Madrasas and the Decline of Integrated Knowledge Traditions | Madrasa Series, Episode 2
How did the madrasa evolve from an integrated centre of learning into an institution often portrayed as separate from modern education? This explainer traces the historical transformation of Islamic education, examining the impact of colonialism, the disruption of traditional endowments, and the …
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पिछले episode में हमने मदरसे के माइने और उनकी शुरुवाती तारीख को समझा था हमने एक ऐसा educational tradition देखा था जहां theology और astronomy, law और medicine, philosophy और mathematics अकसर साथ साथ पढ़ाय जाते थे इसलिए नहीं कि ये कोई बेतर्तीब निजाम था बलकि इसलिए कि उनकी नजर में इल्म एक दूसरे से
मगर limited frameworks थे लेकिन फिर एक सवाल उठता है वो इदारे जो कभी तरक्की और इल्मी बुलंदी की पहचान थे वो हाशिये पर कैसे चले गए ना उसमें हमारी कोशिश है कि ऐसे अहम सवालों को research, evidence और बेहतर समझ के साथ सामने लाय जाए अगर आप भी ऐसे evidence based और meaningful public conversations की एहमिय
आज के इस एपिसोड में हम मदरसों की तारीख के उसी नाजुक और अहम मोड को समझेंगे, especially इंडियन context में. हम देखेंगे कि कैसे colonial और post-colonial दौर में मदरसों का decline और transformation हुआ. पुराना इस्लामिक तालीमी निजाम आज की तरह religious और secular subjects यानि दीनी और अस्री तालीम के अलग
क्योंकि आज बहुत सी discussions में ये मान लिया जाता है कि मदरसा मजहबी इसलिए बन गया क्योंकि इसलाम किसी न किसी तरह science के खिलाफ था। लेकिन तारीख हमें कुछ और बताती है। जब आठवी सदी से Greek philosophy और scientific thought इसलामिक दुनिया में पहुची, तो Muslim scholars में उसे सिरे से reject नहीं क
कुरान ने knowledge को एक religious obligation बनाया था कि अगर आप पढ़ो इसलाम का पहला revealed word था इसी framework में एक intellectual culture पैदा किया जो Greek thought को एक reference point मानती थी
मन्जिल नहीं। और ये एडवांस सिर्फ साइंस तक मेहदूद नहीं रहा। अल्खवरिजमी ने एलजेब्रा को एक नई डिसिप्लिन की तरह इन्वेंट किया। ग्रीक्स के पास इसका कोई इकूवलंट नहीं था। फिलोसफी में अलघजाली और इब्नरुष्द के बीच
लेकिन philosophical analysis में उससे आगे भी निकल गई. Islamic jurisprudence ने legal reasoning के ऐसे frameworks डिवेलब किये, जिनका Greek philosophy के किसी school में कोई parallel नहीं था. ये एक नई intellectual civilization थी. इसी intellectual tradition की breath का एक record, Professor Salim Al-Hassani की किताब, 1001 Inventions, The Enduring Legacy of Muslim Civilization है.
जिसे National Geographic ने पब्लिश किया और जिसकी बुनियात पर दुनिया भर में एक ट्रावलिंग एक्जिबिशन भी लगाई गई साथवी से सत्रावी सदी तक एलजेब्रा, ऑप्टिक्स, सर्जरी, मेकेनिकल एंजिनरिंग और कार्टोग्राफी जैसी शोबों में मुस्लिम स्कॉल
तो फिर सवाल ये है अगर इस्लामी तालीमी निजाम इतना मुकम्मल और मजबूत था तो फिर बाद में ये डिविजिन कैसे हुआ? इस्लामिक लर्णिंग का डिक्लाइन शुरू में कोई इंटिलेक्चुअल कोल्लाप्स नहीं था वो असल में एक पुलिटिकल और एकनॉमि
तो सिस्टम असर महसूस करने लगा और जब तीनों एक साथ टूट गए तो पूरा निजाम बिखर गया इस क्राइसिस का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट सामने आया 1258 में मॉंगोल्स बघदाद पर हमला करते हैं वैतुल हिक्मा, हाउस ओफ विजडम जो चार सदियों तक
