधव सिविलाइजेशनल आइडेंटिटी का लॉजिक देते हैं। तो सिविलाइजेशनल थ्यरी भी है, कॉन्स्टिट्यूशनल लीगल थ्यरी भी है, हिस्टोरिकल थ्यरी भी है। उसकी एथिक्स भी आप सिविलाइजेशन में डिफेंड कर रहे हैं कि क्यों? इसलिए बाबरी भी जस्टिफाइड है। इसलिए आपकी कमलमाला मॉस्क भी जस्टिफाइड है। मथुरा भी जस्टिफाइड है। तो हिस्टोरिकल रोंग्स हैं। आप आज खुद हर वक्त इललीगलिटी और उसके नाम पे जो मॉस्क डेमोलिशंस और डिस्ट्रक्शंस कर रहे हो जो आप क्लेम कर रहे हो टेंपल डिस्ट्रक्शन उस जमाने में अगर हुए भी हो मान लीजिए एक बार में तो टोटलिटेरियन लॉजिक होगा। अगर गलत हुआ आप इनको हटा दें जो हिस्टोरिकल क्लेम्स है बाकी सारे जो आप तोड़ रहे हैं जब भी कोई लॉजिक आप बोल रहे हो कि कोई बोल रहा है कि चलो ये ये लॉजिक ये बनाया गया कि भ इट्स अ सीट ऑफ पॉलिटिक्स इसलिए तोड़ा गया मैं मानता हूं एक बार वो मान भी लिया जाए आर्गुमेंट कि हां वो गलत था और ऐसा ही हो रहा था तो आप भी तो यहां पे कभी के मदरसा टेररिज्म कभी यहां पे कि भाई ये इललीगलिटी इललीगलिटी तो आपकी एक 100 साल पुरानी मस्जिद इललीगल कैसे हो सकती है या 100 साल पुरानी मदरसा या आपने जिस तरह से यहां जामिया में कहीं और पर पावर ऑफ एटर्निटी एटर्नी लोग लोगों के पास कैसे आई कोई ना कोई बाबू इनवॉल्वड है ना पैसा लेनदेन हुआ है यहां बिजली आ रही है पानी आ रहा है तो इललीगलिटी तो स्टेट जनरेट करता है ताकि फ्यूचर में एक पर्टिकुलर क्लास कास्ट रिलीजन को आप मार्जिनलाइज कर सकें उसकी प्रॉपर्टी छीन सकें और उसको ट्रांसफर कर सकें तो ये जो लॉजिक है हिस्ट्री में भी एंबेडेड है आज की डेट में जो इललीगलिटीज अलव की जा नहीं क्योंकि किसी के पास पैसा है देने के लिए बाबू ने खा लिया बाबू अपपर कास्ट है उसमें लोअर कास्ट भी हो सकता है लेकिन वो पैसे का एक मूवमेंट है तो वो कंप्लीट लॉजिक है कि मूवमेंट्स जो हैं जो डिक्लोनियिटी के नाम पे जो पूरा मेटाफिजिकल कंस्ट्रक्शन है वो अलग-अलग लेवल पे हुआ है उसकी एजुकेशनल की भी फिर पैराडाइम है जो अब स्टेट उसको ऑपरेट कर रहा है तो आपने सही कहा कि जब स्टेट के इस लॉजिक से जो ह्यूमन बीइंग्स डेवलप होंगे अगर हम उसको कनेक्ट करें वो दो टाइप के होंगे एक [नाक से की जाने वाली आवाज़] जो हिंदू अपने बारे में जो इस तरह से सोच रहा है और एक वो मुसलमान जो हिंदू पर्सपेक्टिव से अपने आप को सोच रहा है। दोनों ही एक ऑपरेस्ड सब्जेक्ट आप क्रिएट कर रहे हैं और एक ऑपरेशर सब्जेक्ट आप क्रिएट कर रहे हैं। ये बात जाहिर होती है कि पोस्ट मॉडर्निज्म का वेपनाइजेशन हिंदुत्व फोर्सेस ने अपने मफाद के लिए या अपने नॉलेज प्रोडक्शन के लिए एक बहुत पर्टिकुलर तरीके से अलग-अलग मैनिफेस्टेशन में किया जाता है। चाहे वो जेएसआई दीपक की किताब हो, चाहे वो विक्रम संपत्ति की किताब हो, चाहे वो मूवमेंट के आइडियोलॉग हो। इन लोगों ने इवन कि डायस्पोरिक एकेडमिक्स भी इस चीज को एंटरटेन करते हैं कि कैसे डीकुलिनिटी बहुत जरूरी है। इसी चीज को मीरानंदा क्रिटिसाइज करती हैं अपनी किताब में जहां पे वो कहती हैं कि एक तरह की फ्रस्ट्रेटेड क्लास है एकेडमिशियंस की जो अपनी इंडीजीनिटी को एक्सप्लोर करने के लिए और सेलिब्रेट करने के लिए इस चीज का इस्तेमाल करती है कि हम अपने नैरेटिव को अपने ट्रेडिशनल साइंसेस को कैसे आगे बढ़ाएं। मगर वो इस चीज को नहीं समझते कि कैसे इस इंडीजिनिटी को आगे बढ़ाने से बाकी प्यूरल स्ट्रक्चर ऑफ नॉलेज पे क्या असर पड़ेगा। खैर इस बात पे हम जोर देंगे अब कि इस पोस्ट मॉडर्निज्म से जो एक क्लेम निकलता है कि हमारी नॉलेज प्रोडक्शन हमारा जो पूरे नॉलेज प्रोडक्शन का सिस्टम है और उसके जो चैनल्स हैं वो एब्सोल्यूट है वो हमारे क्लेम में हमारे विनिटी के क्लेम में हमारे टेरिटरी टेरिटोरिटी के क्लेम में पूरी तरह से फिक्स बैठते हैं। ये कैटेगरीज हैं बाइनरीज़ हैं। भले वो माइनॉरिटी को लेके हो या फॉरेनर को लेके हो वो एथोस चेंज हो जाता है। वो जमाना चेंज हो जाता है। मगर अभी भी वो बाइनरीज हैं फॉरेनर्स की और आज तक वो कैरी आउट होती है मुस्लिम्स की इमेज में। मगर मेरा सवाल फिर ये भी ये है कि एथनोनेशनिज्म के नजरिए से ये जो डिवाइन फॉर्म ऑफ पोस्ट मॉडर्निज्म है कि किस तरह से पोस्ट मॉडर्निज्म एक एब्सोल्यूट जो अपने आप में एक बहुत ही कंटेस्टिंग टर्म बनता है कि हम पोस्टमॉर्टनिज्म को किसी फिक्सेशन में नहीं ले जा सकते हैं। वो अपने आप में बाकी एकिस्टिंग नॉलेज सिस्टम्स को चैलेंज करता है। तो कैसे इस पोस्ट मॉडलिज्म को इंस्ट्रूमेंटलाइज करके एक एथनोनेशलिस्ट प्रोजेक्ट को जो न्यू हिंदुत्व अभी कर रहा है वो किस तरह से पॉसिबल बनाया जा रहा है और इसमें क्या अपेरेटस इस्तेमाल हो रहा है। तो जैसे कि आपने बोला के मॉडर्निज्म और डिनिटी जो मैं पेपर में लिख रहा था आप और मैं उसको रिव्यु भी कर रहे थे कि भ डिवाइन पोस्ट मॉडर्निटी कैसे पॉसिबल है? एक तरीके का कंट्राडिक्शन लगेगा। पोस्ट मॉडर्निज्म मटेरियलिज्म पे मबनी है और वहां से वो जो इंडीजीनस वर्ल्ड व्यूज को लाता है कि भ ठीक है गॉड का जो तसवुर है वो एब्स्ट्रैक्ट साइकोलॉजी में एज ए प्रॉब्लम सॉल्व हिस्टोरिकली निकल के आया। आपको समझ नहीं आ रहा था कि भाई यह तूफान क्यों आ रहा है? यह जो उनका मटेरियल जिसे कहते हैं एक्सप्लेनेशन है, जो पॉजिटिविस्ट क्लेम है, आपको नहीं समझ आ रहा था कि भाई मैं बीमार क्यों हो रहा हूं? आपको नहीं समझ आ रहा था कि पेड़ पे पत्ते क्यों उग रहे हैं? आसमान से बारिश क्यों हो रही है? लाइटनिंग क्यों हो रही है? सूरज क्यों जल रहा है? क्यों डूब रहा है? क्यों? तो आपने बोला कि भ ये सबको एक्सप्लेन करने के लिए आर्गुमेंट ऑफ द गैप प्रोड्यूस किया गया। अगर वो गैप ऐसे इमेजिन किया गया क्योंकि आपके यहां पे भी आईडिया ऑफ़ हीरो था इन द फॉर्म ऑफ़ कि भ ये वाला जो ट्राइबल लीडर है वो बहुत जबरदस्त था। उसने ये अचीव किया। तो उस हीरो के एब्स्ट्रैक्शन को और बीइंग का भी एक्स यू नो आपकी एब्स्ट्रैक्शन आ रहा है कि आप क्योंकि जिंदा हो और आप एक बीइंग हो और यह भी बीइंग्स हैं तो एक बीइंगनेस भी एक प्रॉपर्टी हो सकती है। तो पोस्ट हाइड साइड में जो रिकंस्ट्रक्शन हो रहा है कि क्यों इस तरह का आईडिया आ पाता कि जो इशारा कर रहा है डिविनिटी की तरफ वो इस वजह से आ पाया क्योंकि एब्स्ट्रैक्शन करने की जो कैपेसिटी है इंसान की उसने यू नो बीइंगनेस को उसने फॉर एग्जांपल गैप को उसके एक्सप्लेनेशन को तो एक ऐसा वो दे दिया वजूद कि भाई समथिंग एब्सोल्यूट जो वो दे रहा है लेकिन ये वो ये एक्सप्लेन नहीं करता कि ये सारी जो सरप्लस जिसे कहते हैं कि एक्सपीरियंसेस हैं पहली बात तो ये कॉन्शियसनेस की डिबेट में है कि भाई व्हाई कॉन्शियसनेस एट ऑल लोग बोलते हैं भाई हर कुछ कॉन्शियस है भाई एक्सटेंशन ऑफ लॉजिक व्हिच इज़ नॉट नॉट ऑब्जर्वेबल। दूसरा सवाल कि भाई आप इंफिनिटी, नथिंगनेस, परफेक्शन दीज़ आर नॉट प्रॉपर्टीज ऑफ मटेरियलिज्म। ये कहां से इनवोक हो रही हैं? यह भी आप एक्सप्लेन नहीं कर पा रहे हैं। आप यह भी एक्सप्लेन नहीं कर पा रहे हैं कि एड इनफिनिटम इन जो इनफिनिट लॉजिक में क्यों बीइंग एब्सोल्यूट हो या एब्सोल्यूट स्केल की जरूरत है। आप यह भी नहीं बता पा रहे हैं कि भाई रियलिटी डिस्क्रीट है या कंटीन्यूअस है। तो, यह जो पोस्ट मॉडर्निटी है, वह पोटेंशियल ह्यूमन बिलीव्स में मॉडर्निटी, पोस्ट मॉडर्निटी थीसिस, एंटीथिसिस सिंथेसिस वो इमटेरियलिटी को हटा के हालांकि वो आप इरेज़ नहीं कर पाए। उसने आपने मटेरियलिस्ट रिकंस्ट्रक्शन किया कि ये क्यों पॉसिबल है और जो इनकंप्लीट है लेकिन लोगों ने मान लिया। तो आपने पुट जो दो डिबेट्स हैं ऑब्जेक्टिविटी की और सब्जेक्टिविटी की। आपने सब्जेक्टिविटी को मेटाफिजिकली अपने लिमिट में ले जाके कि भ हर जर्रे में जो जैनिज्म का जो प्रिंसिपल है अनेकांतवाद कि भ आप हर जर्रे का जो पर्सपेक्टिव है वो इंफिनिटली डिफरेंट कॉन्टेक्स्ट में हो सकता है और वो जब आपको किसी एक का भी पूरा इनफिनिट वो पता लग गया तो आपको सारी नॉलेज पता लग जाएगी। तो उसको आप मटेरियलिज्म में आप उसको जिसे कहते हैं कि एब्स्ट्रक्शन के उरूज पर ले गए। लेकिन ये आइडिया ऑफ मल्टीपल ट्रुथ्स पोस्ट मॉडर्न 20थ सेंचुरी नो लेट 19 सेंचुरी 20थ सेंचुरी मूवमेंट है। वहां पे उसका कंसेप्चुअलाइजेशन हुआ। तो जब मोहन भागवत यह बोल रहे हैं कि हम विश्व गुरु हैं वो एक बहुत फाउंडेशनल क्लेम कर रहे हैं। वो यह बोल रहे हैं कि भ मल्टीप्लसिटी ऑफ एथिक्स हमारे यहां है। आप भी उसी की बात कर रहे हैं। मल्टीप्लीसिटी ऑफ एक्सपीरियंसेस हमारे यहां है। आप भी उसी की बात कर रहे हैं। एक पोस्ट मॉडर्न लिबरलिज्म हमारे यहां है। आप उसकी बात कर रहे हैं। तो अगर आइडिया को एपिस्टेमिक स्ट्रक्चर्स को समझने के लिए आपको कुछ बेसिक कांसेप्ट्स की जरूरत पड़े वो 10 हो सकते हैं, 50 हो सकते हैं। जैसे उसमें कि भाई ऑब्जेक्टिव है या सब्जेक्टिव है? क्या दुनिया मटेरियल है या मटेरियल है? क्या आपका जो कम्युनिकेशन है वजूद के बीच का वह परफेक्ट है या इमपरफेक्ट है? क्या जो दिमाग है वो अब बहुत सारी ऐसी चीजें हो सकती हैं जिससे आप यह मेटाफिजिक्स के बीच के डिफरेंसेस प्रोड्यूस करते हैं। तो जब आप देखा जाएगा अगर आप डिनिटी को हटा दें और हायरार्की की एक सर्टेन कैटेगरी को ले आए तो हिंदूइज़्म में पोस्ट मॉडर्निज्म का प्रिमर्जियल फॉर्म है मल्टी मल्टीप्लीसिटी ऑफ़ प्लूरलिज्म का एक पर्टिकुलर पर्सपेक्टिव से फ्रॉम बॉटम अप इस्लाम में भी है लेकिन वो उसको डिफरेंटली डील करता है कि भ अगर गॉड एक है तो उसका लॉ एक है उसका सिस्टम एक है। यहां पे क्या होता है कि उसके बावजूद मल्टीप्लसिटी है। यहां पे क्या होता है? नहीं नीच क्योंकि मल्टीप्लीसिटी है तो गॉड भी मल्टीपल हो सकते हैं। फिर उसमें अलग-अलग डिबेट्स हैं वहां पे क्योंकि आप कितना भी अपनी उसको ले आए लेकिन फिलॉसोफिकल टेंशंस रहती हैं ना। तो अद्वैतवाद एक फिलॉसोफिकल टेंशन ये लाएगा कि भ नहीं समझ तो आ नहीं रहा है। लग तो रहा है कि भाई कॉमनैलिटी है तो फिर हम ब्रह्मास्मि मैं ही ब्रह्मांड हूं। ब्रह्मांड एक है। बीच में माया है। माया की वजह से तो अलग-अलग फिर द्वैतवाद के नहीं दो सब्सटेंस