Nous Podcast· 15 Aug 2026· 1:14:03

Muslims Against Partition: The History India Chose to Forget | Dr. Shamsul Islam

In this thought-provoking conversation, Dr. Shamsul Islam discusses his book Muslims Against Partition of India with senior journalist Bushra Khanum. The discussion revisits the overlooked contributions of patriotic Indian Muslims who opposed the Two-Nation Theory and supported a united India. It…

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अल्लाह बख्श की जो तकरीर है अल्लाह बख्शसाहब की जो तकरीर है मैं उसके कुछहिस्सेसात पढ़कर सुनाऊंगा आपको वो आजयूनिवर्सिटीज में पढ़ाए जाने चाहिए थेजमीयत उल उलमा ने जो टू नेशन थरी के खिलाफछोटे-छोटे एक-एक आने के किताबें निकाली वोआज यूनिवर्सिटी का हिस्सा होना चाहिए थे।क्या वो मुस्लिम लीग उस वक्त के क्या तमाममुसलमानों का रिप्रेजेंटेटिव था? क्या वोउनकी आवाज था? कोई जवाब देने की जरूरतनहीं है। उल्टा उल्टा पूछिए आरएसएस वालोंसे जो लोग हिंदुत्ववादी ये सवाल [संगीत]कर रहे हैं कि आपने भारत की आजादी मेंक्या रोल अदा किया? तुम्हारे बीच में सेकोई भगत सिंह क्यों नहीं है? तुम्हारे बीचमें से कोई अशफाक उल्लाह क्यों नहीं है?क्या आपको ये लगता है कि आज के इस दौर मेंमुसलमानों को अपनी उन उस सुनहरी तारीख कोरिक्लेम करने की जरूरत है।जब नेताजी आजाद हिंद फौज बना रहे थेजिसमें हिंदू, मुसलमान, सिख सब थे। और येनेताजी वो थे जो जानते थे कि वंदे मातरमकितना झगड़ा करा रहा है। इसलिए उन्होंनेजय हिंद रखा था क्योंकि वंदे मातरम एक ऐसेनवेल से जुड़ा हुआ है जो मुसलमानों केकत्लेआम की बात करता है।आजाद मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के रोल को आप किसतरह से देखते हैं और उसका जिक्र जो है वोतारीख में उस तरह से क्यों नहीं मिलता है?राज किसने किया मुगलों के राज में,मुसलमानों के राज में, हिंदुओं की ऊंचीजातियों ने। तो हमसे क्या सवाल पूछते होभाई? हमसे क्या हिसाब चाहिए? हिसाब तोइतिहास और आने वाली पीढ़ियां तुमसे करनेजा रही हैं।पार्टीशन की जिम्मेदारी सिर्फ मुस्लिम लीगपर डाल देना। क्या यह सही है? या फिर आपइसको मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा दोनोंमें बांटते हैं? भाई परमानंद जो कांग्रेसके भी लीडर हैं, हिंदू महासभा के लीडर हैऔर बाद में आरएसएस के भी लीडर हैं। पहलीबार भारत के पार्टीशन का जो प्लान है वोभाई परमानंद पेश कर रहा है।1857 जो गदर है जहां पर ये कहा जाता है किमुसलमान मुसलमानों ने अपने खून से सड़कोंको एक तरह से रंग दिया था।हिंदू सिखों ईसाइयों के साथ। मुसलमानों कीबात मैं इसलिए कह रही हूं क्योंकि सबसेज्यादा सवाल अभी मुसलमानों की ही उबुलवतनी पर मुसलमानों पर ही उठाए जा रहे[संगीत] हैं। उनकी तारीख को पैरों तलेरौंदा जा रहा है। नाउ में हम डाटा औरग्राउंड रियलिटीज के जरिए वो स्टोरीज आपकेसामने [संगीत] लाते हैं जिन्हें अक्सर दबादिया जाता है या गलत तरीके से पेश कियाजाता है। हम एक इंडिपेंडेंट प्लेटफार्महै। यानी हमारे पीछे किसी तरह की कोईकॉर्पोरेट बैकिंग नहीं [संगीत] है। हमारीअसली ताकत आप हैं। अगर आप चाहते हैं किऐसी सच्ची और जरूरी स्टोरीज लगातार आपकेसामने आती रहे, तो हमारी वीडियोस को आपज्यादा से ज्यादा शेयर करें, चैनल कोसब्सक्राइब करें और अगर आपके लिए मुमकिनहो तो स्क्रीन पर दिए गए क्यूआर कोड केजरिए आप हमें सपोर्ट करें ताकि हम यूं हीआपके सामने स्टोरीज लाते रहें और यूं हीकाम करते रहें।आदाब न्यूज़ नेटवर्क देख रहे हैं आप। मैंहूं आपके साथ बुशरा खानम फहाद। देश जब80वां आजादी का जश्न मना रहा है तो जेहनमें बहुत सारे सवाल उठ खड़े होते हैं।सवाल यह कि क्या आजादी का मतलब सबके लिएएक जैसा है? क्या वाकई में हम सब इक्वलीआजाद हैं? क्या वो मुसलमान जिसके हुकूकदिन रात उससे छीने जा रहे हैं। जिसको मजहबके नाम पर लिंच किया जा रहा है। जिसका वोटदेने का अधिकार उससे छीना जा रहा है।जिसके घरों को बुलडोज किया जा रहा है। वोआदिवासी जिसके चेहरे पर पेशाब किया जा रहाहै। वो दलित जिसके दलित होने पर उससे उसकाजीने का हक तक छीना जा रहा है। क्या वाकईमें हम कह सकते हैं कि हम सब इक्वली आजादहैं। यह एक बड़ा सवाल जहन में खासतौर परइन 12 सालों की बीजेपी आरएसएस की सत्ता केबाद जेहन में लगातार आते हैं। इस पर तो हमबात करेंगे ही लेकिन आज जिस बहुत अहम मौजूपर हम बात करने जा रहे हैं वो है कि आजादीमें मुसलमानों का रोल और आज के जो मेरेमेहमान हैं उनको आप बहुत बखूबी जानते हैं।उनको उनकी बेबाकी को आप बहुत पसंद करतेहैं। जो फैक्ट्स वो आपके सामने रखते हैं,वह लोगों को लाजवाब कर देते हैं और उनकीउन्होंने 30 से ज्यादा किताबें लिखी हैं।पॉलिटिकल साइंस के वो चार दशक प्रोफेसर वोरहे हैं। आरएसएस को लेकर जितनी बखियांउन्होंने उधेड़ी है शायद ही किसी ने इसदेश में वो काम किया हो और जो उनकी किताबहै मुस्लिम्स अगेंस्ट पार्टीशन ऑफ इंडियाउस पर आज हम खासतौर पर बात करने जा रहेहैं। मुसलमानों के रोल की हम बात करने जारहे हैं। हम बात करेंगे मुस्लिम लीग केरोल की, हिंदू महासभा की, हम बात करेंगेटू नेशन थ्यरी की। क्या तमाम देश केमुसलमान जब 1947 में बंटवारा हो रहा था,क्या सब पाकिस्तान जाना चाहते थे? क्या सबपाकिस्तान के फेवर में थे? और अगर नहींथे, जो यहां पर रह गए तो उनकी हुब्बुलवतनी पर हर रोज क्यों सवाल उठाए जाते हैं?80 बरस बीतने के बाद भी क्यों मुसलमानोंको ये बताना पड़ता है कि हमने इस्लामिकपाकिस्तान नहीं बल्कि हिंदुस्तान को चुनाथा। क्यों हर दिन उनसे कभी राष्ट्रगीत केनाम पर कभी राष्ट्रगान के नाम पर उनसेतरह-तरह के सवाल क्यों पूछे जाते हैं? आजइसी के इर्द-गिर्द हम बात करेंगे और मैंबात कर रही हूं जो हमारे मेहमान है उनकामैं वेलकम करूंगी। डॉक्टर शमसुल इस्लामसाहब जाना माना चेहरा है शमसुल इस्लामसाहब। बहुत-बहुत इस्तकफाल वेलकम वेलकम टूनाउ नेटवर्कजी बहुत शुक्रिया बशरा साहिबामैं अपने पहले सवाल के साथ आपसे शुरुआतमें करना चाहूंगी शमसुल इस्लाम साहब औरमैं ये भी कहना चाह रही थी कि आपके किताबके जो हीरो हैं अल्लाह बख्श मुझे लगता हैबहुत चंद लोग ही होंगे इस देश में जिन्हेंउनके बारे में उस तरह से पता होगा जिस तरहसे आपने अपनी किताब में उसको मेंशन कियाहै और मैं शायद गलत नहीं होंगी कि वो आपकीकिताब के एक तरह से हीरो हैं। मेरा पहलासवाल यह है आपसे कि जब आप 1947 को देखतेहैं और 80 बरस के बाद आप आज के जोहिंदुस्तान को देखते हैं उसमें मुसलमानोंके रोल को आजादी में आप किस तरह से देखतेहैं और जो आपने इस किताब में ये कहा है किजो तमाम मुसलमान जो हैं वो पाकिस्तान केया अलग देश के पक्ष में नहीं थे। वो कौनसे मुसलमान थे और जो पक्ष में नहीं थे वोक्या चाहते थे और जो पक्ष में थे वो क्योंथे पक्ष में?बहुत शुक्रियामिश्रा जी। आपने असल में जो इंट्रोडक्शनमें जो कहा था उसमें बहुत बहुत संजीदासवाल आपने उठाए हैं। मैं पहले उसको थोड़ारिस्पोंड करना चाहता हूं। असल में आपने यहबताया और बहुत बहुत ही होरेंडस सिचुएशनहै। बहुत ही बहुत ही खतरनाक सिचुएशन है किइस देश के मुसलमानों को कि वो हुब्बुल वतनहै यानी पेट्रियोट है नहीं और हिंदुस्तानसे वो प्यार करते हैं नहीं। इसकाइसके बारे में उनका इम्तिहान उनको कटघरेमें खड़ा किया जा रहा है। यह यह बिल्कुलयह मत करिए। कोई जवाब देने की जरूरत नहींहै। उल्टा उल्टा पूछिए आरएसएस वालों से जोलोग हिंदुत्ववादी ये सवाल कर रहे हैं किआपने भारत की आजादी में क्या रोल अदाकिया? 1925 में आरएसएस बनती है। उससे औरथोड़ा पहले हिंदू महासभा बन जाती है। जोआज ठेकेदार जिनकी औलाद इस देश पर राज कररहे हैं। वो हमको बताएं। सन 1925 के बादमें आपने जो स्वतंत्रता आंदोलन हुआ उसआंदोलन में जैसे बहुत अहम है। नॉन कोपरेशनमूवमेंट है। उसके बाद नमक सत्याग्रह है।उससे पहले खिलाफत मूवमेंट है। उसके बादक्विट इंडिया मूवमेंट है। और ये क्विटइंडिया मूवमेंट का 84वावर्ष चल रहा है। यानी यह जो हफ्ता है यहवो हफ्ता है जब पूरे देश के अंदर कत्लेआमहो रहा था। क्योंकि गांधी जी के नेतृत्वमें मौलाना आजाद के नेतृत्व में कांग्रेसने एक फैसला किया था। अंग्रेजों भारतछोड़ो। अंग्रेजों भारत छोड़ो। आरएसएस नेनहीं नारा दिया था। हिंदू महासभा ने नारानहीं दिया था। कांग्रेसियों ने दिया था।मौलाना अबुल कलाम आजाद ने दिया था। नेतानेताजी सुभाष चंद्र बोस ने दिया था। सरदारपटेल ने दिया था। तो हमने सबसे पहले सवालपूछना है इन हिंदू हिंदू धर्म के औरहिंदुओं के ठेकेदारों से हो ये रहा है किउल्टी गंगा बह रही है और हम एकदम हमसे कहाजाता है तुम इसका जवाब दो और हम दे लेतेहम हमने काउंटर सवाल पूछना है हमने काउंटरसवाल पूछना है कि सन 1942 हुआ उसके बादबहुत सारे जो तहरीक मैंने बताई वो हुआइसमें आरएसएस ने क्या रोल अदा किया आज वोहमसे कह रहे हैं कि तिरंगा झंडा लहराओतिरंगा करो क्या क्या ये देश जानता जानताहै कि 14 अगस्त को अंग्रे जो इनकाअंग्रेजी का अखबार था उसने अंग्रेजी केअखबार ने तिरंगे झंडे पर 14 अगस्त 1947 कोलिखा। मैं पहले क्योंकि अंग्रेजी का अखबारहै। उसका अंग्रेजी पढ़कर सुना रहा हूं।