अक्सर लोग इसी दोर को इसलामिक सिविलाइजेशन का बिगिनिंग अफ दी एंड कहते हैं लेकिन कुलुम्बिया युनिवर्सिटी के स्कॉलर जॉर्ड सेलिबा ने अपनी 2007 की किताब इसलामिक साइंस और दे मेकिंग अफ दे यूरोपियन रेनेसॉन में इसे दे क्लासिकल
उसने बस अपनी जगह बदली थी। इल्म का सिलसिला जारी रहा ममलुक काइरो में, उस्मानिया इस्तान्बुल में और तिमुरिद, समर्कंद और बुखारा में। इसलिए 1258 से 1500 के बीच की कहानी सिर्फ destruction की नहीं थी बल्कि इल्मी मराकिस के एक जगह से दूसरी जगह shift होने
और सदियों तक कोरडोबा, सेवील, टॉलीडो और ग्रेनाडा medieval यौरप के सबसे advanced intellectual centers बने रहे फिर 1492 आता है स्पेन में मुस्लिम हुकूमत का आखरी बड़ा मरकज ग्रेनाडा गिर जाता है इसके साथ Reconquista भी पूरी होती है यानि वो लंबी Christian military campaign जिसके जरिये Iberian Peninsula से मुस्
इबने रुष्द, इबने तूफैल, इबने खल्दून की दुनिया डिस्मैंटल हो जाती है। स्कॉलर्स बिखर जाते हैं, लाइबरिरीज तभा कर दी जाती हैं, लेकिन कहानी यही खतम नहीं होती। सोलवी सदी से एक और गहरा बदलाव शुरू होता है, और इस बार बदल
1498 में वासको डगामा केप रूट से भारत पहुचा। सदियों पुराने इसलामिक कंट्रोल्ड ट्रेड रूट्स अब बाइपास हो रहे थे। अमेरिकन सिल्वर यूरोपियन इकोनमीज को मजबूत करने लगी और डच और इंग्लिश इस्ट इंडिया कंपनीज जैसे जोइ
ऐसे रास्ते जो सिल्क रोड और रेड सी ट्रेड नेटवर्क को बाइपास करते थे। वही रास्ते जिनसे सदियों तक इस्लामिक स्कॉलरली इंस्टिट्यूशन्स फंड होते थे। मद्रसा सिस्टम का फाइनेंशल एंजिन यानि वक्फ सिस्टम काफी हद तक ट्रेड रेव
अगली तीन सदियों तक मुस्लिम स्टेट्स ने एकनॉमिक प्रेशर के बावजूद अपने इंस्टिटूशन्स को किसी तरहां जिन्दा रखा। लेकिन मिलिटरी डिफीट्स बढ़ती गई। ओटुमन्स को यूरोप में पीछे हटना पड़ा। मुगल्स की सौवरंटी ट�
और इसी जवाब ने एक ऐसा फैसला किया जिसने इस्लामिक स्कॉलरली ट्रडिशन को बाहरी इकनॉमिक दबाव से भी गहरा जटका दिया। मुस्लिम स्टेट्स ने खुद अपनी ट्रडिशनल एडुकेशन को रिप्लेस करने का रास्ता चुना। पंजिमात ओटोमन टर्कि�
तूटते हुए empire को centralize करना, यूरोप के साथ military और technological बराबरी करना, और nationalist movements और भगावतों को रोखना. और इसी सिलसिले में Ottoman Empire ने नए secular schools कायम किये, ताकि एक नए bureaucracy के लिए civil servants तैयार किये जा सकें. इजिप्ट में मुहम्मद अली पाशा ने French style military academies खोल कर, state resources को traditional education से modern institutions की तरफ
तन्जिमात एक conscious choice थी, Muslim state ने deliberately western model adopt किया ताकि survive कर सके, Mughal India में ऐसी कोई choice नहीं हुई, 1707 में Sultan Aurangzeb की मौत के बाद empire एक slow fragmentation में चला गया, और जैसे जैसे central authority कमजोर हुई, वो पूरी royal patronage जो मदरसों को fund करती थी, libraries को sustain करती थी, scholarly networks को जोड़े रखती थी, खुद बखुद बि
बस एक वैक्यूम आ गया। और ये सिर्फ ओटोमन टरकी, एजिप्ट और इंडिया की कहानी नहीं थी। सेंट्रल एशा में रश्या की भढ़ती ताकत ने बुखारा और समर्कंद के उन मदर्सा सेंटर्स को, जो 1258 के बाद इस्लामिक लर्णिंग के सबसे अहम मराकिस बन गय
आफ्रिका में फ्रेंच कॉलोनाइजेशन ने अलजीरिया और टुनिशिया के वक्व प्रॉपर्टीज को जबरदस्ती जब्द कर लिया। जैतुना जैसे इंस्टिटूशन को जो टूनिस में 737 CE से कायम थे धीरे धीरे मार्जन पर धखेल दिया गया। वेस्ट आफ्रिका मे