हैं। दोनों अलग हैं। क्वालिटेटिवली भी और क्वांटिटेटिवली भी। फिर ये सब्सटेंस की डिबेट हो गई ना कि भ जो क्रिएटर है और क्रिएटेड है। पहली बात तो ये डिस्टिंशन है भी या नहीं। अगर है तो उसकी एसेंस में कॉमनैलिटी है या नहीं? और अगर कॉमनैलिटी है तो कितनी है? तो यह सेट्स थ्यरी का डिफरेंस है ना डिस्टिंशन है। तो जब आप पोस्ट मॉडर्निटी की बात करेंगे तो एब्सोल्यूट सब्जेक्टिविटी तो हिंदूइज़्म में एब्सोल्यूट तो नहीं है क्योंकि सब्जेक्टिव क्लेम्स की हरार्की है लेकिन क्लोज टू मल्टीप्लीसिटी है जभी मल्टीपल गॉड्स का तो उस ट्रेडिशन की रेंज में कुछ लोग आएंगे जो फिलोसोफिकल मोनिज्म की तरफ जाएंगे तो वो क्या करेंगे कि कहीं ना कहीं उसको यूनिफाई करने की कोशिश करेंगे एक डिफरेंट वे में जहां पे कास्ट क्लास के बैरियर्स को कोशिश की जाएगी कि भ कैसे अस्यूम किया जाए कैसे डिफरेंस है क्यों हटाया जाए इसीलिए आपकी जो भक्ति मूवमेंट्स हैं या फिर उसके आपके उसमें भी अलग-अलग इंटरप्रिटेशन हैं कि भाई कोई बोलेगा कृष्णा कॉन्शियसनेस में नहीं एब्सोल्यूट जो हायरार्की ऑफ़ गॉड्स है उसमें कृष्णा और कृष्णा में भी राधा रानी अवतार के मतलब जो मेल और फीमेल पर्स वो है एसेंस है जो दो में आके जिसने अपने आप को मैनिफेस्ट किया वर्ल्ड में जैसे क्रिश्चियनिटी में ट्रिनिटी तो यहां पे डुअलिटी और उसका कन्वर्जेंस एक में आके हो रहा है तो वो एब्सोल्यूट है जिसके विद इन दी हायरार्की ऑफ़ हिंदूइज़्म लाइक करती है। तो मटेरियलिज्म एब्सोल्यूट में जिस मल्टीप्लीसिटी को ले गई और हर बंदे का इंडिविजुअल के पर्सपेक्टिव को कहा कि भाई यह अपने आप में पर्टिकुलरली ट्रुथ पर्टिकुलर ट्रुथ है। उसकी एक पर्टिकुलर लिमिटेड हरारकी मल्टीप शेवाइट वैष्णवाइट वैष्णवाइट में मल्टीपल कि भाई 3 करोड़ भगवान तक की भी बात हुई तो अगर आप देखा जाए कि हर टाइप के आर्किटाइप ऑफ़ ह्यूमन का एक डिवाइन फॉर्म हो सकता है। इसीलिए आपको जो राम के भक्त होंगे वह आपको डिफरेंट लगेंगे। आपको शिव के जो भक्त होंगे वो आपको डिफरेंट लगेंगे। जो आपको हनुमान के भक्त होंगे। तो ये एक फीचर है हिंदूइज़्म का। एक बहुत इंटरेस्टिंग फीचर है उसकी फिलॉसफी का। तो देखा जाए तो पोस्ट मॉडर्निज्म का जो थराइजेशन बाद में हो रहा है वो पहले ही उस सब्जेक्टिविटी की मेटाफिजिक्स विदाउट गिविंग अप इमटेरियलिटी वो जो सबसे ज्यादा जिसे कह सकते हैं कि स्टेबल फॉर्मेशन हुई है वो हिंदूइज़्म में और पॉलिथिज्म में हुई है। इसीलिए वो पोस्टमॉर्टनिज्म का पूरी आईडिया नेचुरल है उसके लिए। मैं यही बोलता था कि डीलोनियलिटी और ये सारी चीजें डिवॉइड ऑफ एथिकल पर्सपेक्टिव डजंट मेक एनीथिंग। वो कोई क्लेम नहीं है और उस क्लेम को बहुत आसानी से वेपनाइज किया जा सकता है। यही है ना कि पोस्ट मॉडर्निटी अल्टीमेटली वर्चुलेस हो जाती है ना। मतलब कैटेगरीज का वेंटेज पॉइंट मैटर करता है। मैटर करता है। लेकिन जो हिंदुत्व ने किया हिंदुत्व ने उसको वो हिंदूइज़्म नहीं छोड़ा कि जहां पे ये मल्टीप्लेसिटीज हो सकती हैं। उसने एक पर्टिकुलर पिटिकल फिलॉसफी और एक पर्टिकुलर जिसे कहते हैं कास्ट हायरार्की उसको फ्यूज किया उस मल्टीप्लीसिटी में और उसको इंजीनियर किया और उससे फिर इस्तेमाल किया कि भ आप केरला में कुछ और क्लेम कर सकते हैं। कर्नाटका में कुछ और क्लेम कर सकते हैं। गुजरात में कुछ और क्लेम कर सकते हैं। आसाम में कुछ और क्लेम कर सकते हैं। आप दलित को भी अब्सॉर्ब कर सकते हैं ओबीसी को वाइल मेंटेनिंग दैट हायरार्की। तो एक तरीके का डिवाइन पोस्ट मॉडर्निज्म हो गया। और दूसरा आपने प्रिंसिपल लगाया जो सवरकर का है कि भ बाहर से जो भी आ रहा है वो। हालांकि आपकी जो मेटाफिजिक्स अलव करनी चाहिए भाई दुनिया से क्योंकि मल्टीपल क्लेम्स हो सकते हैं लेकिन आपने सेक्रेड ज्योग्राफी लगा दी। सेक्रेड जग्राफी से वह डिवाइन शील्ड बन गया कि भाई बाहर की जो मल्टीप्लेसिटी ऑफ प्रोडक्शन है वो एब्सोल्यूट पोस्ट मॉडर्निटी नहीं है। वो इस सेक्रेड ज्योग्राफी से के विदिन बाउंड जो प्रोडक्शन ऑफ मल्टीप्लीसिटी हो रहा है उसमें फिर एक पर्टिकुलर पॉलिटिकल कॉन्फ़िगरेशन उसको सामने रख दिया गया। तो वहां से एक ये आ गया कि बाहर से कोई भी अगर वर्ल्ड व्यू आ रहा है, वह भारत को तोड़ने का काम करेगा। तो एक शील्ड भी प्रोड्यूस हो गई। इंटरनल ऑपरेशन की जस्टिफिकेशन भी हो गई। उसकी हरारकी भी प्रोड्यूस हो गई। और बाहर से कुछ भी आएगा तो उसको एलियन भी बता दिया गया। जस्ट लाइक एज अ फॉरेनर हर फॉरेन आईडिया जो इस एब्सोल्यूट क्लेम को इस एब्सोल्यूट क्लेम जो टेरिटोरिटी को सपोर्ट करता है इसमें जो भी चीजें एंटर करेंगी उसको वो फॉरेन की तरह फॉरेन समझ के उसको वो उसको डिफेंड करेगा अपनी टेरिटोरियल लॉजिक को। तो अब सिर्फ जो अंदर मुसलमान अंदर कम या कोई भी हो सकता है तो वो हिंदू फर्स्ट होगा जभी तो हो ना आप सब हिंदू हो वो हिंदू फर्स्ट होगा और वहां से अगर वो अपने इस्लाम को रिकंस्ट्रक्ट कर रहा है तो लाइक एनी अदर गॉड तो क्या बोला मोहन भागवत ने आप तीन चीजें छोड़ दीजिए आप जिहाद छोड़ दीजिए आप उम्मा छोड़ दीजिए और आप ये छोड़ दीजिए कि आप ही वाहिद एक रास्ते हो तो ये तीन चीजें अगर आपकी हट गई तो एक तरह का जो फ्यू डायमेंशंस ऑफ अंडरस्टैंडिंग ऑफ इस्लाम नाम है वो आपने कट करके आपने उसका यूनिवर्सलिज्म खत्म कर दिया। आपने उसका जिहाद को तो लोग यह बस यह उस तरह रख देते हैं कि भ कि कोई यू नो वायलेंट वो हो रहा है। जिहाद का मतलब ये है कि भ इंटेलेक्चुअली भी आप अपने आप को ये सामने रख रहे हैं कि भ ये पोजीशन से ये पोजीशन बेहतर है। उसका ये रीज़न है। वो भी आपने कि भ आप अपने को एक्सेप्शन नहीं बना सकते। तो वो जो सरप्लस था जो डिग्रीज़ हैं उसकी आपने रिड्यूस करके उसमें भी बता दिया कि भ आप इतना ही सोच सकते हैं और टेरिटोरियलिटी को ऐसे सोचेंगे। ये सिविलाइजेशन प्रसीड कर सकती है हिंदू लॉजिक में नेशन को लेकिन इस्लाम या दूसरी चीजें चाहे वो कम्युनिज्म हो कैपिटलिज्म होकर कुछ भी हो अल्टीमेटली वो सब इस्तेमाल हो रहा है जहां पे हिस्ट्री जो है वो एक एंटाइटलमेंट ऑफर कर रही है तो जहां पे मुसलमानों की मजबूरी है कि वो बाउंडेड हैं बहुत से आप शराब अलऊ नहीं कर सकते तो एक जगह तो बीफ अलाउ किया जा रहा है खाए हुए हैं ब्राह्मण भी खा रहा है दूसरी जगह ब्रीफ आपकी ये कितना स्टार्क डिफरेंट है कि एक जगह ब्राह्मण खूब नॉनवेज खा रहे हैं। दूसरी जगह पे उसकी जो वैल्यू है कि भाई आप धर्म आपका भ्रष्ट हो गया। कम्युनिज्म में आप जब क्लास के स्ट्रक्चर को छोड़ देंगे तो आप कम्युनिस्ट नहीं बचे। लिबरलिज्म में अगर आप ये छोड़ देंगे कि भाई दूसरे का ओपिनियन अलाउ और उसको भी मैनिफेस्ट होने की वजह से तो आप लिबरल नहीं बचे। अगर आप इस्लाम में तौहीद को छोड़ देंगे तो तो यह सारे बाउंड्स जो पॉकेट्स ऑफ यू नो मल्टीपल जो रिलीजियस एक्सरसाइज थी और उनके बीच में बहुत वीक कॉमनल्ट थ्रेड था उसको एक तरह की वननेस ऑफ पॉलिटिकल थ्योरी एंड वननेस ऑफ नेशन जो नेचुरली फिट नहीं होता सनातन में तो हिंदुत्व एक तरीके से सनातन है भी कुछ प्रिंसिपल्स में लेकिन उससे बहुत डिफरेंट भी है तो हिंदुत्व तो हिंदूइज़्म है भी सबकैटिन में नहीं भी है। तो ये वननेस का जो परसेप्शन है हिंदुत्व को लेके ये एग्जैक्टली वैसे ही मिलता है देखने को जैसे नाज़ जर्मनी में जो एक वननेस की बहुत अपील थी कि एक ही रूलर होगा एक ही फादर लैंड होंगे। दे हैड देयर ओन आईडिया ऑफ़ थाउजेंड ईयर राइट वगैरह-वगैरह। तो खैर इस तरह से एग्जांपल से अगर हम इसको एक बार और मुसलमानों में भी है ऐसा नहीं है। मतलब जो वननेस का जो जिसे कहते हैं कि वो लेकिन वहां पे वननेस को अस्यूम करके फिर मल्टीप्लीसिटी को एंगेज किया गया। मान लीजिए फॉर एग्जांपल यहां पे कहीं पे भी जो नेशन स्टेट में कॉन्स्टिट्यूशनल डेमोक्रेसी में जैसे कई बार अगर पूछा जाए कि भ स्टेट की फॉर्मेशन में डिफरेंस क्या है? डिफरेंस यह है कि भ एंपायर सिस्टम्स में लॉ मल्टीमोडल था। अब कोर्ट्स में भी हो रहा है लेकिन काजी भी कर रहा है। यहां पे भी है। ऐसा नहीं है कि भ आर्बिट्रेशन और वह हो सकती है। लेकिन उसकी लिमिट्स लिमिटेशंस जितना ज्यादा आप उसको सिकुड़ सकते थे। तो नेशन स्टेट में जो एजेंसी ऑफ हर नेशन स्टेट में नहीं मतलब जैसे उसमें जो टोटिटेरियन प्रोजेक्ट स्पेशली हैं जिसमें पोटेंशियल ऑफ एजेंसीज ऑफ डिफरेंट कम्युनिटीज जो हो सकती थी उनको उनके एब्सोल्यूट मिनिमम आगामन जैसे कहते हैं ना बेयर मिनिमम पे आप ला रहे हैं तो वो बेयर लाइफ की तरफ आप ले जाने की कोशिश कर रहे हैं तो उसमें फिर जो ये हिटलर का प्रोजेक्ट है या जाइनिज्म है या फिर जो न्यू हिंदुत्व और हिंदुत्व बेसिकली न्यू हिंदुत्व उसका सिविलाइजेशनल फॉर्म है तो जाइनिस्ट स्टेट, हिंदुत्व स्टेट और नादजी स्टेट एज अ स्टेट नादजी भी अगर नॉन स्टेट एक्टर की तरह वो वो सेम चीज प्रोड्यूस नहीं कर सकता। तो जो एब्सोल्यूट पावर हो रही है वो स्टेट से आ रही है। चाहे वो पितृभूमि हो या दशलैंड हो वो एक ही आईडिया के तरफ आगे बढ़ रही हैं। मगर एक इस इस एग्जांपल को एक बार और नेशन स्टेट के लेंस से देखते हैं। जहां पे हमें देखने को मिलता है कि इंडिया जो है वो किसी भी तरह के सिविलाइजेशन क्लेम को करने में पीछे नहीं है। इवन दो कि लाइक व्हेन दे इनोगेटेड द न्यू पार्लियामेंट वहां पे मैप्स थे। तो उसमें फिर बहुत सारे इंडियन नेबर्स नेबरिंग कंट्रीज ने इस पे क्वेश्चन उठाया कि जो मैप है वो थोड़ा ऑब्जेक्शनेबल है क्योंकि वो जो इमेजिनेशन है अखंड भारत का वो बिल्कुल अपोजिट है जिस तरह से नेबरिंग कंट्रीज उसको देखती हैं। बट एट द सेम टाइम चाइनीज़ स्टेट से भी इंडिया का एक टसल है जो परपेचुअली चलता है। तो चाइना सिंस इट इज आल्सो अ सिविलाइजेशन स्टेट और हिंदुस्तान में चाइना का भी वैसे एक विज़ है इसी तरह का एक्सक्ट्ली चाहे ना तो वो सिविलाइजेशन स्टेट का लॉजिक जो चाइनीस अपनी तरफ अपनी तरफ से आगे बढ़ाते हैं कि हम भी एक सिविलाइजेशन स्टेट है एंड दे हैड देयर ओन लीनियज और एक तरफ जो सिविलाइजेशन क्लेम है जो न्यू हिंदुत्व आगे बढ़ाता है। सो, देयर इज़ अ टसल एंड व्हाई मतलब मेरा सवाल यही आता है कि नेबरिंग कंट्रीज़ में इस चीज़ को इस्टैब्लिश करने के लिए कि हम तुम्हारी टेरिटोरियलिटी को चैलेंज कर सकते हैं। बट तुम हमारी टेरिटोरियल एस्पिरेशन को चैलेंज नहीं कर सकते। और सेम आप देखेंगे इजराइल में जो नेबरिंग उस अपने नेबरिंग कंट्री के साथ यही क्लेम करती है कि हमारा क्लेम है यहां पे जो पूरा एंटायर ग्रेट ग्रेटर इजराइल का प्रोजेक्ट है। बेसिकली मेरा वही आईडिया है ग्रेटर इजराइल और अखंड भारत कहीं ना कहीं एग्जांपल कन्वर्ज हो रहा है। तो जो चाइनीस इसमें चाइनीस स्टेट का जो क्लेम है उसमें इंडिया कैसे अपने को नेविगेट करता है? असल में अगेन फिर जैसे इस्लामिक स्पेन एंड लुलूशिया या यूरोप के वो इलाके जो कभी खिलाफत के अंडर थे। मैं भी जब मुस्लिम पडकास्ट सुनता हूं तो यह यह खिलाफत के रीजंस हैं। ग्रेटर इजराइल का जो प्रोजेक्ट है कि भ जो मैक्सिमम टेरिटोरियल रीजंस जो बिबिकल नैरेटिव में रहे हैं या कंट्रोल में रहे हैं। भारतवर्ष का भी जो कांसेप्ट है कि भ जो हिस्टोरिकल क्लेम है या चाइना का भी होता यह है कि भ दुनिया में हमेशा टेरिटोरियल एक्सपेंशन रहा है। तो कोई भी सिविलाइजेशनल क्लेम अपने मैक्सिमम को क्लेम करता है। अपने मिनिमम को नहीं। मिनिमम क्लेम तो मदीना हो जाएगा। फिर मक्का हो जाएगा अल्लाह के रसूल के बाद। उसके बाद फिर आपका एक वो है। अब ये सही गलत नहीं मैं बोल रहा हूं। क्लेम हो सकता है आप जहां पे इस वक्त जहां मुसलमान हैं। अब मान लीजिए फॉर एग्जांपल एंजुलशन में स्पेन में मुसलमान नहीं है। आपका क्या क्लेम रह गया? कोई मटेरियल क्लेम नहीं रहा। ना ये बोल सकते हैं कि भ यहां पे ये मस्जिद आपने बंद कर दी। इसको खुलवा दीजिए। मस्जिद में भी अगर कोई नमाज चलिए इसको एक म्यूजियम की तरह कर दीजिए। यहां पर कुछ मुसलमान अब रह गए उनको स्पेस दीजिए क्योंकि वहां पर जो रह भी गए हैं उनको भी खत्म किया जा रहा है। यह एक अलग चीज हो गई। तो जो भारतवर्ष का जो कांसेप्ट है वो जो मैक्सिमम उसमें तो फिर आप इंडोनेशिया तक भी पहुंचे उधर तक भी पहुंचे। इवन मलेशिया में भी आपका वो किंगडम रहा है। बहुत मैप्स में वहां तक भी जाता है। लेकिन इन्होंने फिर कहा कि भ इतना लंबा बखेड़ा क्रिएट करेंगे तो थोड़ा वो कर दिया। यही तो ऐसी चीज है ना कि भ जो ओवरलैप में इजराइल और इनके बीच में नहीं आ रहा है। चाइना के साथ आपका चाइना का अपना विज़न है कि भ मैं मैक्सिमम कितना रहूं। समझ रहे हैं? तो यह जो चैलेंज है यह सिर्फ हिंदुत्व का नहीं है। जो भी क्लेम अल्लाह के रसूल का एग्जांपल लेते हैं सल्सम का कि उनकी डेमोग्राफी उनके मूवमेंट के साथ चेंज हो रही है। और बाद में भी जैसे होता है कि भ मूवमेंट के बाद कब जैसे हुआ कि भ एक टाइम के बाद कि भ इस्लामिक एंपायर्स जो हैं वो क्वेस्ट बिकम द ओनली वो। अब आप इसमें यह नहीं कह सकते हो गया हो गया पास्ट में उसके बाद वहां लोग हो गए हो गए अब यह दो अलग चीज है बट अगर आप कॉन्क्वेस्ट एज एन इंस्ट्रूमेंट वह देखें और शुरुआत का जो कॉन्क्वेस्ट हो रहा है वो क्यों हो रहा है वो एकदम से जो ट्राइबल कॉन्फ़िगरेशंस बिल्कुल चेंज हो गए वो अनस्टेबल हैं एक स्टेबिलिटी की जरूरत है या तो दो लॉजिक अलग हैं तो टेंशन तो रहेगी इस वजह से क्योंकि अलग-अलग जमाने में अलग-अलग वक्त में एक्सपेंशनिस्ट रूलर्स रहे हैं चिंगस खान मंगोल ोलिया से पूरा है। पूरा फैल गया तो एक मंगोलियन क्लेम भी हो जाएगा। जबजब जो जो डायनेस्टी आई सफिट डायनेस्टी है आपकी सऊदी की अपनी एक डायनेस्टिकल क्लेम है। आपका टर्की का अपना एक डनेस्टिक क्लेम है। आपका ये रोमन एंपायर का अपना एक डनेस्टिक क्लेम है। आपका यू नो यहां पे जापानीज़ इंपीरलिज्म का अपना डनेस्टिक क्लेम है। तो हिस्ट्री में तब्दीलियां आती रही हैं और उसमें चेंजेस होते रहे। अगर वो डनेस्टिक क्लेम को आप एब्सोल्यूटाइज कर देंगे विदाउट द पीपल बीइंग देयर तो देन उसमें आपकी टेंशंस होनी ही होनी है और वो सिर्फ एक जगह से नहीं हो रहा। मतलब आप यह नहीं कह सकते भाई सिर्फ इंडिया कर रहा है वो कर रहा है। चाइना, इंडिया, रशिया, ईरान, इजराइल, इवन सऊदी, यूएई ये स्टेबल कॉन्फ़िगरेशंस हैं उन क्लेम के और उसमें कुछ बड़े क्लेम हैं। उनमें फिर ऐसा भी है कि भाई यूएस वगैरह कह रहे हैं कि भाई क्योंकि वह तो खुद इंपीरलिज्म यूरोपियंस ने जाकर उस इलाके में किया। अब वो वहां का क्या क्लेम? वहां तो पहले ही उन्होंने सारा खा गए हैं। अब वो भी इंपीरियलिस्ट क्लेम करना चाहते हैं। तो उन्होंने सुपरस्ट्रक्चर्स बनाए आईएमएफ दूसरा क्योंकि वो क्लेम नहीं कर सकते। इसलिए नहीं कर सकते क्योंकि उन्होंने अपनी ओरिजिन स्टोरी यूरोप से हट के दूसरी बनाने की कोशिश करी। तो उसकी मेथोडोलॉजी बदल जाएगी कि भाई आप उस रूल को लेने के लिए आप टेररिज्म बताएंगे दूसरी चीजें बताएंगे तो उसको आप ये समझिए कि भ वो इवन विद इन इंडिया कौन रूल करता है वो श्रिंक और एक्सपैंड होगा और इनके अंडर जब एक्सपैंड होगा तो हमेशा वो इनस्टेबिलिटी टेरिटोरियल भी लाएगा और चाइना के अंदर वो एंबिशन है ही आई मीन चाइना इज़ प्रॉब्लमैटिक हम उसको बस देखते हैं कि भ क्योंकि इंडिया में मुसलमान ों को मारा जा रहा है और फिर तो चाइना से हो रहा है। नहीं चाइना में विघर्स के साथ देखिए आप क्या हो रहा है याहान चाइना की जो एथेनिसिटी है उसमें कम्युनिज्म को इस्तेमाल करके बाकी रिलीजियस एक्सप्रेशनंस को इंक्लूडिंग बुद्धिज्म को कैसे सबज्जुगेट किया गया वहां पे एनफोर्स्ड मटेरियलिस्ट आइडेंटिटी है इमटेरियल नहीं है जो जो एक्चुअल मॉडर्न स्टेट है तो चाइना रशिया यू हैव टू इवैलुएट देम ऑन द लेवल ऑफ़ जस्टिस ऑन द सेम ग्राउंड दे हैव दिस जो पूरा आईडिया है कि चाइना और रशिया अपने आप में एक सिविलाइजेशन स्टेट खुद रश ऑपरेट करते हैं। एक्सैक्टली इंडिया के वो कॉन्फ़िगरेशन में फिट नहीं बैठता। एंड इजराइल फिट्स वेरी वेल बिकॉज़ दे हैव देयर क्योंकि रशिया का ईरान से कॉम्बिनेशन है। फिर रशिया चाइना के साथ फेवरेबल है। चाइना क्या है यहां पे सेट कर रहा है। उसका आपके साथ टेंशन है। पाकिस्तान चाइना से फायदा उठा रहा है। चाइना इंडिया के साथ होगा तो पाकिस्तान के साथ नॉर्मलाइजेशन करना पड़ेगा। नहीं करना पाकिस्तान भी ये कभी नहीं चाहेगा। इंडिया भी यह कभी नहीं चाहेगा। दोनों के इंटरेस्ट नहीं है। तो फिर आप कई बार क्या होता है कि जो आपने शुरू में कुछ देर पहले बोला था कि जो जिओपॉलिटिक्स और इंटरनेशनल अफेयर्स होते हैं क्यों ओनली इजराइल इंडिया की ये कोई चॉइस नहीं है। ये फेटलिज्म है हिंदुत्व का जो न्यू हिंदुत्व एज अ सिविलाइजेशन स्टेट है उसकी जो इंटरनेशनल पॉलिसी है वो चॉइस नहीं है। हालांकि वो लूज़ कर रहा है इन द छाबहार फोर्ट का जो आप पोर्ट है या आपकी इंडोपर्शियन जो लेगसी आप खुद पर्शिया और सेंट्रल स्टेपीज से आए हुए हैं। आपके जो रूलिंग कास्ट्स और क्लास हैं। डीएनए तो यही बता रहा है ना आप कुछ भी बोले। उस पे फिर जय साईं दीपक बोलते हैं क्योंकि वो फंस गए यहां पे कि कहीं से भी आए हो आप इससे परेशान मत होइए। यहां पे आके आपकी इंडीजनस वर्ल्ड व्यूज एस्टैब्लिश हुए हैं। यहां बदल गए। सेकंड लैंड से पहले आप वहां से जो लॉजिक्स लेकर आए हैं स्टोरीज इसीलिए तो आपके यहां पे व्यवस्थावा मनु है और वहां पे नूह की कश्ती है। क्यों कॉमनैलिटी आ रही है? या तो ये होता कि भाई जो आउट माइग्रेशन थ्योरी थी कि आप यहां से बाहर गए। नहीं आप वहां से स्टोरी लेकर आ रहे हो। तो बड़ा क्लेम यह है कि एथोस को मैनपुलेट करने के लिए मेथोस को रिकॉन्फिगर किया जा रहा है। और इसमें तरह खुद फंस रहे हैं। पहले यह ब्रिटिशर्स के अंडर फंसे कि भ आर्यन माइग्रेशन थ्योरी साबित हो रही है। हम बाहर से आए तो बहुत लोग खुश हो गए। फिर सावरकर ववरकर ने जब बनाया कि भाई कैसे हम इसको काटे हिस्से को तो एंजाइटटी प्रोड्यूस हो गई तो अपने आपको क्योंकि पहले क्या था ना कॉलन आपको ये लग रहा था कि भ संस्कृत कॉमन लैंग्वेज है ये तो जिसे कहते हैं यूरोपियन संस्कृत लैंग्वेज का एक जिसे कहते हैं हिस्टोरिकल सुपरस्ट्रक्चर है तो अब यूरोपियन इंपीरियलिज्म से तो आर्यन रेस और हम ऊंचे तो इनको भी लग रहा था भाई हम भी आर्यन है एक जमाने तक इन्होंने खूब एंजॉय किया उस जमाने में इसको बाद में इनको को लगा कि भ यार ये इंडीजिनिटी चाहिए। आपको नेशन स्टेट बनने वाला है। आपका लॉजिक कंटेंड होना चाहिए। आपने अपने फ्रेमवर्क बदल दिया। तो इनसे ज्यादा जो डिवाइन पोस्ट मॉडर्निज्म का जो कांसेप्ट है वो एक तो डिवाइन पोस्टमॉर्टनिज्म है। एक है कि उसका ये कॉन्फ़िगरेशन पर्टिकुलर कॉन्फ़िगरेशन जैसे पॉलिटिकल इस्लाम बोलते हैं हो गया। इस्लामिक पॉलिटिकल थॉट बोलते हैं। पॉलिटिकल इस्लाम तो वर्ड इस्तेमाल करते हैं वेस्टर्न एकेडमिया में जो ओरिएंटलिस्ट व्यू है। लेकिन फॉर अ सेकंड लोग उसको उस पर्सेक्टिव से देखते हैं। तो कॉन्फ़िगरेशंस हैं। डिफरेंट कॉन्फ़िगरेशन है एक लार्जर तौहीदिक पैराडाइम की। इसी तरह एक लार्जर जो आपका पॉलिथीस्टिक पैराडाइम है उसके विदिन एक कॉन्फ़िगरेशन जो टोटलिटेरियन है लोग बोलते हैं ना कि भ हां पॉलिथीज्म एज एन एपिस्टेमिक वर्ल्ड व्यू तौहीद उसके खिलाफ होता है एज अ दावत लेकिन वही प्रॉफेट सल्ला वसल्लम पॉलिथीज्म के साथ पॉलिथीस्ट्स के साथ प्रोटेक्टिव एंगेजमेंट भी करते हैं और दूसरी तरफ लड़ाई भी होती है जिसको ये लोग वेपनाइज करते हैं कि मारो नहीं वो एक बहुत कॉन्टक्सुअल स्टेटमेंट है। तो वो जिन पॉलिथीस्ट के साथ लड़ाई है वो वो टोटलिटेरियन पॉलिथीस्ट हैं। ऐसी लड़ाई तो वहां पे लोकल हिपोक्रेट्स के साथ भी है। जो मस्जिद जो जो एक मस्जिद तोड़ी गई वहां पे अल्लाह के रसूल के टाइम पे क्योंकि वो अड्डा बन गया था हिपोक्रेसी का और एंटी उसका वो तो क्लेम नहीं कर रहे थे ना वो कुछ और हैं। तो मैं उसको थोड़ा सिंपलीफाई करके बोल रहा हूं। इसके अंदर नोस है। लेकिन मैं एक सिंपलिस्टिक वर्जन बोल रहा हूं कि भ विद इन डिफरेंट मेटाफिजिक्स डिफरेंट सोशियोलॉजिकल, पॉलिटिकल, थियोलॉजिकल कॉन्फ़िगरेशंस होते हैं और इन द मेटाफिजिक्स ऑफ़ पॉलिथिज्म व्हिच इज़ अ काइंड ऑफ़ अ डिफाइन पोस्ट मॉडर्निटी उसके विदिन जो टोटलिटेरियन प्रोजेक्ट है जो एब्सोल्यूट क्लेम्स करता है और कंट्राडिक्शंस प्रोड्यूस