उसका उर्दू तर्जुमा हिंदुस्तानी तर्जुमारखूंगा। द पीपल हु हैव कम टू पावर बाय दकिक ऑफ फट मे गिव इन आवर हैंड्स द ट्राईकलर। बट इट नेवर बी रेस्पेक्टेड एंड ओनबाय हिंदू। द वर्ड थ्री इज इन इटसेल्फ एनइविल एंड अ फ्लैग हैविंग थ्री कलर्स विसर्टेनली प्रोड्यूस अ वेरी बैडसाइकोलॉजिकल इफेक्ट एंड इज इनस टू अकंट्री। जो किस्मत के दाव से हिंदुस्तानमें पावर में आ गए हैं वो इस देश केहिंदुओं के हाथ में तिरंगा झंडा थमानाचाहते हैं। तिरंगे झंडे में तीन रंग हैइसलिए ये मनूस है। उन्होंने अंग्रेजी शब्दइस्तेमाल किया इस एन इविल। वर्ड थ्री इजएन इविल। और हिंदू इसको कभी मंजूर नहींकरेंगे और इनके लिए बड़ा मनोवैज्ञानिकबड़ा साइकोलॉजिकल खराब असर डालेगा। आज वोमुसलमानों से कह रहे हैं तिरंगा झंडाफहराओ तिरंगे झंडे से तुम प्यार नहींकरते। ये तो हमने गिरेबान पकड़ कर उनसेपूछ रहे हैं कि तुम ये बताओ तुमने ये कियाथा और आजादी की लड़ाई में तुम अपना एकआदमी बताओ जिसका नाखून कटा हो। आजादी कीलड़ाई में। वंदे मातरम की तुम बात करतेहो। वंदे मातरम तुमने अंग्रेजों के खिलाफदशहरे के दिन सन 1925 से लेकर सन 1947 तकतुमने कभी यह अपनी प्राइवेट मीटिंग्स मेंवंदे मातरम का नारा तुमने लगाया हो तोहमको बताइए और हमारा जो हम हम जिसमुसलमानों की विरासत से आते हैं वो एक तोये है कि ये ये बात करना हमसे बंद करें किसब मुसलमान सब मुसलमान अरे वो मुसलमान जोइस देश के खिलाफ थे वो मुसलमान जोअंग्रेजों के दलाल थे जो इस देश की आजादीनहीं चाहते थे आरएसएस वालों इस देश पर राजकरने वालों वालों मोदी के दोस्तों मोदी केकुबे वालों उनके साथ तो तुम सरकारें चलारहे थे मुस्लिम लीग के साथ मिलकर क्विटइंडिया मूवमेंट इसी आज के दिन 84 साल पहलेआप मुस्लिम लीग के साथ सिंध के अंदर आपबंगाल के अंदर आप नॉर्थ वेस्टर्न फ्रंट केअंदर सरकार चला रहे थे आप जब नेताजी आजादहिंद फौज बना रहे थे जिसमें हिंदू मुसलमानसिख सब थे और उसके दो लीडिंग कमांडर जो थेवो मुसलमान थे और ये नेताजी वो थे जोजानते थे कि वंदे मातरम कितना झगड़ा करारहा इसलिए उन्होंने जय हिंद रखा था। वंदेमातरम को हटा दिया था उन्होंने वंदे मातरमसबको क्योंकि वंदे मातरम एक ऐसे नवेल सेजुड़ा हुआ है जो मुसलमानों के कत्लेआम कीबात करता है। उसको हटाकर उन्होंने कहा थाकि आजाद हिंद बोलेंगे हम जय हिंद बोलेंगे।जी तो आप उनकी जिन जो गद्दार मुसलमान थेजो इस देश के खिलाफ थे उनसे तो आपकीदोस्ती थी। जिन्हा के साथ तो सावरकर साहबकी मीटिंग होती थी और वो यह कहते थे कि हमएक हैं। हम हम एक है तो हम मुसलमानों सेअगर आपने हिसाब करना है तो हम ये बताएंगेकि हमने आजादी की लड़ाई में कैसे हिस्सालिया था और वो बहुत बहुत गोल्डन है। वोबहुत शानदार है और ये 15 अगस्त 1947 कीआजादी नहीं 1857 की जंग आजादी में हमबताते हैं कि मुसलमान उस वक्त में 25% थे1947 में। सरकारी सरकारी डाटा है 25% ऑफ दमुस्लिम्स और उसमें अंग्रेजों के दलालमुसलमान थे लेकिन जो मुसलमान लड़े वो 40%मार्टायर्स हैं 1857 की लड़ाई में 1857 कीलड़ाई में तो और वो उस पर हम हम बुशरा जीहम बात करें जरा 1857 में मुसलमानों नेक्या किया था मुसलमान कैसे हिंदूमुसलमानों के कंधे से कंधा मिलाकर ये देशका कोई इंच नहीं है जिसको उन्होंने अपनेखून से सैराफ नहीं किया मेरे पास उस जमानेके दस्तावेज हैं। मैं मैं प्राइमरीप्राइमरी सोर्सेस पर बात करता हूं। तो1857 अगर आप बात करें मैं आपको चप्पाचप्पा बताऊंगा हिंदू मुसलमान सिखों नेईसाइयों ने मिलकर क्या किया इस देश के लिएऔर आरएसएस जो रजवाड़े जिन्होंने अंग्रेजोंसे दलाली की थी जो मुसलमान रजवाड़ेजिन्होंने दलाली की थी वो मुस्लिम लीग मेंगए या हिंदू महासभा में गए वो सारे गद्दारराज्य और रजवाड़े वो1857 के बाद उन्होंने अंग्रेजों की दलालीही की और उसके बाद 20वीं शताब्दी में वोसारे सारे आरएसएस हिंदू महासभा और मुस्लिमलीग बनवायजी बिल्कुल लेकिन मैं अगर इस इस सवाल परआपके पास आऊं कि जब हम 1947 की जब हम बातकरते हैं और बंटवारे की बात करते हैंक्योंकि 1857 की बात करना भी बहुत जरूरीहै और मैं सवाल पर आपके आपके साथ आऊंगी औरमेरे जेहन में वो तमाम सवाल हैं। लेकिन जबहम 47 की बात करते हैं आप ये कह रहे हैंकि मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा जो है वोबिल्कुल एक ही थाली के चट्टे बट्टे थे औरआप ये कह रहे हैं कि उन्होंने ही दरअसल येबीज जो है वो पार्टीशन का बोया लेकिन जेहनमें फिर एक सवाल ये आता है शमसुल इस्लामसाहब कि अगर ये ऑप्शन दिया गया था उस वक्तकि भाई अगर आप पाकिस्तान जाना चाहते हैंतो चले जाए और जो लोग हिंदुस्तान रहनाचाहते हैं वो हिंदुस्तान रह जाए। जो लोगपाकिस्तान चले गए क्या आप उनको गद्दारबोलेंगे? नहीं वो असल में वो तो उनसे पूछाजाए मैं कौन बताऊं वो जो छोड़कर गए क्योंगए और उसमें उसमें इस तरह के इस तरह केसबूत है कि उसमें बहुत सारे लोग वो थे जोमुस्लिम लीग के साथ थे बहुत सारे सबूत हैजिसके अंदर उनको मजबूर होकर जाना पड़ाक्योंकि जिस तरह से यहां पर दो दो फर्सेसकाम कर रही थी एक तो आरएसएस के गुंडे औरहिंदू महासभा के गुंडे इलाकों को खाली करारहे थे उसमें कहीं दूर नहीं जाना है यूपीका जो पहला होम सेक्रेटरी था यूपी के जोपहले होमराजेश्वर दयाल उनकी जीवनी है लाइफ लाइफ ऑफअ टाइम उसको पढ़िए कि गोलवालकर खुद किस तरहसे वेस्टर्न यूपी में एक पूरा का पूराबस्ता भरकर संदूक भरकर बस्ता नहीं संदूकभरकर टिन जो चादर का टिन होता था उसमेंभरकर एक एक गांव एक एक मोहल्ले का उसनेमुसलमान का नक्शा बनाकर उनको खात्मा करनाथा वो तो बीबी जेटली जो डीआईजी थे उसजमाने के वो किस तरह से उसको पकड़ कर औरकिस तरह से उन्होंने उसको नाकाम किया था।उसके बाद आप आप आरएसएस के लोगों केजिन्होंने आरएसएस छोड़ी उनकी किताबें हैं।उनके उनकी आपबीतियां हैं के किस तरह सेआरएसएस ने आरएसएस ने मुसलमानों के खिलाफमुसलमानों को आम मुसलमानों की हत्याएं की।उनके साथ बलात्कार किया। सरदार पटेल नेसरदार पटेल ने लिखा है गोलवलकर को सितंबर1948 में के हिंदुओं की हिफाजत करना एकबात थी और आम मुसलमानों से आम मुसलमानोंके कत्ल करना उनको बलात्कार करना उनकोमारना वो कोई काम वो कोई इंसानियत का कामनहीं था तो ये क्यों गए हम क्यों नहीं गएपर बुनियादी सवाल ये है कि हम जोहिंदुस्तानी जो हिंदुस्तान के अंदर रहतेहैं वो तो हमारा इस देश के साथ सिर्फ येनहीं है कि हम इस देश के नागरिक है।हालांकि अभी तो नागरिक कौन है? मोदी भीनागरिक है नहीं है। कोई नहीं जानता हैक्योंकि डॉक्यूमेंट जिस तरह के चाहिए परसवाल ये है सवाल ये है कि हमारा रिश्ता तोहमारा रिश्ता तोजब से है जब से पहली आजादी की लड़ाई लड़ी।और दूसरी बात मैं बताना चाहता हूं कि यहदुनिया का एकमात्र देश है जहां पर 1000साल जो आरएसएस वाले बोलते हैं मुसलमानोंने 1000 साल राज किया ठीक है जी 1000 सालराज ये 1000 साल राज है जिसके अंदर ये देशउन हुक्मरानों के मजहब का नहीं हुआ क्योंनहीं हुआ क्योंकि हिंदुओं की ऊंची जातियोंने यहां जो मुगल आए या उससे पहले गुलाम आएया उससे पहले सल्तनत आई उससे रोटी बेटी कारिश्ता किया हिंदुस्तानी मुसलमानों काउससे कोई लेना देना नहीं था। हिंदुस्तानीमुसलमान 1000 साल के मुसलमानों के राज मेंगरीब ही रहे, कमेरे ही रहे,हाथ के कारीगर ही रहे। राज किसने कियामुगलों के राज में, मुसलमानों के राज में।हिंदुओं की ऊंची जातियों ने। तो हमसे क्यासवाल पूछते हो भाई? हमसे क्या हिसाबचाहिए? हिसाब तो इतिहास और आने वालीपीढ़ियां तुमसे करने जा रही हैं। तुमसेकरेंगी। हमारा हमारा जो रिश्ता है अगर अगरमौका रहेगा और जैसा बुशरा जी ने फरमाया हैकि 1857 में मुसलमानों ने क्या किया था वोवो जानिए। जी बिल्कुल सवाल ये है मेराआपसे प्रोफेसर शमस इस्लाम साहब कि क्याकुछ इंटेलेक्चुअल्स ही थे जो ये चाहते थेकि ये मजहब के नाम पर पार्टीशन ना हो याआप ये कह रहे हैं कि एक बड़ा तबकामुसलमानों का ये चाहता था कि किसी भी कीमतपर ये बंटवारा ना हो और मौलाना आजाद काजिक्र होता है कि किस तरह से उन्होंनेसीढ़ियों पर खड़े होकर ये कहा था कि तुमअपने वतन को छोड़कर क्यों जा रहे हो येतुम्हारा वतन है तुम यहीं पर रहो। औरदूसरा सवाल मेरा ये कि जो मुस्लिम लीग कीजो बात होती है क्या वो मुस्लिम लीग उसवक्त के क्या तमाम मुसलमानों कारिप्रेजेंटेटिव था? क्या वो उनकी आवाज था?अगर अगर जरा सा भी इतिहास कोई जानता है।अच्छा एक मैं ये मौलाना आजाद की बहुतइज्जत और उसके साथ मैं आपको बताना चाहताहूं कि मौलाना अबुल कलाम आजाद को कांग्रेसने यूज़ किया पार्टीशन का प्रस्ताव मुंहकरने के लिए जो उन्होंने मना कर देनाचाहिए था। सारी बात मतलब लेकिन मुसलमानोंके और बड़े लीडर थे जो आखरी दम तक हथियारनहीं डाले और ना देश छोड़ कर गए सब कुछलुटा दिया यहां पर सब कुछ लुटा दिया तो वोअसल में व्यक्तियों की बात नहीं एक आंदोलनथा मार्च 23 23 24 मार्च को मुस्लिम लीगने पाकिस्तान रेजोल्यूशन पास किया लाहौरके अंदर वो लाहौर का रेजोल्यूशन जो एल केआडवाणी साहब सलाम करने गए और जिन्ना साहबको उन्होंने कहा कि ये बहुत बहुत महानलीडर थे मुसलमानों के। वहां सिजदा करने गएथे वो। तो येतीन हफ्ते के अंदर दिल्ली के अंदरहिंदुस्तान के मुसलमानों ने और मुसलमान भीआप देखिए उस वक्त क्या था? शिया सुन्नी काबहुत झगड़ा था। सुन्नियों के अंदर अहलेहदीस और सुन्नियों का हफियों का झगड़ा था।सारी की सारी ये तंजीमे एक हो गई। सारी कीसारी तंजीम हो गई। अल्लाह बख्श साहब जिनकाआपने जिक्र किया मुझे लगता है कि इस देशकी बदकिस्मती है सबने भुलाया मुस्लिम लीगने तो भुलाना ही था है ना उन्होंने तोमरवाया ही उनको मई 14 मई 1943 को उनकाकत्ल कराया जैसे गांधी का कत्ल यहांआरएसएस के लोगों ने कराया था तो वो उसकेजवाब में जो मुसलमान ऑर्गेनाइजेशंस जुटीजरा मैं उसका नाम अगर आप इजाजत दे तो नाममैं बता दूं उन तंजीमों काबिल्कुल बिल्कुलजी उन तंजीमों का नाम था। जीसुन लीजिए ये मुसलमानों का देश का सबसेबड़ा कहते हैं सबसे बड़ा उस वक्त जोअंग्रेजी के अखबार थे खासतौर पर अंग्रेजअंग्रेजों और मुस्लिम लीग का वो अखबार थाउनको फेवर करने वाला द स्टेट्समैनकोलकाता से निकलता था। दिल्ली से निकलताथा। इसमें कौन-कौन थे? ऑल इंडिया जमीतुलउलमा ऑल इंडिया मोमिन का्फ्रेंस ऑल इंडियामजलिसरार ऑल इंडिया शिया पिटिकलकॉन्फ्रेंस पहली बार हिंदुस्तान के इतिहासके अंदर शिया और सुन्नी ऑर्गेनाइजेशन एकसाथ आ रहे थे खुदाई खिदमतगार बंगाल कृषकपरजा पार्टी ऑल इंडिया मुस्लिमपार्लियामेंट्री बोर्ड द अंजुम वतनबलचिस्तान ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस जमतअहले हदीस इन्होंने तीन हफ्ते के अंदर तीनहफ्ते के अंदर 27 से 30 अप्रैल के बीच मेंदिल्ली दिल्ली में आजाद मुस्लिमकॉन्फ्रेंस की। आजाद मुस्लिम कॉन्फ्रेंसजिसके बारे में अगर आप जानेंगे बदकिस्मतीसे अपने आप को मुसलमानों के रिस्चर कहनेवाले किसी ने बात नहीं की। किसी ने चर्चानहीं की। ये इसमें ऐसा नहीं था कि कोई भीइसमें आ सकता था। इसमें यूनाइटेड प्रोविंसजिसको आज यूपी कहते हैं उसमें 357 डेलीगेटआए। पंजाब से 155 डेलीगेट आए। बिहार से125 आए। बंगाल से 105 आए। नॉर्थ वेस्टर्नफ्रेंड से 35 आए। सिंध से 82 आए,बलचिस्तान से 45 आए, मुंबई से 60 आए।