यह एक global pattern था फिर आया direct European colonization जहां जहां European ताखतों ने control कायम किया वहां वहां property law को restructure किया गया वक्फ properties या तो सीधे जब्द कर ली गई या फिर reform के नाम पर state control में ले ली गई हिंदुस्तान में colonial rule के दौरान वक्फ system के साथ क्या हुआ इसका एक अहम example हमें British policies में दिखाई द
अगर आपने वो वीडियो नहीं देखी है तो उसे जरूर देख लें। नतीज़ा ये हुआ कि अठारवी सदी के आखिर तक पहुँचते पहुँचते इस्लामिक लर्णिंग को समहालने वाली तीनों बुनियादी पिलर्ज एक साथ तूट चुके थे। और दिल्चस्प बात
हर जगह यही हो रहा था, वो जगह हैं जहां सदियों से इसलामिक लर्णिंग पर वान चड़ी थी, वहां से रिसोर्सिस, अटेंशन और लेजिटमिसी खतम होती जा रही थी. और ये सब तब हो रहा था जब यूरोप खुद एक बड़े इंटिलेक्शुल शिफ्ट से गुज
जैसे कि हमने शुरुआत में बताया था, मसला ये कभी नहीं था कि modern science इसलाम के खिलाव थी. ये distinction बहुत दिहान से समझना होगा. असल में यूरोप में जो नई sciences उभर रही थी, जैसे astronomy, physics, chemistry और biology, उनसे भी उसी तरह engage किया जा सकता था, जैसे कभी Muslim scholars ने Greek philosophy, mathematics, astronomy, architecture और engineering को अप
और वो ऐसे वक्त में आई जब मुस्लिम एमपायर्स पहले से continuous warfare से exhaust हो चुके थे। और एक बड़ा फर्क ये भी था इसी दौर में यूरोप साइंस के सबसे बड़े breakthroughs तक पहुँच रहा था। न्यूटन के laws of motion और universal gravitation ने physics की समझ बदल दी। अंड्रियस वसेलियस और विल
और फिर Industrial Revolution ने इस सारी knowledge को सीधा economic और military power में बदलना शुरू कर दिया और ये breakthroughs सिर्फ technical नहीं थे कुछ खोजें ऐसी भी थी जो religious world views को सीधे challenge दे रही थी Charles Lyell ने अपनी principles of geology 1830 to 1833 में deep time का concept रखा कि earth करोड़ो साल पुरानी है जो biblical chronology के एकदम खिलाफ था
1859 में चारल्स डार्विन की On the Origin of Species ने Theory of Evolution सामने रखी. Human Origins और Species की Fixity के बारे में सदियों पुरानी Religious समझ को Challenge किया.
जर्मनी में स्ट्राउस, फ्रांस में रेनान, और बाद में वैल हॉजन जैसे स्कॉलर्स ने बिब्लिकल हायर क्रिटिसिसम डेविलप की. स्क्रिप्चर को ह्यूमन टेक्स्ट की तरह हिस्टोरिकली अनलाइज किया. यानि अब साइंस सिर्फ मशीन्स और इंस्ट्रूमेंट्स
वो knowledge जिसकी authority खुद खुदा से है reason अकल इनसान की सोचने की ताकत और observation मुशाहिदा दुनिया को देख कर परख कर हासिल होने वाला इल्म लेकिन इन तीनों के बीच और भी faculties है intuition, aesthetic sense और सबसे अहम mystical experience कश्व, तजली ये knowledge के अलग-अलग modes हैं जिसकी अपनी methodology, अपनी discipline और अप
और एक committed Muslim भी Al Biruni observation और reason दोनों इस्तमाल करते थे और revelation को एक independent और valid source भी मानते थे फिर आया colonialism सिर्फ जमीनों पर नहीं बलकि इस सवाल पर भी कि knowledge होती क्या है इस नजरिये में European तरीके के सोचने और दुनिया को समझने को सबसे बहतर माना गया scholar और philosopher सैयद मुहम्मद नकीबुल
बल्कि उससे पहले एक गहरा फिक्री बदलाव। ऐसा बदलाव जिसमें इंसान के दिमाग की तरबियत को उसके अखलाक और किर्दार की तरबियत से अलग कर दिया गया। यानि ये सोच कि knowledge बस information है, उसका morality से कोई रिष्टा नहीं। Universe सिर्फ एक machine की तरह है और दुनिया को सम