करता है। हर फिलॉसफी के बहुत सारे जो जो एब्स्ट्रैक्ट फिलॉसफीज़ होती हैं जो अपनी लिमिट्स पे ले जाती हैं चीजों को विदाउट तो इस्लाम एब्सोल्यूट तौहीद उस वे में नहीं है कि मतलब एब्सोल्यूट तौहीद तो है लेकिन वो ऐसी नहीं है कि आप इमटेरियल मीटर और मल्टीप्लीसिटी को डिॉल्व करके कर रहे हो। तो ये जो टलिटेरियन प्रोजेक्ट बिटवीन विद इन दी पॉलिथीज्म है ये एक पर्टिकुलर कॉन्फ़िगरेशन है और वो कॉन्फ़िगरेशन जो है वो अप्रेसिव है। जैसे कि हमारे डिस्कशनंस में हमने कई सारी थीम्स पे डिस्कशन कर लिया है अह कि कैसे ग्लोबल ऑर्डर या कैसे एक मेटाफिजिकल फिलॉसफिकल क्लेम हिंदुत्व इस्टैब्लिश करता है थ्रू वेरियस चैनल्स। अब इस डिस्कशन को थोड़ा विद इन द कंट्रीज बाउंड ले आते हैं। जहां पर हम लोग मासेस के क्वेश्चंस से एक्सप्लोर करेंगे कि कैसे ये कंडीशन निंदुत्व क्रिएट कर रहा है। एक बड़ा हिस्सा मार्क्सिस्ट हिस्टोग्राफिक का रहा है जो कि एक क्रिटिकल भी है अपने आप में। मगर एक तरह से मटेरियलिटी को ये लोग बहुत सेंटर रखते हैं कि हम मटेरियल क्लेम से ये समझ सकते हैं। सोसाइटी के कॉन्फ़िगरेशन से ये समझ सकते हैं कि कैसे एक नेशन स्टेट या जो एक क्लेम है कि कैपिटलिज्म को नेशन स्टेट की जरूरत पड़ती है। उस तरह से मार्क्स हिस्टोग्राफी ने मटेरियलिज्म को बहुत हद तक सेंटर में रख के अपना डिस्कोर्स बनाया है। मगर मुझे लगता है कि इसकी अपनी एक लिमिटेशंस है। मगर साथ-साथ इसमें एक सलाहियत भी है कि मटेरियलिटी के बिना कोई भी बड़ा पॉलिटिकल प्रोजेक्ट बिना मटेरियल वेल बीइंग के बिना काम नहीं कर सकता। जस्ट लाइक कोई स्टेट की लैंड एक मटेरियल क्लेम के लिए बहुत फिट बैठती है। तो एक इकोनमिक पर्सेक्टिव भी फॉलो करता है। अब इसी कॉन्टेक्स्ट में इस सवाल को मैं रखना चाहूंगा कि किस तरह से अह आप इकोनॉमिक कॉन्फ़िगरेशन को कितना जिम्मेदार मानते हैं इस न्यू हिंदुत्व के फ्लोरिशिंग को। ये आईडियोलॉजी सिर्फ एक पॉलिटिकल प्रोजेक्ट के तहत नहीं काम कर सकती। यू हैव टू हैव लाइक अ लॉट ऑफ़ अ फाइनेंस टू सपोर्ट दिस। लाइक यू हैव टू क्रिएट अ एंटायर न्यू लेबर फोर्स। यू हैव टू क्रिएट एन एंटायर कॉन्फ़िगरेशन जहां पे तरह-तरह के एंप्लॉयमेंट्स या तरह-तरह की जॉब्स को एक तरह से यूज़ किया जा सके ताकि स्टेट का एक बड़ा गोल अचीव हो। जो लास्ट हमने बात करी कि पॉलिथीज्म की डिफरेंट पोटेंशियलिटीज हैं। उनमें से एक पोटेंशियलिटी सबसेट हिंदूइज़्म है और उसका एक सबसेट हिंदुत्व है। मतलब अगर आप और जगहों पे पॉलिथीज्म देखेंगे हो सकता है कि वहां पे आपको कास्ट ना दिखे। हो सकता है। अब मैं एक हाइपोथेटिकल वो बोल रहा हूं कि उसमें वी शुड यू नो ट्राई टू स्टडी इट। क्योंकि वो मल्टीप्लीसिटी ऑफ गॉड्स में छोटे-छोटे पॉकेट्स में है। वह इतना ज्यादा इंटरेक्ट नहीं हुई थी कि भाई उसको हरार्की प्रोड्यूस करनी पड़े। जैसे यहां पे आपको पेरियार बोलते हैं भाई ट्राइबल गॉड्स और फिर जो वैदिक गॉड्स हैं फिर उनकी हायरार्की फिर उसमें वो एक पूरा सुपरस्ट्रक्चर डेवलप होता है। तो इन इट्स प्रिमिटिव फॉर्म पॉलिसीज्म कैन पोटेंशियली फंक्शन विदाउट ए हायरार्की। फिर वह एक सर्टन जब हो सकता है कि किसी की एक ट्रेजजेक्टरी हो पोलिथिज्म की एक दूसरी ट्रेजजेक्टरी है कि जहां पर वह है हरार्की क्योंकि कोई एक क्लास ऑफ़ पीपल एंड कास्ट ऑफ़ पीपल थिंक और दे एंड अप प्रोड्यूसिंग कंट्रोल और उस कंट्रोल में देन दे डेवलप एन ऑंटोलॉजी वो ऑंटोलॉजी में कि भ आपको मैं रूल इसलिए कर रहा हूं क्योंकि मेरा डिवाइन राइट है और मेरा डिवाइन राइट इसलिए है क्योंकि मेरा बाय बर्थ एक प्रिविलेज है तो उससे एक वर्ण सिस्टम का उस वर्ण सिस्टम के भी पर्टिकुलर कॉन्फ़िगरेशंस हो सकते हैं 20थ सेंचुरी में उससे पहले बाद में उससे पहले भी भक्ति मूवमेंट में भी कृष्णा का जो गीता में कॉन्फ़िगरेशन है कि भाई जो वर्ण है वो कर्म के आधार पे है धर्म वो जन्म के आधार पे नहीं है कि मतलब यू आर नॉट बोर्न हायरार्किकली यू डेवलप कैरेक्टरिस्टिक्स बेस्ड ऑन योर वर्चू दैट लीड टू यू बी आइडेंटिफाइड एज अ सर्टन वर्ण भ्रमणिक िकल क्वालिटीज हैं। आपकी क्षत्रिय की क्वालिटीज है। जैसे आज की डेट में आप एक एक इंजीनियर हैं। एक वो है तो कास्ट का फिर वो कि भ एक नहीं अब ये जिसे कहते हैं जीनोलॉजिकल है, एथेनिक है, यह बाय बर्थ है। उसमें फिर क्या होता है कि भ उस बाय बर्थ में अब आपका क्या है कि आपकी बाउंड्रीज एब्सोल्यूट होती चली जा रही हैं। आप हालांकि आप पॉलिथीज्म ऑफ मल्टीप्लीसिटीज और पोटेंशियलिटीज जा रहे हैं। लेकिन हर डायमेंशन में आप एक-एक बॉक्स लगाते जा रहे हैं। तो उसमें पर्टिकुलर कैसे आप हिंदुत्व की तरफ जा रहे हैं और उसमें भी हिंदूज़्म में भी वाइडर वह है फिर उसका सबसेट फिर उसका सबसेट फिर उसका सबसेट तो फिर उस सबसेट में फिर आप ये बोल रहे हैं कि नहीं वो वाला हिंदूइज़्म जिस हिंदूइज़्म में ऐसी पर्टिकुलर हायरार्की है जिसमें प्रोफेशंस रेिफाइड हो गए हैं मार्क्सिस्ट अगर वोकैबरी यूज़ करें कि मतलब फिक्स्ड हो गए हैं एंजोगमी है आप यू नो बाहर शादी नहीं कर सकते वो तो अब उसमें क्लास कॉमोनेंट्स में फिक्स हो गई है कास्ट के कंपोनेंट्स में। वह उसमें क्लास के बीच में मूवमेंट नहीं हो सकता। मतलब मसला नहीं है कि भाई आप रिच आज कल पुअर थे। अब आप रिच हो गए और आपने अपने को क्लेम कर लिया कि भ आप हालांकि वेस्ट में भी उसका फिर पूरा एक अलग हिस्ट्री है कि क्लास को भी फिर आप ब्लू ब्लड और ये और वो बट हम एक फिलोसोफिकल लेवल पर बात कर रहे हैं। फिर आपने बोला कि अच्छा यह जो कॉन्फ़िगरेशन है वर्ण का जो जो मनुस्मृति में फॉर एग्जांपल एक तरीके से लोग बोलते हैं है और उसका एक सर्टेन कॉन्फ़िगरेशन है तो उसमें फिर ब्राह्मण है जो नॉलेज प्रोडक्शन की हैजमनी है। उसमें क्षत्रिय है जिसकी फिजिकल मिलिटरलिज्म और इस तरह की चीजों में है। वैश्या है जिसमें मर्केंटाइल कास्ट भी आते हैं कि जिसकी प्रोफेशंस में और ट्रेड में और इस चीज में है। शूद्रा है जो लेबर क्लास है। तो आप बाय बर्थ आपकी जो कॉन्फ़िगरेशन अब एक सेट हो रही है। इसमें भी कंपटेंट व्यूज हैं। जिसकी वजह से कि बहुत सारे मूवमेंट्स हो रहे हैं जो एंटी कास्ट मूवमेंट विद इन हिंदूइज़्म भी है। आप अंबेडकर को हटा दीजिए। आप किसी चीज को कंप्लीटली यू नो फ्लैटन नहीं कर सकते हिस्ट्री को। उसमें फिर यह है कि भाई जो एक मॉडर्न नेशन स्टेट में जो कैपिटलिस्ट सोसाइटी है कैपिटलिज्म किसी एक चीज को प्रिविलेज करता है वो इकोनॉमिक्स के एक पर्टिकुलर कॉन्फ़िगरेशन को इकोनॉमिक्स में भी कॉन्फ़िगरेशन है ना कि आपका डिस्ट्रीब्यूशन रिस्ट्रीब्यूशन कैसे होगा? आपकी वेल्थ कैसे जनरेट हो रही है? तो वहां पर एक तरफ तो कास्ट है कि भाई यही कास्ट के लोग जो हैं वह धंधा कर सकते हैं। तो यह प्रिविलेज तो आपको इस सोसाइटी में एक रेफाइड स्ट्रक्चर से आ गया। उनके टेक्स्ट में इंप्लस है। इंप्लसिट है। एक्सप्लसिट भी है बहुत जगहों पे। मतलब आप जितना पीछे जाएंगे उतना आपको वो वेरिएबिलिटी थोड़ी मिलेगी। लेकिन वर्ण का आपको कांसेप्ट मिलेगा। लेकिन उस वर्ण को फिर लोग इंटरप्रिट करेंगे कि नहीं वो एक कंप्लीटली फिक्स्ड नहीं है। उसके अंदर एक वेरिएबिलिटी है। तो उसका रेफिकेशन ओवर द पीरियड ऑफ टाइम और सॉलिड होता चला जाता है और सॉलिड होता चला जाता है। हिंदुत्व जो है एक पर्टिकुलर ट्रिटेरियन प्रोजेक्ट में हर टाइप ऑफ ऑपरेशन का एक सबसे सॉलिडिफाइड फॉर्म है। तो उसमें अब कैपिटलिज्म है जो प्रिविलेज करता है मर्केंटाइल इकोनमी को तो उसमें अगर कोई एक प्रिविलज्ड एथेनिसिटी हो एथनिसिटी ना बोले उसको एक प्रिविलेज्ड जिसे कहते हैं क्या बोलेंगे कास्ट ही बोल रहे हैं हम कि एक एक सेट ऑफ पीपल हो वो सेट ऑफ पीपल ही हैं जो सोशल कैपिटल है जिनके पास बिजनेस करने का और उन्हीं को अलऊ किया जाएगा ऐसे स्ट्रक्चर्स बनाए जाएंगे जभी आपको अंबानी अडानी दूसरे लोगों को ना आपको ज्यादातर ब्राह्मण आपको मिलेंगे नॉलेज सिस्टम्स में आपको ज्यादातर बनिए मिलेंगे और मारवाड़ी मिलेंगे और जैन मिलेंगे मर्केंटाइल उसमें आपको क्षत्रिय बहुत ज्यादा इंटरेस्टेड होंगे कि भाई जाट और ये भाई हमें अपने आप को तो मिलिट्री और उसमें लाना है और ये सारी चीजें वेदर इन सब्सटेंस और इट इज़ स्टिल इंटैक्ट और एब्सोल्यूट ना देखी जाए हर कैटेगरीज को। आप यह देखते हैं कि कितनी स्ट्रांग है कैटेगरीज। बहुत सारे मणि हैं जो आपको प्रोफेसर्स मिलेंगे। बहुत सारे ब्राह्मण हैं जो आपको बहुत गरीब मिलेंगे। बहुत सारे दलित हैं जो आपको ब्यूरोक्रेट्स मिलेंगे। ये बहुत सारी चीजें जो है ना ओवर द पीरियड ऑफ़ टाइम टेंशनंस ये सारी चीजें एक मोटा-मोटा जो बात है जो सोश इकोनॉमिक डेटा भी दिखाता है कि भ अब आप एक्सेप्शनंस तो हर जगह ला सकते हैं। जैसा आप हिस्ट्री के एक्सेप्शनंस का यूज़ करते हैं यूनिवर्सल्स में उस तरह आज भी आप किसी एक को दलित को उठा के दिखा देते हैं। देखो है ना यहां पे बट इट्स नॉट द टोटिटी ऑफ़ दलित। वि इन दलित वो वो चीज कंटेस्टेशन में रहती है। जी तो एक तरह की पॉलिटिकल इकॉनमी इससे इमर्ज होती है कि एक पॉलिटिकल स्ट्रक्चर है, इकोनमी है और पहले क्या होता था कि भ दलित जो था वो ऐसा डिस्पेंसिबल लेबर क्लास था जिससे आप हाईएस्ट एक्सट्रैक्शन ऑफ सरप्लस ले सकते थे। कार्ल मार्क्स उसको रिजर्व आर्मी ऑफ लेबर बोलता है कि भाई जिस जिसको आप जब चाहे नौकरी से निकाल सकें वह फॉर एग्जांपल उसकी नौकरी नहीं है या नहीं है तो वो कुछ भी काम करने को तैयार हो जाएगा किसी भी रेट में तो उसकी वजह से मार्केट का भी ओवरऑल रेट कम होता है तो वो जो कैपिटलिज्म का स्ट्रक्चर है जिसमें डिस्ट्रीब्यूशन इस तरह होता है कि वो हर क्लास में ज्यादा से ज्यादा वेल्थ होती चली जाती है तो उसमें फिर आपको एक ऐसी लेबर क्लास चाहिए होती है जो हमेशा आपसे कम में काम करने को तैयार हो जाए तो जब भी कोई यह बोले कि भाई मुझे ज्यादा पैसा चाहिए तो बोले ठीक है आप छोड़ दो दलित आएगा कि भाई मुझे दे ओबीसी उस टाइम पे या जो लोअर कास्ट इंदु शूद्रा का मुझे दे दो। तो वो जो हायरार्की में जो दलित से एक्सट्रैक्शन सरप्लस का होता था क्योंकि दलितों ने कॉन्स्टिट्यूशनल