सेंट्रल प्रोविंस जहां मध्य प्रदेश से 12आए, मद्रास से पांच आए, उड़ीसा से पांचआए, अजमेर, मेवाड़ से 12 आए। आसाम सेदिल्ली, आसाम से 25 आए, दिल्ली से 112 औरइंडियन स्टेट से 12 आए। और कांटवेलविलफ्रेड कांटवेल जो उस जमाने का कम्युनलपॉलिटिक्स का सबसे बड़ा सबसे बड़ाएक्सपर्ट है। उसने कहा कि ये मेजॉरिटी ऑफ़मुस्लिम्स को रिप्रेजेंट करता था।मेजॉरिटी ऑफ़ मुस्लिम्स को रिप्रेजेंट करताथा। क्यों करता था? क्यों करता था? आपनेएक जो सवाल था वो उसमें जो नेहा है मैंउसका जवाब दे रहा हूं। लोग ये कह रहे हैंकि मुस्लिम लीग मुसलमानों को रिप्रेजेंटकरती थी क्योंकि 1946 में उनको मेजॉरिटीसीट्स मिल गई थी मुसलमानों की। पर यहां यहजान लीजिए जिसको आरएसएस वाले छुपाते हैंजिसको मुसलमान सपोर्टर मुस्लिम लीग केकरते हैं के उस जमाने में 1935 की जो एक्टथा अधिनियम था उसके तहत सिर्फ देश के 8%से कम लोगों को वोट देने का अधिकार था।इनकम टैक्स पेयर, लॉयर, डिग्री होल्डर,बड़े-बड़े जमींदारसाहब लोग इनको वोट देने का अधिकार था। औरबिहार और बिहार औरयूपी उत्तर प्रदेश जो यूनाइटेड प्रोवसकहते थे। इसमें मुसलमान बहुत गरीब थे। तोमुसलमानों में तो ये चार से 5% लोगों कोवोट देने का अधिकार था। ये इस देश केईमानदार मुसलमान नहीं जानते जो दिन भरगाली खाते रहते हैं।मुस्लिम लीग चार से पांच% मुसलमानों कावोट लेकर क्योंकि उनको ही वोट देने काअधिकार था। समझ लीजिए इसको। हम हम वोटदेने वाले नहीं थे। मेरे बाप जो जो एक नाईमेरा खानदान जो एक नाई परिवार से आता हैवो नहीं था। इसके अंदर जुलाहों के मां-बापनहीं थे। जो उस जमाने में रह रहे थे।लोहारों के मुसलमान लोहारों के मां-बापनहीं थे। उस उस चुनाव के अंदर उस चुनावमें वो लोग थे जिन्होंने मुस्लिम लीगबनाई। यह वो लोग थे जिन्होंने हिंदूमहासभा के साथ सरकारें चलाई। हमारा कोईलेना देना नहीं था उससे। बहुत इंपॉर्टेंटबात है ये कि कौन लोग उस वक्त वोट कर सकतेथे और उसके बिना पर पूरी तारीख जो है वोलिखी गई है कि जब चंद फीसदी जब वोट करसकते थे तो क्या मुस्लिम लीग सिर्फ उनहींचार से पांच फीसदी मुसलमानों कारिप्रेजेंटेशन कर रही थी जिसको ये कह दियागया कि भ ज्यादातर मुसलमान जो है मुस्लिमलीग के साथ थे और उस दौरान आजाद मुस्लिमकॉन्फ्रेंस का जिक्र जो है वो नहीं कियाजाता है। मैं आपसे यह सवाल पूछना चाह रहीहूं कि आजाद मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के रोल कोआप किस तरह से देखते हैं और उसका जिक्र जोहै वह तारीख में उस तरह से क्यों नहींमिलता है जिस तरह से मुस्लिम लीग का याफिर हिंदू महासभा का इन तमाम चीजों काजिक्र होता है क्योंकि अगर मैं आपकी किताबको ना पढ़ती तो शायद मुझे भी उस बारे मेंउतना उतनी जानकारी नहीं हो पाती। देखिएमाफ कीजिएगा मैं जो इस देश के लेफ्टिस्टहिस्टोरियन है ना जो अपने आप को बहुत महानजिन्होंने एकेडमी पर कब्जा करके रखा मैंउनको इसके मुजरिम मानता हूं उन्होंनेऔरंगजेब कितना सेुलर था होगा वही सेुलरहोगा शाहजहां कितने सेुलर थे वो कितने थेये सब उन पर उन्होंने काम किया उन्होंनेइस पर काम नहीं उन्होंने सावरकर पर भी कामनहीं किया सावरकर सावरकर वीर है जिसने कमसे कम सात माफीनामे लिखे मैं जनाब आपकेबिगड़ा हुआ बेटा बेटा आपके दरवाजे पर आनाचाहता है। ये सब ये सब वो कर रहा है। हैना? पेंशन ले रहा है। ₹75 महीने की पेंशनले रहा है। जी वो उस पर भी जानते तो आजहमको ये आरएसएस का राज नहीं देखना पड़ताकि वीर वीर नहीं और वो अगर अल्लाह बख्श परकाम करते। आजाद मुस्लिम कॉन्फ्रेंस पर कामकरते। मैं आजाद मुस्लिम कॉन्फ्रेंस मेंक्या हो रहा था जो मैं अपने दादा से सुनाहै। अपने वालिद साहब से सुना है क्योंकिवो सदर बाजार के एक बिजनेसमैन थे। बिजनेसपरिवार था। उन्होंने क्या-क्या किया कि येजो है और उसके उसके फिर ये ऐसा नहीं है किकोई सेकंड सेकंड हैंड सेकंड सोर्स मटेरियलहै। ये उस जमाने के अखबार भरे पड़े हैं।हिंदुस्तान द टाइम्स ऑफ इंडिया स्टेट्समैनबॉम्बे क्रोनिकल हिंदी के सारे अखबार आजऔर दूसरे भरे पड़े हैं। भरे पड़े हैं।नेशनल एरर जी प्रताप उर्दू के अखबार जीसारे भरे पड़े हैं कि इसमें जो थे 5000लोग आने थे ये तीन दिन होना था 27 28 29अप्रैल को पता लगा इतनी बातों पर बात करनीहै 30 भी जुड़ गया 30 तारीख 500 का मजमाहोना था पता लगा एक लाख लोग आ रहे हैं येकहां हुआ पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन केसामने जो कंपनी भाग है वहां उसके बाद पतालगा कि इसमें 5000 औरतें आनी थी। पता लगा20,000 औरतें आ गई हैं।20,000 औरतें आ गई हैं। चार दिन कीकॉन्फ्रेंस में20,000 औरतें और उन्होंने जिन सवालों परबात किया वो सवाल यही थे। वो सवाल ये थेकि हमको जो कहा जा रहा है कि मुस्लिम लीगहम मुस्लिम लीग हमको रिप्रेजेंट करती है।उन्होंने कहा प्रस्ताव पास किया। अल्लाहबख्श की जो तकरीर है अल्लाह बख्श साहब कीजो तकरीर है मैं उसके कुछ हिस्सेसात पढ़करसुनाऊंगा आपको जी वो आज यूनिवर्सिटीज मेंपढ़ाई जाने चाहिए थे जमीयत उल उलमा ने जोटू नेशन थरी के खिलाफ छोटे-छोटेएक एक आने के किताबें निकाली वो आजयूनिवर्सिटी का हिस्सा होना चाहिए थेआरएसएस कभी पावर में नहीं आती अगरकांग्रेसी उसको कराते तो जमीतुल अहले हदीसजमात अहले हदीस ने जो कराया मोमिनका्फ्रेंस नेकराए बुनकरों का जो हमारे देश का सबसेबड़ा संगठन था। प्रस्ताव सबसे पहले डिस्कसकरते हैं कि अगर आप इस देश में एडल्टफ्रेंचाइज कर देंगे तो मुस्लिम लीग खत्महो जाएगी। एडल्ट फ्रेंचाइज का मतलब क्याहोगा कि जो भी वैशक है जो भी एडल्ट हैउसको वोट देने का अधिकार दिया। जो मिला जोसन 1952 के चुनाव में हमको मिला।तो उन्होंने कहा कि आप मुस्लिम लीग कोखत्म करना चाहते हैं तो आप एडल्टफ्रेंचाइज कर दीजिए। अंग्रेजों से कहामुस्लिम लीग खत्म हो जाएगी। कुछ करने कीजरूरत ही नहीं रहेगी।अच्छा उनके जो जो बातें की है जो सवालउठाए हैं जरा सा सुन लीजिए। कुछ कुछ इसकामैं आपको बताता हूं। और मैं मैं मेरी जोउर्दू वाली किताब है उससे लिया। मैं आपकोबताना चाहता हूं। ये मेरी जो किताब हैइसको मुसलमान दानिश्वर जो अपने आप कोदानिश्वर कहते हैं उन्होंने इसको बिल्कुलइसका इसका उनके पास जवाब नहीं हिंदुस्तानकी हर जबान के अंदर है पाकिस्तान में इसकेपाइरेटेड एडिशन है बांग्लादेश में इसकेपरेटेड एडिशन है बांग्ला बांग्ला में जीहमारे मजहबी अकायद ख्वा कुछ भी हो मगरहमें अपने मुल्क में पूरी तरह इत्तेहाद केसाथ रहना चाहिए हमारे आपसी ताल्लुकात ऐसेहोने चाहिए जैसे मुस्तका खानदान मेंअलग-अलग अकायद रखने वाले कई भाई और दूसरेलोग अपने अकायद के मुताबिक जिंदगी गुजारतेहुए बगैर किसी रोक-टोक के जी सके। येसिर्फ ये और ये फर्क उनकी मुश्तका जायदादके इस्तेमाल में कोई रुकावट पैदा ना करे।उसके बाद वो कहते हैं जरा भी खुद एतमादीऔर हकीकत का एहसास रखने वाला मुसलमान एकलम्हे के लिए भी इसे गवारा नहीं कर सकताकि उसे सियासी तौर पर कुर्बानी का बकराबनाया जाए। ये क्यों कह रहे हैं? क्योंकिमुस्लिम लीग ये कह रही थी और अंग्रेज किजनाब जब तक हिंदू मुसलमान का मसला हल नहींहोता है हम कैसे आजाद इसको दे सकते हैंमुसलमान कह रहे हैं कि अरे तुम दफा होयहां से तुम दफा हो जाओ हिंदू मुसलमान काहम तय कर लेंगे तुम यहां से चले जाओऔर हिंदू महासभा भी मुस्लिम लीग के साथ हैकि नहीं नहीं हम हिंदुओं को रिप्रेजेंटकरते हैं कांग्रेस नहीं करती है आपमुस्लिम लीग को रिप्रेजेंट करते हो जिन्नासाहब हम दोनों के बीच में समझौता होनाचाहिएसाफ कह रहे हैं उस और इसके नतीजे मेंसामने आने वाले नुकसान और अंजाम की वजह सेवह अपना और आने वाली नस्लों का मुस्तकबिलदांव पर लगाए हैं। और उसके बाद देखिए क्यासवाल उठाते हैं। उनकी प्रोफेसी देखिएबंगाल में क्या हुआ?पूर्वी पाकिस्तान का क्या हुआ? उसकाउन्होंने2000 2000 मील दूर था। दोनों देश वेस्ट औरईस्ट पाकिस्तान जो था उसके बारे मेंभविष्यवाणी जो की थी जरा सुनिए।जनाब अल्लाह बख साहब ने शमाल मशरिकपाकिस्तान का मुतालबा तो 10 गुना ज्यादाबेढंगा और 100 गुना ज्यादा नाजुक नाजुककमजोर है। 2000 मील दूर पर जो देश कि वोरहेगा ही नहीं रह ही नहीं सकता और 71 मेंसाबित हुआ कि वो रह नहीं सकता था। येअल्लाह बख्श ने और मुस्लिम कॉन्फ्रेंस ने19421940 में कह दिया था 9 करोड़ हिंदुस्तानीमुसलमान जो हिंदुस्तान की पेशतर वबाशिंदों की नस्लें हैं।वो दरावीों और आर्यों की तरह ही इस मिट्टीके बेटे हैं। मुल्क के दीगर बाशिंदों कीतरह इस मुस्तिक जमीन पर उनका भी हक है।मुख्तलिफ मुालिक के शहरी अपना अकायद बदलनेके साथ अपनी शरी अपनी शरीयत तब्दील नहींकरते। पूरी दुनिया में इस्लाम की तबबलीगहोने पर मुख्तलिफ मुालिक और सकाफतों सेवाबस्ता लोगों ने इसे कबूल किया। जैसा किसारी दुनिया में देखा गया है। उन्होंनेकहा कि हम जहां भी जाते हैं हमको हिंदीकहा जाता है। हमको हिंदी कहा जाता है। हमहज करने जाते हैं हमको हिंदी कहा जाता है।एक हिंदुस्तानी शहरी होने के नाते मुसलमानहिंदू व दीगर हिंदुस्तानी शहरी जो यहांरहते हैं। अपनी मादर वतन के हर इंच केहिस्सेदार हैं। अपनी मादर वतन और उसकीतमाम चीजों पर उसकी मादी और सकाफती विरासतपर यसा हक है। उन सब पर उनका जायज औरमुनासिब हुकूक और जरूरतों के हिसाब सेबराबर का हक है। अदब को ही देखें। देखिएकितनी कितनी डीपली उन्होंने स्टडी किया थाइंडियन कल्चर को। अदब को ही देखें तो सबनेमिलजुलकर उसकी अफजाइश की है। जैसे मुस्लिमतखलीकारों की तखलीक हीर रंझा और ससीपन्नों की कहानियां हिंदू और सिखों नेपंजाब और सिंध में दूर-दूर तक फैला दी। इसतरह की बहुत सारी मिसाले मौजूद है। बुशराजी अगर इस विरासत को हम जान लेते तोमुसलमान के साथ जो है वो नहीं होता। येदेश भी बच जाता। ये देश भी बच जाता। दूसरीबात उन्होंने क्या की कि ये जो जातिवाद हैइसको खत्म किया जाए। देखिए सबसे पहलेअंबेडकर से पहले की जो बात कर रहे हैं येवो ये कह रहे हैं मुसलमानों के अंदर ऊंचीजाति के मुसलमान जो कर रहे हैं वो ये हैकि मुसलमानों को दफनाने नहीं देते।