measurable नहीं वो real नहीं और इसलिए वो knowledge भी नहीं इसी assumption ने western scientific method को अकेला judge बना दिया और बाकी सब को इसी western modernity से नापने का पैमाना इस पैमाने पर Islamic, Hindu, Buddhist तमाम non-European knowledge traditions को पिछड़ा unscientific या बस belief कहे कर खारिज कर दिया गया और ये सिर्फ ideas की बहस नहीं थी इसे enforce किया गया schools, universities, courts,
हर जगह यही स्टैंडर्ड लागू हुआ। हाला कि यूरोप में खुद ये पिक्चर इतना सिंपल नहीं था। वहाँ कांट का आइडियलिज्म था। हर्डर का रोमांटिसिज्म था। न्यूमन का थ्योलोजिकल रिवाइवल था। लेकिन कॉलोनाइज्ड दुनिया को ये क
rationality और morality को भी universally privileged framework बना दिया गया backwardness का label सिर्फ technology पर नहीं लगा culture, morality और values पर भी लगा colonial education system का एक खास economic function भी था उसका मकसद integrated human beings तैयार करना नहीं था बलकि ऐसे लोग तैयार करना था जो colonial state को चलाने में काम आए administrators, clerks, lawyers, accountants, civil servants आहिस्ता आहिस्ता
mathematics, natural science और public administration जैसे subjects English medium, colonial institutions में shift हो गए और मदरसे को सिर्फ मजहभी तालीन तक महदूद कर दिया गया और उलिमा ने भी एक conscious strategic decision लिया colonial system अब math, science और administrative training पहले से provide कर रहा था लेकिन religious education उसमें नहीं थी और यही religious education इसलामिक identity की बुनियाद थी तो मदरसे को वो काम करना जरूरी हो
जो बाकी कोई institution नहीं कर रहा था religious knowledge की हिफाजद यहीं से split शुरू हुआ और अहम बात यह है कि इसका जिम्मेदार सिर्फ किसी एक को नहीं ठहराया जा सकता एक तरफ यह specific failure था कि Muslim intellectual traditions नए modern scientific paradigm को अपने frame में reconstruct नहीं कर पाएं लेकिन दूसरी तरफ यह failure खुद colonial marginalization का भी नतीज
वो इल्मी मराकेज और इदारे जहां cutting edge Islamic studies और नई scientific thinking पर काम होना चाहिए था पहले ही कमजोर या तबहा किये जा चुके थे तो ये कहना भी गलत है कि ये पूरी तरह Islamic thought का failure था और ये कहना भी गलत है कि ये पूरी तरह बाहर से imposed हुआ था दोनों forces काम कर रहे थे और अब ये split
इस एपिसोड का बाखी हिस्सा इंडियन सबकॉंटिनेंट की कहानी है, खास कर नौर्थ इंडिया की. सवाल यह है, यहां इस रप्चर का क्या असर पड़ा? और जो रिस्पॉंसिस निकले, देवबंद, अलिगर, नदवा, बरेलवी, एहले हदीस, जमात इसलामी, वो इस खा
स्टेट फंडेड मदर से महले के मक्तब, इल्मी घराने, लाइब्रेरीज, रॉयल पैट्रोनेज और सफर करके इल्म हासल करने वाले स्कॉलर्स ये सब मिलकर एक बड़ा तालिमी निजाम बनाते थे लेकिन अठारवी सदी में ये इको सिस्टम जबरदस दबाव में आ चुका
और empire का political order बिखरता गया। और फिर British colonial control ने दिल्ली, लखनाओ और दूसरे इल्मी मराखिस की उस पूरी patronage economy को तोड़ दिया, जो सदियों से scholars, मदर्सों और libraries को support करती आ रही थी। और इसी सियासी बिखराव और इल्मी गिरावट के दौर में, South Asian Islamic History की सबसे अहम शक्सियतों म