राइट को वो कर दिया। हालांकि उनकी अभी भी वो हो रही है। तो लेकिन अब उनको एक ऐसा चाहिए था कि जिसको आप जब चाहे मार सकें। जैसे पहले दलित को करते थे। आप दलित में क्या है कि अट्रोसिटीज एक्ट है या फिर उसकी यू नो हिस्टोरिकल ऑपरेशन की मेमोरी है जो पूरी तरह से बन चुकी है। उसका नॉलेज पैराडाइम आ चुका है। तो कहीं ना कहीं इस छुप के वहां पे इनविज़िबल इनविज़िबल आप लोकल मारना चाहते हो लेकिन आप नहीं चाहते कि वो बहुत ज्यादा स्टैटिस्टिक्स बाहर आए। मुस्लिम केस में आप चाहते हो स्टैटिस्टिक्स बाहर आए क्योंकि डर भी डेवलप हो। उससे साइकिक वेज कि भाई दो तरह की एक तो दलित को यह है कि भाई नाउ आई एम बेटर दन मुस्लिम। तो बहुत सारे दलित आराम से उनको बीजेपी में जगह दे दी जाएगी। तो वो यह बोलेंगे कि हां यार मतलब यह तो हमारे पास प्रिविलेज पहले नहीं था। एवरीबडी ट्राइस टू बिकम अ लिटिल बेटर। दैट इज द हायरार्की ऑफ़ कास्ट कि विद इन दलित आल्सो देयर आर 25 सब कास्ट। आई एम लेस आई एम लेस मोर और लेस वाला जो पूरा फिनोमिना है। सच्चर के बाद ये एटीट्यूड एपेरिकली इस्टैब्लिश भी हो गया कि दलित जो है वो मुस्लिम से बेटर है। मुसलमान विद इन मुसलमानों में भी तो दलित मुस्लिम्स या क्रिश्चियंस में भी दलित ना। हमारे यहां भी तो ऐसा नहीं है ना कि वी आर पार्ट ऑफ़ दिस सोशियोलॉजी। तो फिर वहां पे जो ये हिस्टोरिकल टू मिलेनिया थ्री मिलेनिया से स्पेशली टू मिलेनियम से जो एक दलित जो एक ऐसी सेट ऑफ पीपल थे जो यहां के एक्चुअल इंडजीनस थे जिनको आपने एक हायरार्की ऑफ डिनिटी में आपने उनको नीचे लाके उनको आपने जैसे जब अंग्रेज आए तो कि भ हम लोग प्रिविलेज्ड हुए हैं हम आप इनको कॉलोनाइज कर रहे हैं सिविलाइज करने के लिए अ सिविलाइजेशनल मिशन तो सिविलाइजेशनल मिशन में जो डिवाइन यू नो वोकैबलरी प्रोड्यूस हुई उसमें छोटा गॉड बड़ा गॉड हरार्की ये वो ऐसा पेरियार कहते हैं मतलब मेरी इसमें कोई पर्सनल मैंने कोई ऐसा बहुत ज्यादा उसको मैं एज ए एक्सपर्ट नहीं बोल सकता। बट जो बहुत सारी हिंदूइज़्म की रीडिंग्स में बहुत सारे जो एंटी कास्ट स्कॉलर्स हैं जो या अंबेडकर हैं फिर इनकी जो रीडिंग्स हैं वो इस तरह कहते हैं। मॉडर्न स्कॉलर्स भी उसको। हालांकि बहुत सारा कंटेस्टेशन भी हो रहा है हिंदू साइड की तरफ से भी। तो एक पर्टिकुलर पॉलिटिकल इकॉनमी बनती है कि जहां पर जो रिजर्व आर्मी ऑफ लेबर है वह मुसलमान है वह दंगा होता है कहीं पे तो फिर उसी की घर भी बेचा जाता है सस्ते में वो छोड़ के भी जाता है वो लोकल मर्केंटाइल कास्ट से उधार भी लेता है 30% पे जो 12% पे या 8% पे होता तो एक पूरी इकॉनमी को जो जरूरत होती है कैपिटलिज्म में जहां से लेबर का सरप्लस प्रोड्यूस हो जो ऊपर मूव करे तो वो 20 करोड़ 25 करोड़ की आबादी जो अल्टीमेटली पंक्चर बनाने वाला, टायर वो करने वाला, दरी बिछाने वाला अल्टीमेटली यह कोई दीज़ आर नॉट मीम्स। दिस इज दी प्रोडक्ट ऑफ ए पॉलिटिकल इकॉनमी कि भाई आपका यही काम है और आपसे सरप्लस एक्सट्रैक्ट होगा और आपको जो मिल रहा है आप लीजिए। अदरवाइज आपको मारा जाएगा और आपको मारते हुए दिखा के सामने जो दलित खड़ा होगा या ओबीसी खड़ा होगा उसको भी डर लगेगा कि मुझे भी मारा जाएगा। मुझे तो थोड़ा बेहतर मिल ही रहा है। तो वो एक पर्टिकुलर काइंड ऑफ़ अप्रेसिव जिसे कहते हैं स्टेबिलिटी इक्विलिब्रियम है। तो यहां की पॉलिटिकल इकॉनमी में मुस्लिम सिर्फ एक अप्रेस्ड सब्जेक्ट नहीं है। इट इज़ अ मींस टू अपर कास्ट की कंसंट्रेशन ऑफ वेल्थ। जो एक जमाने तक दलित था। आज वो मुसलमान है। और दूसरा उसका फायदा यह होता है पॉलिटिकल इकॉनमी का कि जो विदिन हिंदूज़्म जो कास्ट की जो कॉम्पिटिटिव डायनेमिक्स है वो भी कंसोलिडेट हो जाती है एक्सटर्नल एनिमी की वजह से कि भ ये बाहरी दुश्मन है। यह हमारे लिए डेंजरस है। ये टेररिस्ट है। ये पाकिस्तानी है। ये बाहर से आया या आपको खत्म कर देगा और साथ में आप दलित्स और ट्राइबल्स में भी जाके आप हिंदू ओरिएंटलिज्म एक तरीके से कर रहे हैं। का खैर दावत दे रहे हैं और लोग अगर कबूल कर रहे हैं तो एक वो है लेकिन वो दावत अगर आपकी इससे हो रही है कि भाई इनको मारो इनसे डरो वो तो एवरीबडी हैज़ द राइट टू प्रोफेस देयर रिलजन अगर उसका जो पूरा का पूरा वो है वो वेपनाइज हो रहा है अगेंस्ट एंड ऑलरेडी मार्जिनलाइज़ एंड सब्जगेटेड कम्युनिटी इन द नेम ऑफ ए हिस्टोरिकल पास्ट दैट नेवर रियली हैपेंड क्योंकि मुसलमान तो मुगलों में भी गरीब ही थे ना ज्यादातर आप एक इलीट ही वो इलीट तो बैठा है आराम से सेफ सो द न्यू हिंदुत्व स्टेट डस नॉट रॉल्व दलित एंड लोअर ओबीसी रिप्रिशन। इट मैनेजेस मैनेजेस एंड कंटेन इट। एक्सक्टली। लेट्स पुट दिस टू अ मोर टेक्निकल टेस्ट। जहां पे हम लोग बात करेंगे कि मुसलमान एज अ पॉलिटिकल टेक्नोलॉजी। टेक्नोलॉजी जब मैं ये बात बोलता हूं तो मेरा सेंस ये है कि एज एन इंस्ट्रूमेंटल वैल्यू मुसलमान की इस स्टेट में क्या रह जाती है। जहां पे वो डिप्र्राइव्ड है अपनी इकोनॉमिक कंडीशन से। जहां पर वो सोशल गेज में भी डिमिनिश्ड है। जहां पर वो अपनी आम जिंदगी में भी अपने इंस्टिट्यूशन से लेके अपने घरों तक बचा घरों को बचाने में भी बहुत परेशान है। तो इस वक्त क्या मुसलमान की जो पूरी जो स्ट्रिपिंग ऑफ है जो एक सोशल लाइफ की जो पूरी एक स्ट्रिप्ड इमेज हमारे सामने आ रही है। तो ऑफ कोर्स इसको अगंबेन के बियर लाइफ से हम रिलेट कर सकते हैं। मगर क्या फिर जो मुसलमान की इंस्ट्रूमेंटिटी है जो उसकी एक टेक्नोलॉजिकल वैल्यू है जब हम उसको शॉर्ट में बोले मुस्लिम एज अ पॉलिटिकल टेक्नोलॉजी तो क्या फिर वो बस वोट करने के लायक बचता है क्योंकि उसके अलावा उसका कोई रोल मुझे अपने पर्सनली मुझे अपने ऑब्जरवेशन में बहुत कम देखने को मिलता है और हर दिन ये स्कोप कम ही होते जा रहा है। एक तो वो हिस्सा है जो हमने अभी लाए कि भ एज ए टेक्नोलॉजी ऑफ़ सेल्फ और पॉलिटिकल टेक्नोलॉजी जो हिंदुस्तान का मुसलमान है एक तो वो हिंदूस को कंसोलिडेट करता है कि भाई बाहरी एक एनमी है और कास्ट के झगड़े को छेड़ो छोड़ो दूसरा वो उस झगड़े के नाम पे जो कास्ट के विदिन जो हायरार्की [गला साफ़ करने की आवाज़] है उसको रिप्रोड्यूस करता है स्टेबलाइज करता है तीसरा वो इकोनॉमिक जो रिस्ट्रीब्यूशन है अपर कास्ट की तरफ जिसमें मुस्लिम जो सरप्लस है वो मैक्सिमम मैक्सिममली एक्सट्रैक्ट होता है। पहले दलितों का होता था तो दलित बेटर ऑफ हो जाते हैं। द फॉर्म ऑफ़ न्यू अनटचेबल्स इन द फॉर्म ऑफ न्यू अनटचेबल्स मुसलमानों को आप बोल सकते हैं न्यू दलित्स हैं। जैसे वो न्यू हिंदुत्व है तो ये न्यू दलित्स हैं। बात करते हैं अंडर परफॉर्मेंस की मुस्लिम कम्युनिटी की क्योंकि कांग्रेस के वक्त पे जैसे कि आपने कहा कि आपको थोड़ी आजादी थी। यू लाइक वी हैड दिस सेुलर वर्चू इनवॉल्वड और वो डेली प्रैक्टिससेस में एट सम एक्सटेंट टू सम डिग्रीज़ दिखता था। मगर कांग्रेस की भी अपनी लिमिटेशंस थी जो यूपी में हुआ 47 के बाद अच्छा खासा क्रिमिनलाइजेशन मुसलमानों का हुआ। एक परमानेंट परपेचुअल सस्पिशन में मुसलमान रहे। कई सारे मुद्दे उर्दू के हो गए चाहे वो लॉ वोट के हो गए वो हमें देखने को मिले। अह मगर बात यह है कि अगर सिर्फ अह हम इस कंट्री या नेशन एज़ एन आइडिया पे मुसलमान कॉन्स्टिट्यूट नहीं करता है। देयर आर मल्टीपल एग्ज़िस्टेंसेस लाइक द मल्टीपल आइडेंटिटीज़ और माइनॉरिटीज़ भी कई सारी हैं। अभी हम जैसे देखें आसपास अपने कि दलित एक ऐसी माइनॉरिटी है जो कि बहुत काफी सबजुगेटेड माइनॉरिटी है। जिसका अपना पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन सिंस 80 90ज रहा है। मगर वह भी इस सिंस लाइक द रेन ऑफ एनडीए द थर्ड रेन लाइक जब से पावर में आई है बीजेपी की सरकार आपको देखने को मिला है कि देयर इज़ अ टर्बुलेंस इन दलित कम्युनिटी आल्सो। सो मुझे जहां तक लगता है कि विथ इन अगर हम बात करें तो ये चीज जाहिर होती है कि हमारे पास अभी करंट ये रोड मैप नहीं है कि हम लोग अपने आप की अपने मुस्लिम कम्युनिटी की एलिवेशन को कैसे हासिल करें। तो क्या किसी तरह का स्ट्रेटेजिक अलायंस किसी दूसरी माइनॉरिटी के साथ हमें इस रास्ते में आसानी कर सकता है और अगर कर सकता है तो किस बुनियाद पे कर सकता है और किस एक्सटेंट तक कर सकता है इस पे मैं आपसे कुछ जानना चाहूंगा क्योंकि बात मुस्लिम आइडेंटिटी की हो रही है और अल्टीमेटली कोई भी ऐसी आइडेंटिटी जो किसी जिसका बैकग्राउंड रिलजन हो इस्लाम ही मुस्लिम को प्रोड्यूस करता है। तो कहीं ना कहीं मुसलमान इस्लामिक लीनिएज में इस बात को खोजने की कोशिश करेगा। क्या पॉसिबिलिटीज हैं? अपनी कंटेंपरेरी उस कॉन्टेक्स्ट को देखते हुए भी 20वीं सदी में भी यही डिबेट हो रही थी। जैसे हमने कुछ देर पहले जिक्र किया पासिंग नोट पे इस पर हम कभी और लंबी गुफ्तगू करेंगे। लेकिन यही सब डिबेट हुई कि मिल्लत, कौम, उम्मत हाउ डस मुस्लिम बिकम ए सिटीजन और ए एजेंट विद इन दी जो पोटेंशियल फॉर्मेशन होने वाला था नेशन का स्टेट का फॉर्मेशन होने वाला था। लेकिन मैं फिर भी मैं उसको जब वापस रिविजिट करता हूं उस पोटेंशियल को उस टाइम को तो अगेन वी हैव टू फॉल बैक एंड सी सम ऑफ या होल ऑफ़ द प्रॉफेट प्रोफेटिक लाइफ सल्लल्लाह वसल्लम इन द 23 इयर्स दैट ही इज़ ही इज़ ही इज़ डन एक्टिव एंगेजमेंट इन पीपल बिल्डिंग, सिविलाइजेशन बिल्डिंग, सोसाइटी बिल्डिंग, इकोनॉमिक्स बिल्डिंग। तो यह तो वाज़ है कि भाई वहां पर ट्रीटीज हुई हैं बिटवीन डिफरेंट कम्युनिटीज और इस पर तो बड़ा डिबेट है मुताहिदा कौमियत का कि भाई आपकी मिसाख मदीना कि भ जब आप हिजरत करके मदीना में आए तो आपकी ट्रीटी हुई उसमें यहूदी भी थे दूसरे लोग भी थे बल्कि ट्रीटी के इंपैक्ट में इनडायरेक्टली आपके यू नो पेगंस भी आते थे क्योंकि जिनका ट्रीटी यहूदियों से था फिर उनका वो वो एक लार्जर वो बनता था तो वो तो है मतलब इस्लाम की ओरिजिनल स्टोरी में अलायंस बिल्डिंग है। लेकिन मकसद क्या होगा अलायंस का? वो बड़ा सवाल है। क्या आपका अलायंस सिर्फ इसलिए है कि भ आप हिंदुत्ववादियों को रोक लें। उसकी एक लिमिटेड स्ट्रेटेजिक एडवांटेज होगा। आपको इम यू नो एक थोड़ा बहुत वो मिलेगा। बट अल्टीमेटली जो स्टेबल