मुसलमान कब्रिस्तान में और अगर कोई सरकारीदबाव और उसके बाद दफना भी दिया जाए तो उसपर पखाना मल देते हैं। ईस्टर्न यूपी औरबिहार के अंदर ये जो नीची जाति के मुसलमानअरजाल जो थे इनसे अरजाल टैक्स लिया जाताथा। अरजाल टैक्स क्या आप यकीन करेंगी? वोये बता रहे हैं कि मुस्लिम लीग जोमुसलमानों को रिप्रेजेंट होने की बात कररही है ये मुसलमानों से जो जो शरफा नहींहै जो अशराफ नहीं है उनसे किस तरह काबर्ताव करती है उसके बाद ये एक मांग करतेहैं जो आज भी हम मांग कर रहे हैं केसिलेबस की किताबों से जो मुसलमान और हिंदूनीची जातियों के बारे में जो मजाक उड़ानेके किस्से हैं उनको बाहर निकालो। यह सन1940 में मांग कर रहे हैं।दूरंदेशी उनकी और उनकाअफ्रीका में जो नस्लवाद है उसके खिलाफसाउथ अफ्रीका में नस्लवाद के खिलाफप्रस्ताव रेजोल्यूशन पास कर रहे हैं औरसवाल कर रहे हैं। सवाल कर रहे हैं जिन्नासाहब से खत लिख रहे हैं कि आपका पाकिस्तानकैसा होगा? आपका पाकिस्तान जो है वहांअनटचेबिलिटी रहेगी।वो आप ऊंची जाति के मुसलमानों को लेकर आपवहां बनाना चाहते हैं और वो साबित हुआ है।वो पाकिस्तान के साथ जो हुआ है वो साबितहुआ है जो आजाद मुस्लिम का्फ्रेंस के लोगजो कह रहे थे अच्छा और आप अगर इजाजत देंतो मैं मेरे उस्ताद भी रहे और आजादमुस्लिम का्फ्रेंस ने हिंदुस्तान की आजादीका जो तराना लिखा था जो तराना लिखा थाशमीम करानी साहब ने मुझे नहीं पता था किये वो शमीम करानी है जिनसे मैं पढ़ा हूंजिनसे मैं पढ़ा हूं लेकिन जोआजाद का्फ्रेंस में जो तराना रिलीज कियागया और वो सारे देश में फैल गया। वो आपचाहे आप अगर इजाजत हो तो सुना दूं।जी बिलकुल बिलकुल प्लीजमैं एमोबी के स्कूल में इनसे पढ़ा। मुझेनहीं पता था ये क्या शख्सियत है। मैं तोउनको रोज रोज सिजदा करता। हां लेकिन येदेखिए हमको बतलाओ तो क्या मतलब हैपाकिस्तान का। जिस जगह इस वक्त मुस्लिम हैनजस है क्या वो जहां। मैं सोचता हूं लोगसमझ रहे होंगे जो जो उर्दू नहीं समझते उनदोस्तों को मैं एक्सप्लेन कर दूंगाजीनजस का मतलब नापाक तो जहां मुसलमान रहतेहैं हिंदुस्तान में क्या वो नापाक जगह हैनेश तोहमत से तेरे चिश्ती का सीना चाक हैजल्द बतला क्या जमीन अजमेर की नापाक हैभाई पाकिस्तान का जो नक्शा उन्होंने पेशकिया था तो अजमेर तो नहीं था उसके अंदर तोवो क्या कह रहे हैं कि तू ये कह रहा हैजिन्ना मुस्लिम लीग के लोगों तुम ये कहरहे हो कि क्योंकि तुम पाकिस्तान तुमपाकिस्तान बना रहे हो तो यहां जो है जोअजमेर शरीफ है वो नापाक जगह हो गई। कुफुरकी वादी में ईमान का नमी नगीना खो गया।क्या खाके नज्म शाह मीना खो गया। शाह मीनाएक और एक और मशहूर सूफी का मजार है। दीनका मखदूम जो कलियर की आबादी में है। आउसका आस्ताना क्या नजवादी में है। कलियरशरीफ रुड़की के पास है। है इमामों के जोरोज़ लखनऊ के खाक पर बन गए। क्या तौबा तौबाख्ता नापाक पर बात ये कैसी कह दी तूने किदिल ने आह की क्या क्या जमीन ताहिर नहींदरगाह नूरुल्लाह की आ इस पाकीजा गंगा कोनचस कहता है तू जिसके पानी से कियामुसलमान शहीदों ने वजू आप देखिए क्या सिमक्या इस्तेमाल कर रहे हैं वो नामपाकिस्तान वाले अगर तुझको पास दीन है येगुजस्ता नस्ल मुस्लिम की बड़ी तौहीन हैटुकड़े-टुकड़े कर नहीं सकते वतन को अहलेदिल किस तरह तारा देखेंगे चमन को अहले दिलक्या ये मतलब है कि हम मेहरूम आजादी रहेमुनकसम होकर अरब की तरह फरियादी रहेटुकड़े-टुकड़े होके मुस्लिम खस्ता दिल होजाएगा नखले जमिया सरासर मुजमल हो जाएगा एकसवाल और उठाती है आजाद मुस्लिम का्फ्रेंसअगर मुसलमान एक कौम है तो हुजूर सल्लावसल्लम ने क्यों नहीं कहा वो कि सारीदुनिया के मुसलमान वो उम्मत की बात क्योंकरते हैं वो कौम की बात क्यों नहीं करतेऔर जो 25 26 मुसलमान देश हैं वो एक देशक्यों नहीं नहीं हैहमऔर देखिए वो हिंदू महासभा को भी कटघरे मेंखड़ी कर रहे हैं क्योंकि हिंदू महासभा कहरही है कि सारे देश सारी दुनिया के हिंदूएक है हम में से कितने लोग जानते हैं किसावरकर ने इंग्लैंड की महारानी को खत लिखाआप अगर भारत को छोड़ने का सोच रहे हैं तोइसको आजाद मत करिए इसको नेपाल के हुक्मरानेपाल के राजा को दे जाइए क्योंकि दुनियाके सारे हिंदुओं का राजा जो है नेपाल काकिंग है तो हिंदूवाद पर हिंदुत्व हिंदूहिंदू राष्ट्रवाद की पूरी पूरी थीसिस कोभी डिमोलिश कर रहे हैं और इनकी थीसिस कोभी डिमोलिश कर रहे हैं।बिल्कुल बहुत्ट आपने बात कही है और कईसवाल मेरे जेहन में फिर आपके इस पूरे जवाबके साथ मेरे जेहन में आए हैं। एक तो येमैं आपसे जानना चाहती हूं कि क्या जो टूनेशन थ्यरी है क्या इसके लिए आप सिर्फजिन्ना को जिम्मेदार मानते हैं? दूसरामेरा इसी से जुड़ा सवाल है कि आप हम अक्सरजो टू नेशन थ्योरी है उसको सीधे तौर परजिन्ना और मुस्लिम लीग से हम जोड़ देतेहैं। लेकिन आपकी जो किताब है वो इसेज्यादा कॉम्प्लिकेटेड पिक्चर दिखाती है औरअसल में टू नेशन थ्योरी की रूट्स कहां तकजाती है इसकी बात भी करती है। तो मैं एकतो आपसे यह जानना चाहती हूं और इसी में एकएक और चीज को मैं जोड़ रही हूं कि अक्सरये सवाल ये पैदा होता है और ये सवाल पूछाजाता है कि जब पार्टीशन हुआ और जबपार्टीशन की बात हुई जब पाकिस्तान को अलगकिया गया और हिंदुस्तान के जो मुसलमान हैजो रहना चाहते थे वो जब यहां पर रह गए तोक्या वाकई में ये इतना ब्लैक एंड वाइट थाकि जो मुसलमान जाना चाहते थे वो चले गए जोरहना चाहते थे वो रह गए क्या वाकई मेंउनके पास इतना साफ सुथरा ऑप्शन था जोहिंदू गए जो सिख गए पाकिस्तान में उन उनकोलेकर क्या और फिर एक और सवाल शमस साहब किमैं ये सवाल आपसे पूछना चाहती हूं कि जोनक्शा तैयार किया गया कि ऐसा होगापाकिस्तान और पाकिस्तान में ये तमाम चीजेंजाएंगी और ऐसा रह जाएगा हिंदुस्तान येकिसने तय किया कोई कंसेस कंसेस बना थाकिसी से राय मशवरा या कोई राय शुमारी कीगई थी ये कैसे आपने तय कर लिया कि हमनेइन्हें वहां भेज दिया और ये यहां रह गए।यह भी एक बड़ा ये भी एक बड़ा सवाल है। यहभी तो अंग्रेज बांट कर ही चले गए थे। यहभी तो वही तय करके गए थे।तो एक बहुत बहुत ही मजाक है दुनिया केइतिहास का। यानी इस कत्लेआम का जो कुछ हुआएक लाख से ज्यादा बच्चियों को रेप कियागया। उनको उधर रखा गया। मुसलमानों कोमुसलमान बच्चियों को यहां रखा गया। वहांसिख पाकिस्तान जो बना उसमें सिख और हिंदूऔर ईसाई बच्चियों को रोका गया।तो येभारत का जो बंटवारा है वो जून 1948 कोहोना था। उन्होंने एडवांस कर दिया। एडवांसकर दिया। एडवांस करने के बाद एक बंदे कोभेजा सर रेडक्लिफ सर रेडक्लिफ को पुरानेबोसीदा कोई 50 साल पुराने नक्शे उसको देदिए गए। 50 साल पुराने नक्शे दे दिए औरउसके बारे में जो बहुत दुनिया का अंग्रेजीका मशहूर एंग्लो अमेरिकन शायर एच ओडिन एचऑडिन ने जो लिखा है उसके भारत के बंटवारेको लेके जरा वो नज़म सुनना बहुत जरूरी है।जीऑडन ने रेडक्लिफ ने जो किया जरा उसका सुनलीजिए। उसकी नज़म को लंबी नज़्म में छोटाकरता हूं। अपने मिशन पर पहुंचने के वक्तवो कमस कम तासुब से मुबर रहा था। वोकम्युनल नहीं था। जिस जमीन की तकसीम केलिए उसे बुलाया था उसने देखा नहीं था।उसने कभी पागलपन से भरे दो लोगों केदरमियान पैदालाफात उनकी मुख्तलिफ देवीदेवता और उनके बेहद मेल खुदाओं के साथसमझाया लंदन में उसको कि अब बहुत कम बचाहै वक्त गुजर चुकी है बहामी रजामंदी यामुदलल सलाम मशवरे की घड़ी वायसराय सोचताहै जैसा कि तुम उसके खत से समझोगे जितनाकम इसके साथ नजर आओ बेहतर है सो हमनेतुम्हारे ठहरने का अलग इंतजाम कर दियामशवरे के लिए हम तुम्हें चार जज दे सकतेहैं जज दे सकते हैं दो मुसलमान दो हिंदूलेकिन आखरी फैसला तुम्हारी तुम्हारे दिनहोगा। तो उसके बाद क्या किया उसने? दिनरात पुलिस के साए में किसी संसान हवेलीमें बंद कातिलों को दूर रखने के लिए बागोंके बीच में पुलिस की निगरानी में उसनेकरोड़ों मुकद्दरों को तय करने का शुरूकिया। पुराने नक्शे थे उसके पास और मर्दमशुमारी के अदाद शुमार थे। गलत सलत पुरानेधुराने लेकिन वक्त नहीं था किसी के पासउनको जांचने का ना उस इलाके के मायने का।मौसम खतरनाक हद तक गर्म हो रहा था और इसेहाल की हाजत उसे मुसलसल दौड़ाती रहती थी।लेकिन सात हफ्ते में ही काम हो गया। सरहदखींच दी गई। एक बर्रे आजम भले बुरे के लिएतकसीम हो चुका था। अगले दिन वो इंग्लैंडके समंदरी रास्ते से निकल पड़ा। जहां वोजल्दी इस मामले को भूल सकता था। एक अच्छेवकील के लिए भी जरूरी है कि वो अब कभीनहीं लौटेगा। यानी नक्शा14 15 अगस्त को भारत आजाद भारत का बंटवाराहो गया। नक्शा दो महीने बाद आता है।कुरदासपुर को पाकिस्तान में होना था।इंडिया में हो जाता है। प्रीत प्रीत नगरएक बहुत मशहूर शहर है। छोटा सा शहर है जोजहांगीर जब लाहौर से कश्मीर जाता था तोउसका उसके ठहरने का अड्डा था। जहां हिंदूमुसलमान सिख मिलकर रहते थे। वहां पहलाहिंदू मुसलमानों ने साझा चूल्हा घर कापूरे गांव का एक ही चूल्हा होता था मिलकरबनाया था वो तीन बार अदा बंदी हुई आज शामको पता लगा पाकिस्तान में चला गया दो दिनके बाद पता लगा हिंदुस्तान में चला गयाफिर पाकिस्तान में चला गया इस अनारकी नेजो कत्लेआम को करवाया वो बहुत ज्यादा थाऔर उसके बाद मुस्लिम लीग के गुंडे जोमुस्लिम नेशनल गार्ड कहलाते थे और इधरआरएसएस के गुंडे और कुछ सिख सिख सेनाएं जोथी उनके उनके जो हत्यारे थे वो लोगों कोलोगों को मारने मारने के अंदर लगे थे।इसने जो जो किया यानी आपके पास कोई नक्शानहीं था, कुछ नहीं था और सच्ची बात ये हैके माउंटबेटन नेहरू की बहुत सारी बातेंमानी इसमें नेहरू की बहुत सारी बातें मानीऔर पाकिस्तान मुस्लिम लीग जो एक मुस्लिममेजॉरिटी प्रांतों वाला पाकिस्तान चाहताथा वो सब खत्म हो गया। मुस्लिम मेजॉरिटीवाले प्रांत भी इसको आधेआधे मिले। आधेआधेमिले लेकिन अंग्रेज इतने इतने क्या कहूंउनके बारे में कि उन्होंने ये किया किजिन्ना को सेटिस्फाई करने के लिए क्याकिया कि तुमपाकिस्तान से हिंदुओं और ईसाइयों को पूरासफाया कर दो।ये जो वेस्टर्न पंजाब के अंदर जो बहुतबड़े पैमाने हमारे यहां भी बहुत बड़ेपैमाने हुए लेकिन यहां डिफेंस किया गया।यहां गांधी थे दूसरे लोग थे। बहुत सारेबहुत सारे साधु होते जिन्होंने अपनेआश्रमों में मुसलमानों को पनाह दी।