तो उन्होंने कोशिश की इस तूटते हुए महौल में एक बार फिर डारेक्शन पैदा की जाए। उनका बेस था मदरसा रहीमिया। दिल्ली में उनके वालिद शाह अब्दुर रहीम की खायम की हुई सेमिनरी, जो उनके दौर में साऊथ एशिया का सबसे इंस्लूएंशल इ
पहला, इस्लामिक knowledge के तीन dimensions हैं, जो एक दूसरे के पुरक हैं, विरोधी नहीं. मनकुलात, कुरान, हदीस, फिख, transmitted knowledge. माकुलात, rational sciences, reason-based knowledge, और रुहानी तजर्बा, spiritual experience, inner knowing. तीनों मिलकर एक मुकम्मल निजाम बनाते हैं. दूसरा, हर दौर के अपने सवालात और अपने मसाइ
हर नसल को अपनी जमाने के सवालों पर नए सिरे से घौर करना और उनके जवाब तलाश करना पड़ता है। किसी रवये को इस्लामिक ट्रडिशन में इष्टिहाद कहा जाता है। तीसरा, इस्लामिक टीचिंग्स महज रूल्स का मजमूआ नहीं है। उनके पीछे एक यूनि�
जो उनके बाद आने वाली हर नसल को विरासत में मिले। जब इस्लामिक दुनिया तूट रही थी, तो इस्लामिक थौट को कैसे जिन्दा रखा जाए? जब पुराने निजाम बिखर रहे थे, तो इस्लामिक नॉलेज को नई दुनिया के सामने कैसे खड़ा किया जाए? जब �
सबने अपनी अपनी शर्तों पर अपने हालात में इन ही सवालों से जूजने की कोशिश की और यही उनकी असली एहमियत है कि उनके सवालों का साया आज भी हर उस स्कूल पर है जो इसलामिक थौट को आगे ले जाने की कोशिश कर रहा है ये सब एक ही दरक्त की अलग-अलग श
जहाँ revelation और mystical experience को knowledge के दायरे से बाहर कर दिया गया, जहाँ western materialist, empiricist framework को अकेले judge बना दिया गया, वो shift शाह वल्यूला के दौर में अभी अपनी पूरी ताकत से नहीं आया था. वो उस challenge के पूरे सामने आने से पहले लिख रहे थे. इसलिए उनके बाद आने वाले हर reformist school को उनस
और साथ में वो उलज़ा सवाल भी जिसका जवाब उन्हें देने की जरूरत ही नहीं पड़ी हाला कि और ये अहम है उनके काम में वो बुनियादी मकासिद और उसूल मौजूद हैं जिनसे एक मुकमल इस्लामिक नॉलेज सिस्टम की इमारत खड़ी की जा सकती है फिर आया वो
मकॉले का मानना था कि European knowledge इंडियन और Arabic knowledge ट्रडिशन से बहतर है लेकिन बात सिर्फ सोचकी नहीं थी जिसके पीछे एक पूरा colonial plan था उसका मकसद था ऐसी class तैयार करना जो Indian in blood and color but English in taste, in opinions, in morals and in intellect हो यानि ऐसे लोग जो colonial system को चलाने में मदद करें और यहीं से हिंदुस्तान में education
अब English medium institutions सिर्फ school या college नहीं रहे वो power, सरकारी नौकरी और modern professions तक पहुशने का रास्ता बन गए दूसरी तरफ पुराने मदरसे और oriental systems को धीरे धीरे marginalize किया जाने लगा फिर आया 1857 1857 की बगावत जिसे British accounts में Indian Mutiny और Nationalist accounts में First War of Independence कहा जाता है उसे बहुत बेरहमी से कुछल दि
लेकिन इसका सबसे गहरा असर दिल्ली और नौर्थ इंडिया के मुस्लिम इंटिलेक्चुल वर्ल्ड पर पड़ा बृतिश रिटालियेशन बेहद सख्त था कई उलमा को फासी दे दी गई कई लोगों को जेल में डाल दिया गया या उन्हें शहर छोड़ना पड़ा लाइबर
से कई बड़े responses उभरते हैं कई अलग answers लगभग एक ही impossible सवाल के लिए जब एक civilization को sustain करने वाला पूरा system खत्म कर दिया जाये तो उसे बचाया कैसे जाये उन सवालों और जवाबों से कई institutions उभरे कई अलग रास्ते एक ही मुश्किल सवाल के लिए अगले part में हम देखेंगे व
तो नाउस को सपोर्ट कीजिए स्क्रीन पर दिख रहे QR कोड को स्कैन करके आप इस काम का हिस्सा बन सकते हैं इंशाल्ला फिर मुलाखात
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