कॉन्फ़िगरेशंस होते हैं वो होते हैं कैपेसिटी बिल्डिंग के बेहतर जिंदगी हो सबकी बेहतर अमिनिटीज हो लोग पीस हो इकोनॉमिक जो इनकलिटी है वो कम हो पॉलिटिकल इनस्टेबिलिटी कम हो लोग अपनी पर्सनल लॉज़ को जिसे कहते हैं एक्सरसाइज कर सके तो ये सारी चीजें जब तक के हर कम्युन ुनिटी की जो डिमांड्स हैं व्हेन इट कम्स टू नेशन एज अ एज ए सिटीजन फ्रॉम अ पर्सिव टू व्हाटएवर कॉन्स्टिट्यूशन दैट वी वर एबल टू नेगोशिएट व्हिच इज़ ए प्रीटी गुड नेगोशिएशन दैट यू नो मुझे कोई झिझक नहीं होती है इसमें बोलने में कि भ कॉन्स्टिट्यूशन एंटी मुस्लिम भी है तो एंटी हिंदू भी है एंटी सिख भी है एंटी दलित भी है। क्योंकि जब आप दो कम्युनिटीज जिनके दो डिफरेंट यूनिवर्सल क्लेम्स हो वो जब आके मुयदा करेंगी और टेबल पर बैठेंगी तो ऑफ कोर्स कुछ आपको छोड़ना पड़ेगा, कुछ मुझे छोड़ना पड़ेगा। ये तो बड़ा नेचुरल है। तो जितने भी सेंट्रिस्ट डॉक्यूमेंट्स होंगे या फिर कॉन्स्टिट्यूशन वो होंगे उसमें ये रहेगा। इवन सुलेह हदबिया में भी आपको कुछ छोड़ना पड़ा। आपको मिसाख मदीना में भी कुछ छोड़ना पड़ा। आपकी जितनी तमाम ट्रीटीज हैं वो एक एववोल्यूशनरी कॉन्टेक्स्ट में डेमोग्राफी इसलिए चेंज नहीं हो रही है कि आप अह जिसे कहते हैं फोर्स कर रहे हैं कुछ। लोग मुतासिर हो रहे हैं आपके मूवमेंट से। वो हो रहे हैं इस वजह से हो रहे हैं। तो जरूरत यह है कि मुसलमानों को अपने आप को विक्टिम बताना तो चाहिए क्योंकि वो विक्टिम है लेकिन विक्टिमहुड की साइकी से बाहर आना चाहिए। एक विक्टिम [गला साफ़ करने की आवाज़] लिबरेट भी कर सकता है समाज को क्योंकि एज अ विक्टिम उसको वह वांटेज पॉइंट है शजा जो शायद और किसी को नहीं है। हालांकि डॉक्टर अंबेडकर वो एक सेकुलर लिबरल अ पर्टिकुलर फ्रेमवर्क से आते हैं और सेकुलरिटी अलग चीज है अपने आप में। वो तो न्यूट्रल नेगोशिएशन का ग्राउंड है। लेकिन उनकी एक अपनी फिलॉसोफिकल यूरोसेंट्रिक वर्ल्ड व्यू भी है जिसको वो फोर्सफुली यहां पे लोकेट करने की कोशिश करते हैं इंडियन कॉन्टेक्स्ट में। और क्योंकि इंडियन कॉन्टेक्स्ट में रिलजन का बड़ा रोल है तो फिर उसको उसके हिसाब से उनको एडजस्ट और फाइंड ट्यून करना पड़ता है और बुद्धिज्म को भी चुनना पड़ता है। एक जमाने में वो इस्लाम और बाकी चीजों को भी 30ज में सोच रहे थे कि भाई क्या ये हो सकता है? तो फिर यह हो सवाल यह उठता है कि अंबेडकर की जो बड़ा कंट्रीब्यूशन है और गांधी का दो लोगों का दो दोनों जॉइंट्स हैं उनका दो जो बड़े कंट्रीब्यूशंस हैं वो इतनी कॉम्प्लेक्स सोसाइटी में नेगोशिएशन के प्रिंसिपल्स क्या होंगे जिससे अ गस हो सके मैक्सिमम सोसाइटी के वो उन प्रिंसिपल्स को अपनेप फिलोसोफिकल वर्ल्ड व्यू से लाते हैं। ये काम मुसलमानों को भी करना था कि भाई बिय्ड मुस्लिम रिक्वायरमेंट्स नो व्हाट थोड़ा मौलाना आजाद ने उस चीज से एंगेज करी लेकिन वो गांधियन वर्ल्ड व्यू के विदिन से की इस्लाम को लोकेट करने की। होना उल्टा था कि भाई इस्लाम के पर्सपेक्टिव से अब जो भी मुल्क वजूद में आने वाला है उसकी पूरी की पूरी जिसे कहते हैं जिसमें वहां पे जो लोग भी रहेंगे उनकी सिक्योरिटी बेहतर कैसे हो उनकी फैमिली बेहतर कैसे हो औरतों को कैसे अपने हुकूक मिले बच्चों को उनके कैसे हुकूक मिले गुरबत ना हो इनकलिटी ना हो ये सब तो इस्लाम के पास है उसकी अपनी इकोनॉमिक अंडरस्टैंडिंग है उसकी वो है आप उसको बता सकते हैं कि भाई आज दुनिया में वेल्थ टैक्स की बात होती है। जकात भी एक तरीके का वेल्थ टैक्स है। ऑप्रेसिव इंटरेस्ट रेट्स की बात होती है। रिबा भी बात कर रहा है। यह बात होती है कि आप ज्यादा से ज्यादा फिलथरपी करें। आपके यहां फिलथरेपी का पूरा पैराडाइम है। यह बात होती है कि भ लेबर के ऊपर कैपिटल हमेशा काबिज रहता है। आपके यहां मुशारका मुदार है। तो आप बता सकते थे कि भ ऑर्गेनाइज करने के प्रिंसिपल्स इनकलिटी को कम करने। आपके यहां पे लीगल प्लूरलिज्म अकेला आपका ऐसा सिस्टम है जिसमें थियोलॉजिकली जिसे कहते हैं कि उन उसके स्ट्रक्चर्स में तो उसूल जब बनेंगे जब हम ये समझेंगे कि हिंदुस्तान में प्रॉब्लम्स क्या है उसको स्टडी करेंगे सिर्फ मुस्लिम्स की प्रॉब्लम्स को नहीं अभी हमें हम इस फज़ में हम खुद इंडियन मुस्लिम्स पे फोकस करते हैं। लेकिन धीरे-धीरे हमने अभी जॉन दयाल वो क्योंकि एक एववोल्यूशन होता है। प्रॉफिट की जो चैलेंजेस थे बहुत सारे वो पर्सनल चैलेंजेस थे। लोकल चैलेंजेस थे, यूनिवर्सल क्लेम्स थे। तो इवन व्हेन यू आर एड्रेसिंग योर ओन प्रॉब्लम्स, यू कैन स्टिल ट्राई टू क्रिएट अ यूनिवर्सल वोकैबलरी जो इनफॉर्म्ड होगी आपकी अपनी फिलॉसोफी से लेकिन वो टच बेस करेगी और भी लोगों के ऑपरेशंस से जब प्रॉफेट बात कर रहे हैं कि भाई आपके यहां पर अनाथों के हुकूक नहीं है। तो भाई अनाथ कोई सिर्फ मुस्लिम थोड़ी होता है। वो तो सब वहां पर जितने भी वह थे औरतों के हुकूक की बात हो रही थी तो यह भी यह बात हो रही थी कि भाई यहां पर स्लेव्स के साथ इस तरह हो रहा है तो मुस्लिम स्लेव्स कहां थे ज्यादा थोड़ी बहुत थे वो तो जनरल जिसे कहते हैं ना ये रिबा एक्सप्लइटेटिव इंटरेस्ट रेट है वो कोई मुस्लिम थिंग थोड़ी था तो ये डलेमा ऑफ़ एब्सेंस नहीं कि हमारे पास उस चीज के मेथड्स नहीं है या उस चीज की नॉलेज नहीं है बल्कि ये एक आर्टिकुलेशन की प्रॉब्लम है। नहीं आर्टिकुलेशन नहीं है ये प्रॉब्लम। हम तो आर्टिकुलेट कर ही रहे हैं कि भाई इस्लामिक इकोनॉमिक्स होनी चाहिए होनी चाहिए। नहीं ये मेथोडोलॉजी की प्रॉब्लम है। यूनिवर्सल मेथोडोलॉजी भी जब आती है जब आपके पास आपके मौजूदा दौर में उस वोकैबलरी को फिलॉसोफी में मेथोडोलॉजी में एग्जीक्यूशन में कन्वर्ट करने की टेक्नोलॉजी हो। मसलन अगर आपके पास ऐसा बैंकिंग का निजाम ना हो जो सफिशिएंटली एंगेज कर सके प्रोडक्टिविटी से और साथ में इंटरेस्ट रेट भी ना हो तब तक वो क्लेम है। तो हमारे यहां ये क्या है कि हमारे यहां पे यूनिवर्सल क्लेम्स तो अभी भी हैं। लेकिन एग्जांपल्स नहीं है कि भ वो मटेरियलाइज कैसे होता है। आपके यहां पर बहुत सारे हमारे यहां पे जो चीजें हैं हिंदुस्तान में जो मसाइल हैं जो सिर्फ मुसलमानों के नहीं है जो इनकलिटी एक बहुत बड़ा मसला है। वेल्थ इनकिटी एक बहुत बड़ा मसला है। उससे ही लोग एजुकेशन नहीं ले पा रहे। दूसरी चीजें नहीं ले पा रहे। एक अगर एग्जांपल हेल्थ इनइकलिटी हेल्थ एक्सेस एक बहुत बड़ा मसला है। तो इनकी भी आपके पास अप्रोचेस होनी चाहिए कि भ इनके यूनिवर्सल क्लेम्स क्या हो सकते हैं। बाकी अगर किसी को इस तरह का लिटरेचर पढ़ना है तो डॉक्टर जावेद जमील का इस पे बहुत जबरदस्त काम है अप्लाइड इस्लामिक्स पे कि भ किस तरह से आप इस्लाम से इनफॉर्म होके ऐसी पॉलिसीज ऐसे फ्रेमवर्क्स डिजाइन करते हैं जो जिनको आप फॉल्सिफायबल है। कहने का मतलब कि कोई भी उनको इवैलुएट कर सकता है। लेकिन उसके बावजूद उनसे फायदा उठा सकता है। हालांकि उनका जो जितनी भी उसकी जो फिलोसोफिकल लीनेज है वो ज्यादा इस्लाम से आती है। तो जब आपके पास मैपिंग होगी प्रॉब्लम्स की आइडेंटिटीज को सामने रखते हुए, इश्यूज को सामने रखते हुए तो लाजमी है कि भ आप दलित इश्यूज को भी उठाएंगे या जो आप मुसलमानों के लिए मांग रहे हैं उसकी लैंग्वेज ऐसी प्रोड्यूस करेंगे कि दलितों को लगेगा कि हमें भी फायदा हो रहा है। दोनों तरीके हैं ना भ आपके पास रिसोर्सेज कम है। आप दुनिया भर का मोबिलाइजेशन सबके लिए नहीं कर सकते। प्रगमेटिक चैलेंज है। आप अस्यूम ना करें कि भाई तुम यह नहीं कर रहे हो। इसलिए नहीं कर रहे हैं क्योंकि वहां पास रिसोर्सेज नहीं है। बट अपना मांगते हुए आपका फॉर्मुलेशन कैसा हो सकता है कि भ ये जो फायदा है अल्टीमेटली ये सिर्फ मुसलमानों का नहीं है। ये तो एक जनरल जैसा हम बोलते हैं कि भ सेकुलर मुल्क तो सबका फायदा है। बट ये बहुत सारी ऐसी चीजें हैं जो जिसमें आपकी अपनी फिलॉसफी का कोई कंट्रीब्यूशन नहीं है। क्योंकि अल्टीमेटली वो तो बोल देते हैं ना जो हिंदुत्ववादी हैं, दूसरे लोग हैं कि ये तो जो है हिपोक्रेसी है। खुद सेकुलरिज्म पे नहीं मानते। बाहर कहीं पर सेकुलरिज्म नहीं चाहते तो वो इनकंसिस्टेंट आर्टिकुलेशंस हैं जिस पे आप पर हर वक्त इल्जाम लगता है कि आप उस पर बिलीव नहीं करते क्योंकि आपने अपनी प्रिंसिपल्स से उसका 21वीं सदी में किस तरह से उस चीज को अस्यूम नेगोशिएट और आर्टिकुलेट और इंटरेक्ट करवाया जा सकता है वो आपने नहीं किया। तो हमारे क्लास की स्ट्रगल में हमारे बहुत क्लोज स्ट्रगल आपको लेफ्टिस्ट के साथ मिलेगी। ओबीसी ग्रुप्स के साथ मिलेगी। आपको कास्ट के में आपको बहुत सारी स्ट्रगल दलितों के साथ मिलेगी। ओवरलैपिंग ओबीसी होंगे। आपको बहुत सारी जो डिग्निटी की स्ट्रगल है। आपको आपको दलित के साथ, ट्राइबल्स के साथ और मुस्लिम्स के साथ मिलेगी। आपको बहुत सारी ऐसी स्ट्रगल्स होंगी जो आपकी जो फॉरेस्ट लैंड और इस तरह की होंगी वो आपको ट्राइबल्स से मिलेंगी। आपको बहुत सारी स्ट्रगल्स आपकी ऐसी होंगी कि जो वुमेन एंपावरमेंट की होगी उसका आपको एक ओवरलैप मिलेगा कि भ आपको इवन फेमिनिस्ट के साथ भी मिलेगा और इन सब से आपके डिफरेंसेस भी होंगे। अगर इस बात को हम प्रॉब्लम को रीपोज करते हैं। मगर इसमें हम अब अपने डिस्कशन के आखिरी सवाल की तरफ बढ़ेंगे कि व्हेन यू हैव अ जब हम लोग के दिमाग में यह क्लेरिटी आ जाती है कि एक हिंदुत्व हैमन है और बाकी काउंटर हेजमेनिक फर्सेस चाहे वह मार्क्सिस्ट हो जिनको वो डिस्कार कर देता है एंटी रिलीजियस बोल के चाहे वो दलित हो जिनको डिस्कार्ड भी किया जाता है एक स्किल पर असिमिट भी किया जाता है अपने शर्तों पे जो हिंदुत्व खुद करता है और मुस्लिम्स एज अ फॉरेनर्स एंड एज कॉलोनाइजर्स है तो इस हिंदुत्व की हेजुमिनी को चैलेंज करने के लिए मोस्टली काउंटर हेजमेनिक फोर्सेस सिंगुलर फॉर्म में कैपेबल नहीं है आपको स्ट्रेटेजिक अलायसेस बनानी पड़ेंगी खासतौर से मुस्लिम कम्युनिटी को जहां पे हम ओवरलैप्स क्रिएट कर सकते हैं। तो आप सोचेंगे कि भ ये क्या बात है भाई अलायंस की तो हमने हमेशा से बात करी है। हम ओबीसी अलायंस की भी बात करते हैं। जब ये हमारा समाजवादी से अलायंस है। हम दलित अलायंस की भी बात करते हैं तो हमारा