वहां ये इक्कादुक्का रहा। पाकिस्तान मेंइक्कादुक्का रहा। क्योंकि उन्होंने कहा किदेख भाई भैया तेरे साथ धोखा तो हमने करदिया लेकिन तू ज्यादा रो मत। तेरे को अभीहमको एक दलाल की तौर पर जरूरत है। लेकिनतुम अपने यहां से सिखों और हिंदुओं को तुमसफाया करा लो। [गला साफ़ करने की आवाज़]तो इन हालात के अंदर मैनमेड है ये। इसमेंकिसी किसी उन बेचारे इंसानों का तो कोईलेना देना ही नहीं है। और अभी बहुत दोअच्छी फिल्में आई है। अभी मैं वापसलौटूंगा और जो दूसरी आपने देखा है कि वोवो किस तरह से और आपने एक दूसरा सवालकिया। मैं सोचता हूं कि उस पर थोड़ी सीबातचीत होनी चाहिए कि हिंदू और मुसलमान दोकौमें हैं। ये कहां से आया? इस पर बातकरना बहुत ज्यादा जरूरी है।बहुत इंपॉर्टेंट बातें हैं जो शमसुलइस्लाम साहब आप यहां पर रख रहे हैं और जबहम अपना 80वा जश्न आजादी मना रहे हैं तोमेरे ज़हन में एक चीज आ रही थी कि जब आप जोबातें कह रहे हैं उस वक्त भी मुसलमानों कोअपनी हुब्बुल वतनी प्रूफ करनी पड़ रही थीऔर 80 साल के बाद भी मुसलमानों को अपनीहुब्बुल वतनी जो है वो प्रूफ करनी पड़ रहीहै। इससे बड़ी आरनी और क्या हो सकती है?लेकिन सवाल मेरा आपसे ये है कि क्यापार्टीशन की जिम्मेदारी सिर्फ मुस्लिम लीगपर डाल देना क्या ये सही है या फिर आपइसको मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा दोनोंमें बांटते हैं अंग्रेजों को आप इसके लिएजो डिवाइड एंड रूल जो उन्होंने किया उसकोआप कितना जिम्मेदार मानते हैं और आपकोक्या लगता है कि हिंदू महासभा या फिरमुस्लिम लीग हु वर क्लोजर टू दीब्रिटिशर्सनहीं आप आप आप बहुत सही सवाल उठा रही हैं।मैं तो यह कह रहा हूं कि यह कुछ सिरफरे औरजिनको मैं गवार और जाहिल भी नहीं कहूंगाक्योंकि वो जाहिल और गवारों की भीबेइज्जती करना होगा उनके इतिहास की सोच औरसमझ के बारे में हिंदू इतिहासकार हिंदूइतिहासकार इन कोर्ट मैं कह रहा हूं हिंदूनरेटिव ऑफ द पार्टीशन इस बात को साफ करताहै कि मुसलमान जिन्ना मैं मुसलमान बिल्कुलजिम्मेदार नहींजिना पार्टीशनको फोर्स करने के लिए जिम्मेदार है। लेकिनजिन्ना ने यह जहां से उधार लिया जरा उसकाइतिहास जान लीजिए। यह हर मुसलमान को जाननाचाहिए। ये हर मुसलमान हम मुसलमान हममुसलमान थे। हमने मुसलमान मुसलमानों मेंगद्दार थे। मुसलमानों में चोर थे।मुसलमानों में बेईमान थे और मुसलमानों मेंलड़ने वाले थे। मुसलमानों में जिना था।मुसलमानों में हमारे अशफाक उल्ला खान भीथे। तो इसको इसको इसको हमको अच्छे तरीकेसे समझ लेना चाहिए। देखिए 1857 में हमहारते हैं। हारने के बाद आपस में बिखरावशुरू होता है। हर जगह होता है। हम हमारेपड़ोसी के साथ मुकदमा चल रहा है और हम हममुकदमा हार जाए तो हमारे भाइयों में लड़ाईहोती है। बहनों में लड़ाई होती है। तूअच्छा वकील नहीं किया, तूने ये नहीं किया,तू नहीं किया। है ना? उसके बाद जब हमारादेश सब कुछ करने के बावजूद गद्दारों कीवजह से हार गया। और दिल्ली के बारे मेंजिसके जिसके ओरिजिनल कागज मेरे पास हैदिल्ली हम 19 सितंबर 1857 को 11 11 मई कोआजाद करने के बाद इसलिए हार गए चारगद्दारों की वजह से रजब अली मिर्जा इलाहीबख्श मुंशी जीवनलाल और हकीम एहसान उ्ला इनचार गद्दारों के ये रिटन फैक्ट्स हैओरिजिनल है कि किनोंने गद्दारी करकेदरवाजे खुलवाए क्या क्या बारूद को गीलाकराया खान मजार में ये सब वहां हमारेबारूद का कारखाना उड़वाया एहसान उ्ला येसारा हमारे सामने है। तो उसके बाद जोमुसलमानों के जो दलाल ऊंची ऊंची हाई कास्टशफा थे उन्होंने अंग्रेजों को कहा जनाब हमतो इसमें शामिल ही नहीं थे।ये हिंदुओं ने करवाया और सर सैयद तो यहांतक चले गए ये कहने के लिए कि मुसलमानोंमें कुछ भी थे तो वो बदमाश लोग थे। वो सतहपर तैरते लोग थे। वो अ्याश शराबी कबाबीलोग थे। यानी किसी ऊंची जाति के मुसलमानने इसमें हिस्सा नहीं लिया। और उधर इसकेनाना अपना अरविंदों के नाना राज नारायणबसु नाबा गोपाल मित्र ये दोनों दोस्त थे।इन्होंने भी कहा कि ये हमारा इसमें आरसीसॉरी बंकिम चंद्र चटर्जी ने कहा किहिंदुओं का इससे कोई लेना देना नहीं था।अमेठी के हिंदू राजा का राजा का पंडितउनका क्या नाम था? उन्होंने सितंबर 1857के अंदर किताब लिख दी मोहबा अजीम पूरीकिताब के हिंदुओं ने कहीं पर भी हिस्सानहीं लिया। ये सारा मुसलमान उन्होंनेकराया। ये जब हो रहा है तो बहुत उसका बहुतनुकसान हुआ। लेकिन हम ये देखते हैं कि येबात बहुत आगे बढ़ रही है। बहुत आगे क्याबढ़ रही है कि जो हिंदू जो सेक्शन हैहिंदू जो ये ऊंची जाति का है जिसमें नाभागोपाल मित्र और राजारायण बसु ये पहली बार18889 के अंदर कहते हैं कि यह जो है यह जोदेश है यह आर्यंश का देश है। यह आर्यंश कादेश है और यह आर्यंश कीमातृभूमि है।वो पितृभूमि बनेगी। बाद में सावरकर केआतेआते फादर लैंड बनेगा। अभी यह मातृभूमिऔर वो फिर हिंदू मेला शुरू करते हैं औरहिंदू संगठन हिंदू महासभा उसी से बनकरनिकलती है।और ये पहली बार ये कहा जा रहा है कि इसदेश में ये हिंदू सुपीरियर है। हिंदूसुपीरियर हिंदुओं का देश है। यानी दूसरेदेश दूसरे लोग जो है वो इस देश के नहींहै। वो इमीग्रेंट्स हैं। और बदकिस्मती सेसर सैयद भी इसमें शामिल हो जाते हैं कि दोकौमे हैं हम वो कुछ भी कहते हैं लेकिन येहै कि हिंदू मुसलमान और हिंदू मुसलमानोंको अंग्रेजों ने मिलवा दिया इसलिए ये होगया उनकी जो किताबें हैं असबाब बगावत हिंदऔर और सरकशी जिला बिजने और आप साफ देखेंगेकि हिंदू मुसलमान सिपाहियों का कॉमन मेसबना दिया हिंदू मुसलमान बच्चियों कोपढ़वाने के लिए आपने जिद कर दी इसलिएदेखिए ये सब भड़क गए ये सब होता है अभीअभी देखिए क्या हो रहा है कि हिंदू औरमुसलमान दो अलग-अलग कौमे हैं। हिंदुस्तानहिंदुस्तान कुछ नहीं है। यह आर्यन रेस हैऔर ये हिंदू मुसलमान दो रहते हैं। लेकिनये बात बहुत जल्दी आगे बढ़ती है औरमुसलमानों की तरफ से इसमें कोईकंट्रीब्यूशन नहीं होता है। वोकंट्रीब्यूशन होता है बौद्ध में जो चौधरीरहमत अली तब आते हैं उस जब बंदा वो आताहै। उससे पहले क्या है?भाई परमानंदभाई परमानंद जो कांग्रेस के भी लीडर हैं,हिंदू महासभा के लीडर है और बाद मेंआरएसएस के भी लीडर हैं। 19071909सन 1909 में अपनी जीवनी लिखते हैं और वोये कहते हैं कि सिंध के आगे का जितना भीहिस्सा है उसको अफगानिस्तान और नॉर्थवेस्टर्न फ्रंटियर प्रोविंस यानी पठानप्रोविंस से जोड़कर एक ग्रेट मुस्लिमकिंगडम बना दी जाए। पहली बार भारत केपार्टीशन का जो प्लान है वो भाई परमानंदपेश कर रहा है।ओकेमुसलमानों को उधर कर दिया जाए। द हिंदू ऑफरीजन शुड कम अवे व्हाइल एट द सेम टाइममुसलमान इन द रेस्ट ऑफ इंडिया शुड गो एंडशेड्यूल इन दिस टेरिटरी।सारे हिंदू वहां से इधर आ जाए और यहां केमुसलमानों को वहां भेज दिया जाए। अभीइंडिया की बात नहीं हो रही है। वो तीनप्रोव हमारे वेस्ट की बात हो रही हैक्योंकि वहां मुसलमानों की बहुत अच्छीखासी तादाद थी। कभी बुशरा जी हमें बातचीतहोगी कि क्या मुसलमान हिंदू थे और हिंदूसे मुसलमान होने के बाद और मुसलमानों सेइतनी नफरत क्यों है जबकि वो कुछ भी नहींहै। इसका मेरे पास मैं मेरा इस पर काम है।मैं कभी चर्चा करना चाहूंगा। अच्छा उसकेबाद आप देखिए लाला लाजपत रायलाला लाजपत राय 1924 के अंदर ट्रिब्यून केअंदर एक सीरीज लिखते हैं ट्रिब्यून। आज भीहै वो अखबार मेरी जो स्कीम है उसमेंमुसलमानों को चार पाकिस्तान देंगे चारस्टेट्स देंगे एक पठान प्रोविंस ऑफ नॉर्थवेस्टर्न फ्रंटियर वेस्टर्न पंजाब सिंध औरईस्टर्न बंगाल ईस्टर्न बंगाल मेंपाकिस्तान देंगे ये जिन्ना से पहलेलाजपत राय कह रहे हैं क्या जानता है येदेश क्या ये मुसलमान जानते हैं जो मुसलमानपार्टीशन के पक्ष में क्या वो जानते हैंये हिंदू राष्ट्रवादियों ने दिया किमुसलमानों को बांटो। मुसलमानों को इस देशसे बाहर करो। उसके बाद उसके बाद वो यहकहते हैं कि इसके अलावा भी अगर कहींमुसलमान अच्छी खासी तादाद में है वहां भीहम पाकिस्तान दे देंगे। यानी लाला लाजपतराय 1924 मेंएक पाकिस्तान, दो पाकिस्तान, तीनपाकिस्तान, चार पाकिस्तान तो दे ही रहेहैं। एक पांचवा पाकिस्तान भीदे रहे हैं। उसके अलावा कहीं और भी है तोवहां भी दे रहे हैं। और यहीं से उठायाचौधरी करामत अली ने। चौधरी करामत अली काजो पूरा का पूरा है वो यहीं से लिया गयाहै। अच्छा उसके बाद बी एस मुंजे आता है।ये बी एस मुंजे जो है ये बड़ा कांग्रेस कालीडर था और सेंट्रल असेंबली यानीअंग्रेजों की जो पार्लियामेंट थी उसका भीमेंबर था और बहुत ही क्रिमिनल आदमी था।यानी इसने जो आरएसएस बनवाने में इसका रोलहै और हथियार बंद हिंदू होने चाहिए। साराइसमें रोल है। सावरकर इसका ही पाला हुआ हैऔर हेड ग्वार भी। तो इसने कहा कि जैसेइंग्लैंड अंग्रेजों का है। फ्रांसफ्रांसीसियों का है। जर्मनी जर्मन का है।इंडिया बिलोंग्स टू हिंदू।पर ये इतना पढ़ा लिखा इतना बेवकूफ था किफ्रांस फ्रांसीसी जो है वो कोई एक धर्म कोमानने की थोड़ी बात है। वो कि फ्रांसीफ्रांस जो है वो क्रिश्चियंस का है।इंग्लैंड क्रिश्चियन वो नहीं कह रहे वो कहरहा फ्रांसीसियों का है। पर वो कह रहा हैकि ये इंडिया जो है वो हिंदुओं का है।इसलिए हिंदुओं का होना चाहिए। और उसके बादआप चौंक जाएंगी मिश्रा जी। मैं भी चौंकाथा। मैं गदरी गदरी आंदोलन जो था उसकासमर्थक हूं। उसका रिस्चर हूं। लाला हरदयालबहुत इज्जत करता था मैं उनकी। लाला हरदयालने तो हद कर दी कि उन्होंने कहा कि इस देशसे मुसलमानों को खत्म करना है। हिंदूसंगठन के जरिए, हिंदू राज के जरिए, शुद्धिके जरिए। लाला हरदयाल कह रहे हैं और कहरहे हैं इनको सबको या तो मार मार के हिंदूकरो नहीं तो इनको सबको मारपीट केअफगानिस्तान भेज दो। और सावरकर सन 1937में सन 194 के अंदर पाकिस्तान का प्रस्तावआ रहा है। सन 1937 में अहमदाबाद जब वो जबहिंदू महासभा की लीडरशिप लेता है जब वोबाकायदा राजनीति में आ जाता है। हालांकिउसने अंडरटेिंग दी हुई है कि मैंपॉलिटिक्स नहीं करूंगा। वो कहता है हमारेदेश में टू एंटागोनिस्टिक नेशंस हैं। एकदूसरे से झगड़ा करते हुए दो नेशंस हैंहिंदू और मुसलमान। और वो बेवकूफ लोग हैं।