उससे आप बिल्कुल ये बात सोचेंगे और वाजिब है। हालांकि अलायंस की क्या कंडीशंस होनी चाहिए? ये सब हो इस पे हमें आगे बड़ा अलग से पडकास्ट करेंगे। लेकिन अभी मैं अगर उसको बहुत शॉर्ट में बोलूं। अभी तक जितने अलायंसेस हैं वह हमारे अलायंसेस हमारी अंडरस्टैंडिंग से नहीं है। अंबेडकर की क्या अंडरस्टैंडिंग है? कास्ट की हमारा उससे अलायंस है। लेफ्टिस्ट्स की क्या अंडरस्टैंडिंग है? क्लास की हमारा उससे अलायंस है। फेमिनिस्ट्स की क्या अंडरस्टैंडिंग है? वुमेन राइट्स की हमारा उससे अलायंस है। आप समझ रहे हैं? तो वो जो फिलोसोफिकल स्पेस कट हो रहा है को जिसमें आपने इसके लिए भी हमें एक अलग हमें वो करना चाहिए कि भ ये फिलोसोफिकल कैलकुलस जिसे मैं कहता हूं कि एक पूरा फिलोसोफिकल पैराडाइम कैसे इमर्ज होते हैं। लेकिन फिर भी अगर इसको मैं शॉर्ट में बोलूं तो होता ये है कि एक एक स्मॉलर जो वर्ल्ड व्यू होता है जिसमें जैसे पोस्ट मॉडर्निटी की हमने बात करी है उसमें मटेरियलिज्म है लेकिन सब्जेक्टिविटी है। लेकिन जो पॉलिथीज्म है उसमें इमटेरियलिज्म भी है। उसमें आईडिया ऑफ गॉड की पोटेंशियल है। तो उसमें वो मटेरियलिज्म भी आ गया जो सब्जेक्टिविटी का है। लेकिन साथ में उसमें ट्रांसेंडेंटल एक्सेस भी आ गया। तो अब जब हिंदुत्ववादी पोस्ट मॉडर्निटी को देख रहा है या हिंदूइज़्म पोस्ट मॉडर्निटी को देखेगा उसमें भी अलग होगा क्योंकि हिंदूइज़्म का भी पूरा रेंज है। तो वहां पे पोस्ट मॉडर्निटी का जो वर्ल्ड व्यू है वो सबसेट है पॉलिथीज्म का। सुपर सेट नहीं है। इसी तरह जब हम अपने आप को सबसेट समझ लेते हैं क्योंकि हमने अपने को माइनॉरिटी की साइकी में बांध लिया। हमारा अपना यूनिवर्सल क्लेम भी है सशंस का। इवन दो व्हेन यू आर अ माइनॉरिटी। प्रॉफिट की मक्कन लाइफ का ये बड़ा मिसाल है कि भ यू आर बीइंग ऑप्रेस्ड एज एनीथिंग। बट यू आर गिविंग यूनिवर्सल क्लेम्स जो ये बात हो रही थी कि भ यूनिवर्सिटी क्या है? जब थ्योरी ऑफ डेमोक्रेसी में हम सिविल सोसाइटी की तरह बिहेव नहीं कर पा रहे हैं और बल्कि एज अ विक्टिम सोसाइटी बिहेव कर रहे हैं। क्या इस क्लेम को मुस्लिम खुद कैपेबल है? मुस्लिम कम्युनिटी खुद कैपेबल है इसको नलिफाई करने के लिए। एक्टिव मुस्लिम पॉलिटिक्स का मतलब होना चाहिए कि भ एक्टिव शेपिंग ऑफ पब्लिक डिस्कोर्स। उसमें टाइम भी लगेगा। वन डे इवेंट नहीं है। हम भी कोई नहीं कह रहे कि भ जादू की छड़ी है। बट कहीं तो शुरू होगा। वो कॉन्फिडेंस से शुरू होगा। सूर मरियम में क्या है कि भाई इतना ज्यादा होने के बाद भी एक डिप्रेशन हो रहा है वह हो रहा है। अल्लाह क्या बोल रहा है अल्लाह सुना ताला कि भाई मेरे ऊपर यकीन करो बी कॉन्फिडेंट तो कॉन्फिडेंस नहीं है इस कम्युनिटी में इस कम्युनिटी में यह कॉन्फिडेंस नहीं है कि वो कुछ कर सकती है और उसके जितने भी इस वक्त के लीडर्स हैं वो कॉन्फिडेंट प्रोड्यूस कॉन्फिडेंस प्रोड्यूस होने भी नहीं दे रहे हैं। आखिरी बात कहूंगा उसके बाद मैं एंड करूंगा कि ज्यादातर जो आप हमारे यहां मंच देखेंगे वह सजे हुए हैं जिसमें 70 80 साल के लोग बैठे हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है। विज़डम फ्लो होना चाहिए। लेकिन आपके सामने क्या कोई आपके साथ कोई 50 साल का आदमी है, कोई 30 साल का आदमी है। कोई 20 साल का लड़का है जिसको आप ट्रेन कर रहे हैं। लड़की जिसको आप एंगेज कर रहे हैं। नहीं है। यू आर यू आर एन इंडिविजुअलिस्ट। और जिनके पास हैं वह वोकैबलरी को अपनी डाइल्यूट कर रहे हैं तो होंगे भी तो वह जाया हो रहे हैं। अली भाई आपसे इन सारे मौजों पे डिस्कशन करके बहुत सारी इनसाइट्स जानने को मिली जहां पे हमने यह समझा कि एक आइडियोलॉजिकल प्रोजेक्ट किस तरह से चैनलाइज होता है और हमारे पास किस तरह की प्रॉब्लम्स एज अ मुस्लिम कम्युनिटी एंड एज अ मुस्लिम कम्युनिटी कॉन्स्टिट्यूटिंग इन एन आईडिया ऑफ द नेशन कैसे हमें एक स्ट्रेटजी अपनानी चाहिए। और इंशा्लाह हम उम्मीद करते हैं कि इन आइडियाज पर जिन पर हम अभी पूरी बात नहीं कर पाए उस पर आगे आने वाले पडकास्ट पर हम जरूर बात करेंगे। बहुत शुक्रिया आरिस और इंशाल्लाह हमें लगता है कि जो हमने इरादा किया है कि इस तरह के इश्यूज के ऊपर जो फाउंडेशनल इश्यूज हैं, फलसफे के इश्यूज हैं, आइडेंटिटी के इश्यूज हैं, हिस्ट्री के इशूज़ हैं, इंटेलेक्चुअल हिस्ट्री के इश्यूज हैं। हम लोग इंशाल्लाह थोड़ा-थोड़ा करके करते रहेंगे। उसके लिए हमें भी पढ़ना पड़ेगा। हम यह दावा नहीं कर रहे कि हम सब कुछ जानते हैं। हम बड़ी मेहनत करके कोशिश कर रहे हैं कि कुछ चीजें पढ़ें और हम चाहेंगे कि जो हमारे व्यूअर्स हैं, हमें देखने वाले हैं, वो हमें बताएं क्या चीजें छूट रही हैं, क्या काम होने के हैं, क्या चीजें हमारे पर्सपेक्टिव में नहीं आई। क्या और चीजें? क्योंकि लिमिटेड व्यूज होते हैं सबके। बहुत सारी चीजें होती हैं। तो जितना हमें अंदाजा होगा, उतना ज्यादा उसको इंक्लूड करेंगे। टॉपिक्स आप कमेंट में भी डाल सकते हैं लेकिन आप ईमेल भी कर सकते हैं कांटेक्ट एट nाउस network.g पे और कोशिश ये है कि भ इस तरह के जो फर्स्ट प्रिंसिपल्स के डिबेट्स हैं हम पोस्ट करें ना उस पे तो
Companion article
This episode launches First Principles, a new strand of the Nous Podcast built around close, critical readings of political theory and philosophy, paired with what the hosts call a reflective look at Islamic intellectual history. The guest for the opening conversation is Ali Javed, and the subject is neo-Hindutva as a civilisational state. Host Bushra Khanum opens with a genealogical question: is Hindutva best understood as an ideology evolving from pragmatism toward metaphysics, or has it always carried a metaphysics of its own alongside its practical politics?
Javed's answer is a history lesson before it is a definition. He traces the coinage of Hindutva to around 1890, but locates its real origins in the vacuum left by the decline of Mughal sovereignty after 1857, sharpened by British colonial census-taking, which forced communities to confront, often for the first time in administrative form, the actual demographic composition of the territories they lived in. That anxiety, he argues, fed directly into events like the partition of Bengal and into a new literature of Hindu-majoritarian symbolism from the 1870s and 1880s onward.
Javed's central historical example is Bankim Chandra Chattopadhyay's 1882 novel Anand Math, which he treats as an early template for the entire project: a fictionalised history in which Muslim fakirs, who in Javed's account fought alongside Hindu ascetics against British colonial policy and the famine it produced, are simply written out, leaving only Hindu "santans" as the resistance and casting the era's Muslim nawab as the colonial power's puppet. For Javed, this is the method more than the content that matters: a historical erasure, repeated and unlearned by successive generations, hardens into a self-evident memory of how things always were. He traces the same period's Arya Samaj and Shuddhi movements, the founding of the Hindu Mahasabha, and, in parallel, the formation of the Muslim League, as different communities each trying to work out what political vehicle could mobilise identity under a declining imperial order.
The philosophical turning point, in his account, is V.D. Savarkar, whom he credits with the first serious political theorisation of Hindutva as a stable, bounded polity rather than a loose cultural sentiment: a claim that a specific territory is the exclusive product of an indigenous philosophical lineage, from which Islam and Christianity, along with, in his broader treatment, Western frameworks like communism and liberalism, are structurally foreign. Even so, Javed insists that through Partition and the decades after, this remained substantially a movement rather than a state project organisations like the Hindu Mahasabha and the RSS trained cadres and built institutions, but operated in what he calls a constant bargain with a national movement, and later a Congress-led state, that was itself never fully realised on its own constitutional promises to minorities.
Javed dates the qualitative shift to 2014, but insists the underlying philosophy in what he terms neo-Hindutva is not new relative to Anand Math or Savarkar; it is the same project acquiring, for the first time, a body to inhabit. Where Hindutva theorists from Savarkar to Golwalkar had defined the doctrine's "soul," he argues, they lacked the state apparatus to give it a "body." The years since 2014 he reads as a steady process of constitutional reinterpretation and renegotiation, from the criminalisation of triple talaq to the push for a Uniform Civil Code, the abrogation of Article 370, and changes to waqf law each incrementally fusing what he calls the movement's soul, its animating philosophy, with the body of the state's institutions.
This is the crux of his definition: neo-Hindutva is not simply a ruling party's ideology but what he calls "a very robust metaphysics," a single, internally consistent framework that extends across territoriality, the nature of law, culture, ethnicity, religion and economics simultaneously. Its practical consequence, he argues, is that the RSS is no longer a necessary vehicle for the project's survival; it becomes, in his phrase, "just one of the organising forces," because the state itself now functions as Hindutva's primary organ. He is careful to add that this fusion is not complete or frictionless he compares it to a body that still carries a virus or bacterium it hasn't fully expelled but describes it as an ongoing, not a finished, process.