इनफेंटाइल पागल है वो लोग जो यह सोचते हैंकि हिंदू मुसलमान एक लड़ी में पिरोया हुआएक नेशन है। और इसी पर सन 1940 में डॉक्टरअंबेडकर ने ये आपको जरूर पढ़नी चाहिए। सन1940 में मुस्लिम आजाद कॉन्फ्रेंस कर दीऔर डॉक्टर अंबेडकर ने पाकिस्तान पर येकिताब लिख दी। लाइब्रेरी के अंदर बैठ गएऔर ये किताब क्या एक रिस्चर का है किहिंदू हिंदू दृष्टि ऑन पाकिस्तान मुस्लिमलीग दृष्टि ऑन पाकिस्तानवो मुसलमान जो पाकिस्तानी चाहते हैं उनकीदृष्टि आरएसएस और इस सब को लेकर है।उन्होंने क्या कहा? उन्होंने कहा कि इसीकिताब में कि सावरकर और जिन्ना चाहे जितनाभी लड़ते हो।लेकिन दोनों पाकिस्तान के उस पर एक है।फर्क सिर्फ इतना है कि सावरकर साहबपाकिस्तान पाकिस्तान कोमुसलमानों को राष्ट्र तो मानते हैं लेकिनउनको अपने थंबे अपनी दादागिरी में हिंदुओंकी दादागिरी में रखना चाहते हैं। और येजिन्ह को मंजूर नहीं है। अच्छा उसके बादजो बहुत बहुतइंपॉर्टेंट है वो ये है कि आरसी मजूमदारआरसी मजूमदार जिनको हिंदू इतिहासकार कहतीहै आरएसएस वाले भारतीय इतिहासकार कहती हैउन्होंने लिखा है कि जिन्होंनेहिंदू महासभा के 50 साल के बाद पार्टीशनका जो एजेंडा था वो अडॉप किया वो उधारलिया जिन्हा 50 साल पीछे था पार्टीशन कोस्वीकार करने में मेरा उर्दू हिंदीअंग्रेजी में मेरा एक लंबा टू नेशन थरी केओरिजिन वो एकडमी एडू पर है। उर्दू हिंदीअंग्रेजी में साथी जिनकी थ्योरी है उनकोजरूर पढ़ना चाहिए। और ये जो है यानीजिन्होंने मुस्लिम लीग ने दादागिरी करकेदेश को मजबूर किया और अंग्रेज उनके इसकेसाथ थे। अंग्रेज इसके साथ इसके काम में।तो ये जिन्होंने मतलब बहुत बड़ी बेवकूफीकी इस्लाम के नाम पर। और बताइए जो आदमीशराब पीता था जो आदमी सूअर का मीट खाता थावो इस्लाम कुरान उर्दू की बात कर रहा है।निजाम मुस्तफा की बात कर रहा है।शमसुल इस्लाम साहब जब आप ये बातें कर रहेहैं तो उनमें से कुछ बातें ऐसी लगती हैबिल्कुल कि हूबहू तब से लेकर अब तक कुछबदला नहीं है। क्योंकि जो सवाल तब पूछे जारहे थे मुसलमानों से वही सवाल अभी भी पूछेजा रहे हैं मुसलमानों से। वो अभी भी यहीतमाम चीजें की जाती है। ऐसा लग रहा है कितारीख अपने आप को यहां पर रिपीट करती हुईनजर आ रही है। लेकिन सवाल मेरा आपसे अबकांग्रेस के हवाले से है। मेरा सवाल हैआपसे कि कांग्रेस की क्या गलतियां आप उसवक्त देखते हैं और क्या आपको लगता है किकांग्रेस जो है मुसलमानों को वो पॉलिटिकलस्पेस नहीं दे पाई जो उनको वाकई में मिलनाचाहिए था और उनको क्या आपको लगता है कि एकट्रॉफी के तौर पर इस्तेमाल किया गया।जिसको हम अभी भी देखते हैं। खैर कि अभी भीबिल्कुल वैसा ही हो रहा है। लेकिन मैं तबकी बात आपसे करना चाहती हूं।बशरा जी एक चीज समझ लें।ये जो नेशनलिस्ट मुसलमान जो है ये आजादहिंद काफ्रेंस वाले आजाद मुसलमान इससेबिल्कुल अलग थे।ओके हममैंने इनको पेट्रियोट मुस्लिम्स का नामदिया है जो बंटवारा नहीं चाहते थे। आजानेशनलिस्ट मुस्लिम तो कांग्रेस की दुमबनकर वो पार्टीशन के समर्थन में हो गए। येलोग नहीं हुए। यह लोग तबाह हो गए लेकिन यहलोग नहीं हुए। लेकिनअंग्रेजों की अंग्रेजों का पूरा के हमकेयहां से छोड़कर जाना है और हमने अपनेदलालों के हाथ में सरकार सौंप कर जानी है।उनका यह फैसला और हिंदू महासभा का कि उनकोएक प्योर एक प्योर राष्ट्र चाहिए। और मैंयह बताना चाहता हूं कि हिंदूराष्ट्रवादियों का जो है हिंदूराष्ट्रवादी ये पहला पहला बंटवारा नहींकरा रहे थे। जो यह देश जानता नहीं है जोअपने आप को पढ़े लिखे कह हिस्टोरिया नहींजानते उससे पहले एक सन 1937 में हिंदूराष्ट्रवादी एक बंटवारा करा चुके हैं येदेश जानता नहीं है 1937 से पहले हिंदूमहासभा का प्रेसिडेंट था एक महात्माउत्तमा ये बुद्धिस्ट था वर्मा का और 1936के अंदर प्लान आया हंटर कमीशन का वो सॉरीये दूसरा कमीशन था जिसनेसाइमन कमीशन साइमन कमीशन ने ये कहा किबर्मा को अलग करना है। बर्मा कोहिंदुस्तान से अलग करना है। उत्थामाउत्तमा महात्मा उ्थमा जो थे ये मेरी किताबमें नहीं है। ये बाद में असल में ये नएएडिशन जो आएंगे उसमें जुड़ेगा।महात्मा उ्थमा ने फौरन दिल्ली आए सावरकरको मिले कि हमने इसको नहीं होने देनाचाहिए क्योंकि बौद्ध और हिंदू तो एक हीधर्म है। हिंदू महासभा ने उनसे कहा तुमगद्दी छोड़कर जाओ। उनसे इस्तीफा लिया गयाहिंदू महासभा से। वो बुद्धिस्ट थे। सावरकरने खुद लिया और बुद्धों को अलग करायाहिंदुओं से। 1947 का पहला बंटवारा नहीं हैपुश जी हिंदुओं का जो खालिस राज बनाने काहै वो खालिस राज बनाने के लिए पहलेबुद्धों को अलग किया और फिर मुसलमानोंक्योंकि राजन नारायण बसुका के आर्यंस कारेस है।ये सबसे महानतम नस्ल का रेस है। हमनेइसमें सिर्फ हिंदू आर्यंस को रखना है।इसको हम अगर हम नहीं समझेंगे तो ये इंडियामें क्यों बराबर ये हो रहा है उसको समझनामुश्किल हो जाएगा। कांग्रेस ने क्या किया?कांग्रेस ने सीधा का सीधा धोखा दिया आजादमुस्लिम कॉन्फ्रेंस को।आजाद मुस्लिम कॉन्फ्रेंस की तमाम चीजों केबावजूद सारे मुसलमान का सपोर्ट है। लेकिनसरदार पटेल को पटा लिया माउंटबेटन ने किबंटवारा बंटवारा होने दीजिए। और सरदारपटेल को दिक्कतें आ रही थी वापस। दिक्कतहै और बात यह है कि जो जिस तरह सेअग्रेसिव हिंदू महासभा हो रही थी औरमुस्लिम लीग हो रही थी शहर शहर के अंदरदंगे हो रहे थे सरदार पटेल को लगा कि हरऑफिस के अंदर एक टेबल मुस्लिम लीग की होगीएक टेबल कांग्रेस की होगी बड़ा मुश्किल होजाएगा वो तैयार हो गए गांधी जी तैयार नहींहो रहे थे लेकिन उनको भी तैयार कर लियागया आजाद मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के लोगों कासबसे बड़ा दुख ये था कि आपने हमको एकट्रायल का मौका भी नहीं दिया और कांग्रेसवर्किंग कमेटी में दो लोगों का विरोध थाजिन्होंने कहा कि हम प्रस्ताव जब जिसकोमौलाना आजाद ने देखिए कांग्रेस ने क्याचालाकी की की मुसलमान को आगे लेकर आएमुसलमान को आगे लेकर आया उससे वो प्रस्तावइन्होंने मुक्त कराया और वो पास भी हो गयालेकिन दो आजाद मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के जोदो नेताओं ने एक तो इसक समली साहब थे औरएक और मैं नाम भूल रहा हूं माफ़ कीजिएगा उनलोगों ने कहा कि हम इसको नहीं मानतेहम इसको नहीं मानते और वो आखिर दम तकउन्होंनेशमदुल साहब आप बार-बार जो बात कर रहे हैंवो आप उसमें दो तीन चीजों को आप बहुत हीमजबूती से यहां पर कह रहे हैं। एक तो आपये कहने की कोशिश कर रहे हैं कि जो अपरकास्ट जो मुसलमान थे ये उनकी शय पर येज्यादा हुआ है और जो हम कहें कि जो अपरकास्ट मुसलमान नहीं थे उनका रोल इसमेंउतना नहीं था। एक तो आप ये कह रहे हैं औरसेम बात आप हिंदुओं के लिए भी कह रहे हैंऔर आप ये कह रहे हैं कि जो मुस्लिमकॉन्फ्रेंस थी उसके साथ ज्यादा मुसलमानजुड़े हुए थे मुस्लिम लीग के साथ उतनेमुसलमान नहीं जुड़े हुए थे। फिर मेरे ज़हनमें ये सवाल आता है कि आखिर जहां पर तादादज्यादा थी वो मुसलमान आखिर फिर क्यों हारगए?वजह ये है अंग्रेजअंग्रेज ये खेल खेल रहे हैं। कांग्रेस जोहै स्टेबल नहीं है। हिंदू महासभा क्या कररही है? किस तरह से कर रही है मैं उसकासिर्फ एक चीज आपको पढ़कर बता देता हूं। एकचीज आपको पढ़कर बता देता हूं मैं। धरधरिया साहब एक है जो जो रहते थे हवेलीलाखा जो अभी अभी एक मुगवरी जिला होता थाउनकी वो यहां भागकर आए कैसे आए आरएसएस केथे बहुत थे बहुत एक्टिव थे जवानी के अंदरयहां दिल्ली यूनिवर्सिटी में उन्होंनेपढ़ाया भी जरा सुन ले उन्होंने उन्होंनेउन्होंने उन्होंने अपनी जीवनी में क्यालिखा है कि वो मुगबरी जिले के एक शहर मेंरहते थे हवेली लाखा हवेली लाखा मुस्लिममेजरिटी 90% मुसलमान रहते थे। आरएसएस नेवहां शाखा शुरू की और उसमें एक बहुतमुसलमान शरीफ शेख साहब थे जिनकी स्टेशनरीकी दुकानी थी। हसमुख वो लिख रहे हैं। वोलिख रहे हैं। धुरिया लिख रहे हैं। वो कहरहे हैं वहां पर उनके दो बड़े प्यारे औरबहुत प्यारे बच्चे थे। उनको मारा। बच्चेसभी प्यारे होते हैं। लेकिन वो कहते हैंकि वो पूरे पूरे बाजार जो था वहां का सदरबाजार जो था उसके वो सब उनको प्यार करतेथे। इट वास अलस दैट आरएसएस वालंटियर हैडडन द हेलिश थिंग। एट द टाइम आई डिड नॉटबिलीव दी स्टोरी सम डेज लेटर आई लर्नअबाउट हु हैड मर्डर दोस इनोसेंट चिल्ड्रनबट आई हर्ड सबटेड द सब्सिशन द एटमॉस्फेयरहैड बीन सॉ टू बी विएटेड बाय द बंच ऑफ़ओवरलेस आरएसएस मेंबर्स एड ऑन द मर्डरसएक्ट बाय अनदर आरएसएस वर्कर फ्रॉम मनगमरीमुझे पता लगा कि उन दोनों बच्चों को मारनेवाला मनगमरी के एक आरएसएस के लीडर ने दोआरएसएस के नौजवानों से इस काम को कराया थाऔर वो बच्चे वो लड़का जिसने कत्ल किया था।मुझे बाद में सहारनपुर में मिल गया। औरमैंने जब उससे पूछा तुमने ऐसा क्यों कियाथा?उसने कहा ही मेड नो बोनस अबाउट ह रोल इन दहोल सॉरी अफेयर दो ही कनफेस दैट एट टाइमशी एक्सपीरियंस दी कंपश विजिटिंग ऑफरिमोट्स। लोहिया साहब कह रहे हैं कि ऐसीस्थिति पैदा कर दी थी कि और कांग्रेस भीउस दबाव में आ गई।कांग्रेस भी उस दबाव में आ गई कि आपने इसतरह की हालत कर दी कि मुसलमान होना जुर्महो गया और उसका नतीजा यह था कि मुस्लिमलीग के खिलाफ सबसे बड़ी लड़ाई लड़ने वालाजिनको 14 मई मगर मेरी तारीख सही है 14 मई1947 को शहीद कर दिया था मुस्लिम लीग केदो भाइयों ने जो उसी तरह के लीडर थे जैसेसावरकर था यहां पर सिंध के अंदरजी खुरू खुरू बरादर खुरू ब्रदर्सवो उन्होंने मारा और 15 अगस्त 1947 कोआजाद पाकिस्तान में तो उनका नाम होना हीनहीं था। उनको इतिहास से मिटा ही दियागया। उनको किसी ने याद नहीं किया। सावरकरको याद किया। हमारी संसद के अंदर सावरकरका मुजस्समा लगा। अल्लाह बख्श का मुजस्समानहीं लगा। अगर उस दिन कांग्रेसअपनी इस शानदारधार्मिक पॉलिटिक्स विरोधी विरासत को अगरकरता तो आज ये दिन देखने को नहीं मिलता।इंपॉर्टेंट बात आप कह रहे हैं और यहपडकास्ट जो है लंबा हो रहा है। हालांकिमेरे जेहन में बहुत सारे सवाल है लेकिनमैं कुछ चंद सवाल मैं चाहती हूं कि जोबिल्कुल भी मिस ना हो जाए। एक तो मैं 1857की बात करना चाहती हूं। शमसुल इस्लाम साहबमुझे लगता है कि आज अगर हम उसकी बात नहींकरेंगे तो बेईमानी होगी। दूसरा आज के इसदौर में हम ये देख रहे हैं कि जब आरएसएसअपने सबसे मजबूत दौर में है। 100 साल उसनेपूरे कर लिए। सत्ता में है। पिछले 12 सालसे प्रचंड बहुमत है उनके पास। हालांकि अभीहाल में जब हम आप और हम बात कर रहे हैं तोये भी कहा जा रहा है कि वो अपने फिर सेसबसे कमजोर दौर में भी आ गई है। जिस तरहसे वो चौतरफा गिरी हुई है। मैं उसपॉलिटिक्स में नहीं जाऊंगी। लेकिन सवालमेरा यह है कि इस पार्टीशन में अगर आपबहुत सरसरी तौर पर यह बता सके कि पटेल,नेहरू और गांधी के रोल को आप किस तरह सेदेखते हैं। एक तो ये मेरा सवाल और फिर मैं1857 पर आऊंगी कि 1857 जो गदर है जहां परये कहा जाता है कि मुसलमान मुसलमानों नेअपने खून से सड़कों को एक तरह से रंग दियाथा।हिंदू हिंदू सिखों ईसाइयों के साथजी जी बिल्कुल बिल्कुल मैं इसलिए कह रहीहूं क्योंकि मुसलमानों की बात मैं इसलिएकह रही हूं क्योंकि सबसे ज्यादा सवाल अभीमुसलमानों की ही उबुल वतनी पर मुसलमानोंपर ही उठाए जा रहे हैं। उनकी तारीख कोपैरों तले रौंदा जा रहा है और उनसे हरवक्त यह सवाल पूछा जाता है कि तुम घुसपैठीहो अपना नेशनलिज्म अपनी हुब्बुल वतनी याअपनी सिटीजनशिप जो है वो तुम एक वो तुमबताओ उसको प्रूफ करो तो इसीलिए उनका सवालमुझे लगता है कि सबसे इंपॉर्टेंट हो जाताहै। तो नेहरू पटेल और गांधी पर तो हमआएंगे लेकिन उससे पहले मैं आपसे चाहती हूंकि बहुत इबोरेट ना करके लेकिन अगर आप 1857में मुसलमानों के रोल की अगर आप बात करसके और क्या आपको ये लगता है कि आज के इसदौर में मुसलमानों को अपनी उन उस सुनहरीतारीख को रिक्लेम करने की जरूरत है और अगरवो ऐसा करते हैं तो क्या इसको विक्टिमकार्ड माना जाएगा या फिर यह कहा जाएगा किआप उसी ट्रैप में आ रहे हैं जो आरएसएस औरबीजेपी चाहती है।आरएसएस बीजेपी के टाइम में हम इसलिए नहींआ सकते क्योंकि हम 1857 को छोड़िए 15अगस्त 1947 को आजादी के अंदर हमने जो जोकुर्बानियां की है नेताजी की जो आजाद हिंदफौज है उसके लिए अगर एक मुसलमान रंगून काएक करोड़ उस वक्त नहीं दे मारफी साहबमुसलमान बोरे नहीं दें जलियांवाला बागजलियांवाला बाग में 3000 से ज्यादा शहीदहुए लेकिन हंटर कमीशन ने कहा कि 300 शहीदहैं 100 मुसलमान 100 100 सिख और 200 हिंदूसॉरी 400 हैं। 200 हिंदू 100 सिख 100 100मुसलमान तो असल में मुझे लग रहा है कि1857 में हम लोग अलग से करें। मैं सिर्फआपको बताना चाहता हूं 1857 में जो उसलड़ाई का जो स्ट्रेटजीस था अजीमुल्ला खान।अजीमुल्ला खान जो रानी लक्ष्मीबाई का केसलड़ने भी गए थे। फ्रेंच जानते थे,अंग्रेजी जानते थे, अरबी जानते थे,संस्कृत जानते थे। हिंदी जानते थे। हां।उन्होंने जो तराना लिखा था उससे आपकोअंदाजा हो जाएगा हिंदू मुसलमानों ने मिलकरक्या किया था। जी। और मैं ये चाहता हूं किथोड़ा साथी लोग सुनने वाले लोग पढ़ें।मेरी अंग्रेजीहिंदी उर्दू के अंदर किताब है 1857 कीअनकही हैरतंगेज दास्ताने। आप प्लीज खरीद।खरीद क्या उसको पढ़ें? किसी से उधार लेकरपढ़ें। उर्दू अंग्रेजी ओरिजिनल दस्तावेजोंपर है। जी ये देखिए ये तराना अजीमुल्लाखान साहब का 13 मई को पयामे आजादी दिल्लीकेजामा मस्जिद से छपता था उसमें आ गया येसुनिए जरा हां और इसके बाद खत्म करेंगे हमआगे करेंगे बशरा जी हांजी जीहम है इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा 13 मई1857 को ये तराना आ गया और ये तराना बनगया जंग आजादी का 1857 को हम है इसकेमालिक हिंदुस्तान हमारा पाक वतन है कौम काजन्नत से भी प्यारा यह हमारी मिल्कियतहिंदुस्तान हमारा इसकी रूहानियत से रोशनहै जग सारा रूहानियत मी्स आध्यात्म कितनाकदीम कितना नईम सब सब दुनिया से न्याराकरती है जलखेज जिसे गंगो जमन की धारा ऊपरबर्फीला पर्वत पहरेदार हमारा नीचे साहिलपर बसता सागर का नकारा इसकी खाने यानीखदाने उगल रही सोना हीरा पारा इसकी शानोशौकत का दुनिया में जयकारा आया फरंगी दूरसे ऐसा मंत्र मारा लूटा दोनों हाथों सेप्यारा वतन हमारा आज शहीदों ने तुमको उनकोअहले वतन ललकारा तोड़ो गुलामी की जंजीरेंबरसाओ अंगारा हिंदू मुसलमान सिख हमारा भाईप्यारा प्यारा ये है आजादी का झंडा इसेसलाम हमारा डरना नहीं है अपनी विरासत कोसमझो तुम्हें जो जो ऊंची जाति माफ कीजिएगाऊंची जाति का और ये प्रोफेसरों ने जो डराधमका दिया है उन्होंने इतिहास में सिर्फशाहजहां पर बात की है औरंगजेब पर बात कीहै अकबर पर बात की है उन्होंने तुम्हारीशानदार विरासत पर बात नहीं की है उसकोजानो मैं तुम्हारे पास आऊंगा, तुम्हारेसाथ बैठूंगा, तुम्हारे साथ बात करूंगा। यहदस्तावेज दिखाऊंगा। ओ और पूछोआरएसएस वालों से कि तुमने आजादी की लड़ाईमें तुम्हारे बीच में से कोई भगत सिंहक्यों नहीं है? तुम्हारे बीच में से कोईअशफाक उल्लाह क्यों नहीं है? तुम्हारे बीचमें से कोई उधम सिंह क्यों नहीं है? उधमसिंह ने शहीद होने से पहले कहा मेरा नाममोहम्मद सिंह आजाद है। जो भी मुझे उधमसिंह कहेगा वो मेरा दोस्त नहीं है। मेरादुश्मन है। क्योंकि अगर सिख मुसलमान हिंदूनहीं मिलेंगे तो ये देश आजाद नहीं होगा।मोहम्मद सिंह आजादकिसी मुसलमान ने नहीं कहा। उधम सिंह नेकहा अपनी विरासत जानो। पढ़ो। ये बेवकूफ येबेवकूफ लोगों ने मतलब मदरसों का काम था किहमको अपनी इस विरासत सेमिलवाते वहां तो हमने बस रटवाया है रटवायाहै बस ऐसे रटवाया है हमनेआखरी सवाल मेरा बस आपसे और फिर हम इसपडकास्ट को हम खत्म करेंगे कि मेरा सवालआपसे ये है कि आज के इस दौर में मुसलमानोंको जिस तरह का आप एक तरह की वोकैबलरी जोउनको दे रहे हैं जो आप आर्टिकुलेशन उनकोदे रहे हैं और जब आप उनको ये बता रहे हैंकि उन्हें इस वक्त क्या करने की जरूरत हैआपको क्या लग रहा है जब हम 80वा जश्नआजादी मना रहे हैं तो मुसलमानों को वो कौनसी पांच चीजें हैं फिलहाल और मैं येमुसलमान मेरा मतलब है शमसुल इस्लाम साहबजो आम मुसलमान है जिसको हर वक्त टारगेटकिया जाता है और जो उस तरह से जवाब नहींदे पाता है उसको कौन सी पांच चीजें हैं जोकरने की जरूरत हैनहीं मुझे पांच तो पता नहीं मैं तो सिर्फएक जानता हूं आप पांच के बारे में कुछरोशनी डालें मैं तो सिर्फ एक चीज जानताहूंजीऔर मैं उन मुसलमान दलाल नेताओं से पर मैंबहुत गुस्सा हूं जो आरएसएस के साथमुसलमानों को के जनाब इनको माफ कर दीजिएवो करवाना चाहते हैं। मैं यह कह रहा हूंये देश बचेगा इस देश का संविधान बचेगा तोमुसलमान भी बचेंगे। ये देश के संविधान मेंबहुत कमजोरियां हैं। ये देश का संविधान जो26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था। उसमेंपिछले दरवाजे से आरएसएस में कांग्रेस मेंजो आरएसएस के थे उन्होंने बहुत कुछ घुसायाहै। जैसे रिजर्वेशन हिंदू धर्म के लोगोंको ही मिलेगी वो सारी चीजें घुसाई है।वंदे मातरम को जन गगन के मन के बराबर लाकरखड़ा कर दिया।बिल्कुलजी वो वो जो किया है। लेकिन उसके बावजूदये हमारा सबसे बेहतरीन बैठ है। आरएसएस इसदेश के संविधान में विश्वास नहीं करता।आरएसएस इस देश को हिंदू राष्ट्र के तौर परले जाना चाहता और हिंदू राष्ट्र भी वोजिसने गोलवालकर ने यह कहा साउथ इंडिया केहिंदुओं के बारे में कि उनकी नस्ल सुधारनेके लिए हमने नॉर्थ इंडिया से ब्राह्मिनभेजे हैं। वहां की ब्राह्मणों को छोड़करहर जाति में जो भी पहला पहली शादी होगीउसमें पहला बच्चा उत्तर भारत के ब्राह्मणके साथ सोकर करना है। क्या आप यकीनकरेंगे? ये देश का जो संविधान है उसकीबचाने की हमने लड़ाई करनी है। हमने किसीसे माफी नहीं मांगनी। किसी से हमने हमनेहमने जो है कि हमें माफ़ कर दो। हम और हमकिसी के दया पर रहते भी नहीं है। 1000 सालके मुसलमान राज में मुसलमान सारे के सारेकमेरे रहे। क्या क्या चिंता है तुमको?तुमने तुमने कौन सी गदियां और तुमने मुगलराज लाल किला तुमने जाना है। तुम इज्जत केसाथ रहना चाहते हो। और इस्लाम मतलब इस्लामके ठेकेदार भूल गए हैं। इस्लाम मुसलमानोंसे नफरत क्यों है? इसका विवेकानंद नेबताया जी कि वेदांत के अंदर बराबरी काकांसेप्ट नहीं है। यह वेदांत ने इस्लाम सेसीखा। तो इस्लाम से सीखने का मतलब क्या हैकि हिंदुत्व जो सबसे ज्यादा मुसलमानों सेनफरत करता है वो इसलिए करता है किउन्होंने इस्लाम कबूल करके एक बराबरी कीजगह समाज तौर पे बराबरी हासिल करने कीकोशिश की। जिसकी वो इजाजत नहीं दे सकते।ये विवेकानंद कह रहे हैं। लेकिन मुसलमानोंने उसी को छोड़ दिया। उसी बराबरी के उसकोही छोड़ दिया। आज देखिए मुसलमान का क्यालड़ाई है मुसलमान तंजीमों का ट्रिपल तलाकऔर चार शादी क्या लड़ाई है बताइए क्यालड़ाई हैमुसलमान सारी दुनिया में गएजीसारी दुनिया में गए बिना हथियारों के नौसाउथ ईस्ट साउथ ईस्ट एशिया पूरा मुसलमानहो गया एक सैनिक नहीं गया उनके मैसेज कीवजह से इस्लाम का क्या रुख इस्लाम ने 1400साल पहले कह दिया औरत और मर्द बराबर अगरखुदा ताला और इस्लाम अलग कर रहे होते तोऔरत का हज अलग होता। औरत कमजोर होती तोकहते तूने वक्त की पांच वक्त की नमाज नहींपढ़नी। तूने पढ़नी नहीं क्योंकि तूने तोसारे घर की सफाई करनी है। तूने रोजा रखनाही नहीं था। तूने रोजा रखना ही नहीं थाक्योंकि तूने तो घर की सफाई करनी है।बच्चे पैदा करने हैं।जी बिल्कुल।इस्लाम का इस्लाम का मैसेज जो इस्लाम कामैसेज जिसकी विवेकानंद बात कर रहे हैं वोइस्लाम के ठेकेदारों ने उसको गायब करदिया। जी बिल्कुल बहुत-बहुत शुक्रियाक्योंकि मैं जानती हूं कि जो व्यूअर्स इसपडकास्ट को देख रहे हैं और मैं खुद अभीबहुत सारे सवाल है जिनके जवाब जो है वोअधूरे रह गए हैं। लेकिन जाहिर सी बात हैकि हर पडकास्ट का एक मुकरर वक्त है तो मैंउसको यहां पर खत्म करना चाहूंगी और अगरव्यूअर्स जो है हमारी डिमांड करते हैं तोशमसुल इस्लाम साहब को दोबारा जो है वोतकलीफ दी जाएगी और 1857 से लेकर और बहुतसारी ऐसी चीजें हैं जिस पर अभी बात करनाबाकी है तो उस पर हम फिर से कोशिश करेंगेरिक्वेस्ट करेंगे कि शदुल इस्लाम साहब सेहम दोबारा से एक बार फिर सेहमेशा तैयार हूं। बहुत-ब शुक्रिया।बहुत शुक्रिया। बहुत शुक्रिया। आपने दी वेयू लेट दी होल डिस्कशन और जिस तरह सेसच्ची बात ये है कि एक अच्छा एंकर एकअच्छा गाइड जो है वो बहुत कुछ निकलवाबहुत-बहुत शुक्रिया और नाव को मैं बहुतप्यार करता हूं। सबको सलाम कहिएगा।बहुत-बहुत शुक्रिया और मेरे से कोई गलतीहुई हो तो मुझे माफ़ कीजिएगा।अरे नहीं प्लीज प्लीज ये बात तो मुझे कहनीचाहिए। बहुत-बहुत शुक्रिया शमसुल इस्लामसाहब अपना कीमती वक्त आपने दिया। थैंक यूसो मच फॉर जॉइनिंग।