Much of the conversation is given over to a structural comparison between Hindutva and Zionism as political-theological projects, a comparison Javed handles carefully, insisting the two are built on nearly opposite metaphysical foundations even as they converge in practice. Judaism's monotheism, he argues, tends structurally toward oneness and a compact, defensible claim to a small, encircled territory. Hindu thought, in his reading, is metaphysically pluralist at its root, hospitable in principle to multiple gods and multiple truth-claims, which makes imposing a single, unified political and territorial order on it, one nation, one law, one civilisational identity, a much heavier lift. "The amount of computational resources required to sustain that," as he puts it, "are much higher than would be required for a metaphysics of oneness." His answer to how that lift is managed is what he calls "sacred geography": a doctrine that reclassifies the internal multiplicity of Hindu traditions as a legitimate, native pluralism while branding anything arriving from outside that geography, Islam, Christianity, and by extension foreign philosophical frameworks, as an intrinsically alien contaminant. Sacred geography, in his account, functions as a shield that both licenses internal hierarchy and justifies exclusion of outsiders in the same gesture.
Despite the different metaphysical starting points, Javed argues both projects converge on treating Islam as a common adversary and on a logic of mutual exclusion, which he says explains their deepening alignment in defence trade, intelligence sharing, and technology, and the fact that Indian labourers have filled roles in Israel's economy vacated by Palestinian workers since October 2023. He does not shy from the uncomfortable historical detail that RSS founder-era figures, including M.S. Golwalkar, wrote approvingly of Nazi Germany's approach to minorities, even as the same current also expresses solidarity with Zionism as a fellow ethnonationalist project, a pairing he calls internally consistent only in the narrow sense that both share the same enemy.
Turning to the idea of India as a civilisational state, Javed argues that any philosophy claiming a holistic vision of a society will naturally produce a civilisational self-image; the distinguishing feature of a civilisational state is when that logic is deliberately pushed, bottom-up, into the machinery of law and government itself, from a uniform civil code to citizenship rules. He draws a direct parallel between the RSS-linked concept of Akhand Bharat and Israel's Greater Israel project, arguing both stake claims to the maximal historical extent of a civilisation's past reach rather than its present, lived reality, and that China's own civilisational-state rhetoric produces a similar, ongoing territorial tension with India's. In his account, this is not unique to Hindutva: dynastic and imperial claims throughout history, Mongol, Ottoman, Safavid, Roman, have worked the same way, and he is explicit that Muslim empires' own historical expansions are not exempt from the same critique when their legacy is treated as an entitlement rather than a closed chapter.
The conversation's most pointed claim concerns political economy rather than theology. Javed argues that Muslims now occupy, within Hindutva's economic order, a structural role that Dalits historically occupied: a "reserve army of labour," to use the phrase he borrows from Marx, whose economic surplus is available for extraction and whose visible precarity lets Dalits and OBCs feel comparatively better off, a psychological wage that helps stabilise caste hierarchy even as, he says, atrocities against Dalits continue largely unreported. In his framing, the deliberate hyper-visibility of Muslims as a supposed threat and the simultaneous invisibility of their citizenship claims are two sides of the same mechanism, and it lets the state, in his words, "manage and contain" caste oppression rather than resolve it, by redirecting the sharpest edge of extraction and violence toward Muslims instead. He summarises the resulting role starkly: reduced to what he calls a "political technology," a Muslim's instrumental value to the state increasingly narrows to little more than a vote, useful chiefly for consolidating Hindu identity against a designated external enemy.
Javed devotes a substantial part of the discussion to what he sees as Hindutva intellectuals successfully repurposing academic vocabulary, decoloniality, indigeneity, postmodern multiplicity of truth, that originated in Western critical theory, and using it to attack constitutional secularism and Islamic universalism as themselves foreign impositions. He names J. Sai Deepak's India That Is Bharat trilogy, Rajiv Malhotra's "Breaking India" framework, and the temple-history work of Meenakshi Jain and Vikram Sampath as examples of this method, and argues that without a clearly defined ethics, history and account of who actually counts as indigenous, the category of decolonisation becomes infinitely elastic and easily weaponised. He is equally critical of the Muslim intellectuals and activists who adopted decolonial language without, in his view, working out who the framework was meant to serve in a context this layered. He also pushes back on one specific piece of that Hindutva historiography: the use of Shah Waliullah's eighteenth-century letter urging Ahmad Shah Abdali to intervene against Maratha and Jat power as supposed proof of an anti-Hindu Muslim conspiracy, pointing out that Waliullah's own writing does not use the word Hindu, that the conflict was over Mughal sovereignty rather than religion, and that Hindu rulers of the period wrote comparable appeals to Abdali for their own reasons.
The episode closes with Javed turning from analysis to strategy. He argues Indian Muslims need to move out of what he calls a "victim psychology" without denying real victimhood, framing the Prophet Muhammad's Meccan period as a model of a persecuted community that nonetheless articulated universal, not merely sectarian, claims. Practically, he argues for issue-based alliances with Dalits, OBCs, the left and feminist movements rather than assuming a single natural coalition exists, and for translating Islamic economic and social principles, zakat as a wealth tax, the critique of exploitative interest, an existing tradition of legal pluralism, into a vocabulary that can appeal beyond the Muslim community rather than being framed as sectarian demands. His sharpest criticism is reserved for the community's own leadership structure, which he describes as gerontocratic forums dominated by people in their seventies and eighties, with no visible pipeline of Muslims in their twenties, thirties or fifties being trained and empowered to lead. The episode ends with an invitation to viewers to suggest topics for the series going forward, and a promise that the strategic questions raised here, particularly around alliance-building, will be taken up at greater length in a future episode.
15:23This is an excerpt from a longer conversation. Full Video: https://www.youtube.com/watch?v=EPlSNwXgcTk&t=233s
6:43This is an excerpt from a longer conversation. Full Video: https://www.youtube.com/watch?v=EPlSNwXgcTk&t=233s
56:39In the first episode of Emerging Perspectives, Sania Ismailee joins Wardah Beg for a conversation about the philosophical questions that lie beneath India’s debate on the Uniform Civil Code. For eight years, through her PhD research, Sania examined the UCC through the questions of secularism and …
1:13:08How independent is the judiciary in India today? And what happens when citizens begin to lose confidence in the institutions meant to protect their rights?
2:44:36In this conversation, Dr. Harish S. Wankhede joins Ali Javed to examine the political and cultural legacy of Dr. B.R. Ambedkar and the evolution of the Dalit movement. They discuss how Ambedkar imagined Dalits as political subjects at a time when they were denied even basic human dignity, and how…
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