Companion article

Every August 15, a familiar question resurfaces for India's Muslims: were you really on the right side of 1947? Eighty years on, host Bushra Khanum put a sharper version of that question to Dr. Shamsul Islam — a political science professor of four decades, author of more than thirty books, and a longtime chronicler of the RSS's own historical record — on the Nous Podcast. His answer, drawn from his book "Muslims Against Partition of India," inverts the question entirely: rather than asking Muslims to keep proving a loyalty no one else is asked to prove, he asks what role Hindu nationalist organisations themselves played in the freedom struggle they now claim to define.

A Question Turned Back

"This is a horrendous, a very dangerous situation," Islam says of the recurring demand that Muslims demonstrate patriotism, "that this country's Muslims are made to stand in the dock over whether they love India." His response is not defensive but confrontational: "Ask the reverse question of the RSS people, the Hindutva people — what role did you play in India's freedom?" The RSS was founded in 1925, the Hindu Mahasabha slightly earlier. Between then and 1947, India lived through the Non-Cooperation Movement, the Khilafat Movement, the Salt Satyagraha and the Quit India Movement — the last of which, Islam notes, was in its 84th year at the time of the recording. "Quit India" was Congress's call, voiced by Gandhi and by Maulana Abul Kalam Azad, by Subhas Chandra Bose and by Sardar Patel. "The RSS did not give that slogan," Islam says. "The Hindu Mahasabha did not give that slogan."

He offers a specific, documented irony: on August 14, 1947, an English-language newspaper aligned with Hindu nationalist opinion published an editorial objecting to the tricolour itself, arguing that a flag with three colours would never be respected by Hindus and would produce a poor psychological effect on the nation. "The word three is in itself an evil," the editorial said, according to Islam — the same organisations, he argues, that today instruct Muslims to prove their love of country by waving that flag never accepted it themselves when it was adopted. Subhas Chandra Bose, he notes, understood how divisive the slogan "Vande Mataram" had become — rooted in a novel that depicts the mass killing of Muslims — and for that reason gave the Azad Hind Fauj the slogan "Jai Hind" instead, with two of its leading commanders themselves Muslim.

Whose Vote, Whose Representation

Islam's most pointed factual challenge concerns a claim now treated as settled history: that the Muslim League represented India's Muslims in 1946 because it won the majority of Muslim seats that year. He argues this framing conceals a basic fact about who could vote at all. Under the Government of India Act of 1935, the franchise was restricted to income-tax payers, lawyers, degree-holders and large landowners — fewer than eight percent of the population nationally, and in provinces like Bihar and the United Provinces, where Muslims were overwhelmingly poor, only an estimated four to five percent of Muslims held the vote. "My own family, weavers, ironsmiths — people like that were not voters," he says. The Muslim League's electoral mandate, in his account, was drawn from a narrow, propertied slice of the community, not from the weavers, artisans and labourers who made up its overwhelming majority — a point he says vanishes from the way that mandate is retold today.

Set against this is the Azad Muslim Conference, held in Delhi over four days in late April 1940 — an event Islam says has been almost entirely erased from public memory, including by scholars who claim to research Muslim history. Organised jointly by the All India Jamiat-ul-Ulama, the All India Momin Conference, the All India Majlis-e-Ahrar, the All India Shia Political Conference (marking, Islam notes, one of the first times Shia and Sunni organisations formally united), the Khudai Khidmatgar, the Krishak Praja Party and several smaller Muslim bodies, the conference drew delegates from every major province — 357 from the United Provinces alone, 155 from Punjab, 125 from Bihar, 105 from Bengal, 82 from Sindh, and more from Delhi, Assam, Bombay and the princely states — alongside an unplanned surge of 20,000 women in attendance, against an initial estimate of 5,000. Wilfred Cantwell Smith, a leading contemporary scholar of communal politics, concluded that the gathering represented the majority of Muslims. Its resolutions rejected the two-nation theory outright and warned, with striking prescience, that a Pakistan split across two wings nearly 2,000 miles apart could not hold — a warning borne out in 1971.

Among its most prominent voices was Allah Bakhsh Soomro, a Sindh political leader whose speeches Islam reads from at length, arguing they belong in university curricula alongside the pamphlets the Jamiat-ul-Ulama published against the two-nation theory. Bakhsh's writing addressed communal division and caste prejudice within the Muslim community itself — including the practice, in parts of eastern Uttar Pradesh and Bihar, of denying burial or desecrating the graves of Muslims from lower-caste backgrounds, and the imposition of a discriminatory "arzal tax" on them — decades before such caste critiques became mainstream. Allah Bakhsh was assassinated on May 14, 1943; Islam draws a direct parallel to Gandhi's assassination four years later, arguing both men were killed for standing against communal politics from within their own communities.

Where the Two-Nation Theory Actually Began

Islam's most substantial claim is genealogical: the two-nation theory, routinely attributed to Jinnah, has a documented history in Hindu nationalist politics that predates the Muslim League's own adoption of it by decades. He points to Bhai Parmanand — a Congress leader who later led the Hindu Mahasabha and, still later, the RSS — who in his 1909 memoir proposed that Sindh and the provinces beyond it be joined with Afghanistan and the North-West Frontier Province into what he called a "great Muslim kingdom," with Hindus moving east and Muslims in the rest of India moving into that territory. "This is the first partition plan for India," Islam says, "and Bhai Parmanand is the one presenting it." He traces the same idea through Lala Lajpat Rai, who in a 1924 Tribune series proposed carving out four separate Muslim states — a Pathan province, western Punjab, Sindh and eastern Bengal — years before Jinnah's Lahore Resolution. He cites B.S. Moonje, a Congress leader and Central Legislative Assembly member closely associated with founding the RSS and with Savarkar's rise, who argued that India belonged to Hindus just as England belonged to the English — apparently unaware, Islam notes dryly, that England's national identity was never defined by religion in the way he was proposing for India. Historian R.C. Majumdar — a figure often invoked by Hindutva commentators as an authoritative "Indian" historian — himself documented, in Islam's account, that the Hindu Mahasabha had adopted a partition agenda fifty years before the Muslim League caught up with it.

Savarkar's own contribution, in Islam's telling, was to declare in 1937 — as he formally assumed leadership of the Hindu Mahasabha and, despite an earlier undertaking to stay out of politics, entered it directly — that Hindus and Muslims were "two antagonistic nations," and that anyone who believed otherwise was "infantile" and foolish. B.R. Ambedkar's 1940 book on Pakistan, written in the same year as the Azad Muslim Conference, is one Islam urges listeners to read directly: Ambedkar concluded that Savarkar and Jinnah, for all their public antagonism, agreed on the essential premise of Muslims as a separate nation — differing only in that Savarkar wanted Muslims kept under Hindu dominance rather than granted a separate state, a condition Jinnah would not accept.

Pressed on whether responsibility for Partition can fairly be placed on the Muslim League alone, Islam widens the frame rather than narrowing it — implicating the Hindu Mahasabha in the same architecture of division, and the British administration for executing a division neither community had genuinely been consulted on. He describes the boundary-drawing itself as a rushed and almost accidental process: Sir Cyril Radcliffe was reportedly handed maps roughly fifty years out of date and given seven weeks to divide a subcontinent, with the poet W.H. Auden's poem on the episode describing Radcliffe departing England having "never been there" and settling the boundary "in seven weeks" before sailing home to forget the whole affair — a decision Islam calls one of history's cruellest jokes. The consequences of that haste were severe and specific: Gurdaspur, meant for Pakistan, was assigned to India; the town of Pritnagar changed hands three times within days; and violence displaced and killed people, in Islam's account, on both sides of the new border, including the widely documented abduction and rape of more than a hundred thousand women during Partition's chaos.

1857, Not 1947, as the Real Reference Point

Islam repeatedly redirects the conversation to 1857, arguing that the war fought then, not the independence of 1947, is where Muslim participation in India's freedom struggle is best measured — and where he says the record is least contested and most deliberately forgotten. Citing what he describes as government data, he says Muslims made up roughly 25 percent of India's population at the time, yet accounted for some 40 percent of those martyred in the 1857 uprising. He names Azimullah Khan, a multilingual strategist who also represented Rani Lakshmibai's case in London, as the author of a widely circulated 1857 rebellion anthem declaring, in Islam's rendering, that "Hindu, Muslim, Sikh are our brothers" and that the land belongs equally to all who defend it. He argues that the same upper-caste elites — both Muslim and Hindu — who collaborated with the British after 1857 are the intellectual ancestors of the Muslim League and the Hindu Mahasabha alike, pointing to Sir Syed Ahmad Khan's later insistence that no "respectable" Muslim had taken part in the revolt, and to prominent Bengali Hindu intellectuals of the era who made the same disavowal on behalf of Hindus.

Congress's Betrayal, and an Unanswered Question

Islam's account of Congress is unsparing: he says the party used Maulana Azad's presence and prestige to move the Partition resolution — a resolution Azad, in Islam's view, should have refused to carry — while denying the Azad Muslim Conference's leadership any real hearing, despite the size and geographic spread of the movement it represented. Sardar Patel, worried about administrative chaos as communal violence spread city by city, ultimately accepted Partition as the price of stability; Gandhi resisted longer but was eventually brought around. Two of the Conference's own leaders, Islam says, refused to accept the resolution to the end.

Islam closes without offering a tidy resolution, and the interview itself runs long enough that Bushra Khanum defers several lines of questioning — including a fuller discussion of 1857 and of Nehru, Patel and Gandhi's individual roles — to a possible future conversation. What Islam leaves standing, instead, is a reframed historical ledger: a freedom movement in which Muslim participation was disproportionate and organised through bodies like the Azad Muslim Conference that history has largely dropped, set against Hindu nationalist organisations whose own partition proposals predate the ones they now blame entirely on the Muslim League. "If we don't know this heritage," he says, of the shared literary and civic history he describes across the conversation, "this country would have been saved too." Eighty years later, in his account, the ledger has simply never been read back to the public in full.

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